शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (64) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (64)

 

          

                   शहद की गुड़िया -  प्रकारण 64

       " एक बार दादू दादर स्टेशन का ओवर हेड ब्रिज चढ़कर सेंट्रल लाईन में जा रहे थे. उस वक़्त कई लोग ब्रिज की पगथार पर कुछ चीज वस्तु बेचने का धंधा कर रहे थे.. उस में एक मुस्लिम लड़की भी शामिल थी जो काफ़ी खूबसूरत थी. उस की उम्र 19-20 साल से ज्यादा नहीं थी. वह अपना स्टेशनरी आइटम्स का थैला खोलकर धंधा लगाने की शुरुआत कर रही थी. "

       " उसी वक़्त दो तीन पुलिस कर्मचारी ने उसे रोकते हुए कहां था :"

        " यहाँ नहीं बैठने का! "

        " उस ने बड़ी सलुकाई और सभ्यता से सवाल किया था. "

        " क्यों? "

        " यह आम लोगो के आने जाने रास्ता  हैं. "

        " यह क़ानून दूसरे लोगो को नहीं लागू होता?! "

        " क्या वह लोग हप्ता देते हैं? "

        " इतना सब कुछ जानती हो. फिर क्यों सवाल करती हो? "

       " मैं आप को हप्ता नहीं दूंगी! " कहकर उस ने खुद्दारी दिखाते हुए बड़ी हिमत से सवाल भी किया था."

       " क्या यह जगह तुम्हारे बाप दादा की जागीर हैं?"

       " ज्यादा दलील बाजी छोड़ो. हप्ता दो और अपना काम करो. "

      " उस में एक युवान कर्मचारी भी मौजूद था. उस को लड़की पर तरस आया था. वह दोनों कर्मचारी को अपने साथ ले गया था. "

       " फिर उसे अपना धंधा करने मे क़ोई आपत्ति नहीं आई थी."

       "वह तीनो कर्मचारी रोजाना राउंड पर आते थे."

       "और वह लड़की बिंदास्त अपना धंधा करती थी. दो कर्मचारी तो कुछ नहीं बोलते थे. लेकिन युवान कर्मचारी को उस के प्रति क़ोई लगाव हो गया था. वह मन ही मन लड़की को पसंद करने लगा था. वह कुछ ना कुछ बहाने उस से बात करने की कोशिश करता था. औऱ एक बार उस ने सीधा लड़की के सामने प्रस्ताव रखा था."

      " मेरे साथ शादी करोंगी? "

      " उस लड़की का नाम सुरैया था. उसे भी वह पुलिस कर्मचारी पसंद आ गया था. "

        " उस की आयु भी 18 साल के ऊपर थी. इस लिये शादी मे कुछ नडतर या बाधा का कोई सवाल नहीं उठता था."       

        " दादू का रोज ओफिस के लिये वही से जाना होता था. उन्होंने भी  एक दो बार उस से बातचीत की थी. उस ने एक खानदानी लड़की की तरह अच्छी तरह दादू से बातें की थी."

         " उस ने अपने बारे में सब कुछ बताया था. वह पालघर में अपने परिवार के साथ रहती थी. उस की मा अल्लाह को प्यारी हो गईं थी.. पिताजी ने दोबारा निकाह किया था.  तीन सौतेले भाई बहन भी थे. सौतेली मा बच्चों को बहुत तकलीफ देती थी. एक नौकरानी की तरह सुरैया के साथ व्यवहार करती थी. घर के सारे काम उस के सिर पर डाल दिये थे. उस कोई खाना भी ठीक से देती नहीं थी. इस स्थिति में वह घर छोड़कर मुंबई चली आई थी."

         " उस का नसीब भी कुछ अच्छा था. उस का धंधा भी अच्छा चल पड़ा था. उस ने कुछ पैसे जमा कर लिये थे. वह शादी करने जा रही हैं. वह भी मुझे बताया था. और उस  पुलिस वाले से जिस का नाम फरहान था,  निकाह भी कर लिया था."

           " शादी के बाद उस के दो शागिर्द ने पार्टी की डिमांड की थी. फरहान ने शादी की रात दोनों को अपने घर में आमंत्रित किया था. उस वक़्त दोनों ने फरहान को खूब दारू पिलाया था. उसे मदहोश कर दिया था."

            "  और सुरैया के साथ फरहान की जगह उन दोनों ने  हनीमून की सारी प्रक्रिया निभाई थी. उस समय फरहान को होंश आया था. वह अपने दोस्तों की गंदी हरकत देखकर लाल पीला हो गया था. बात मारामारी तक  आ गई थी,  उन्हों  ने फरहान कोई मौत के घाट उतारकर सुरैया को शादी की रात ही  बेवा कर दिया था. "

           " वह बेहोश हो गईं थी. ज़ब उसे होंश आया तब सारा आकाश उस के सामने घूम रहा था. और फरहान का मृत देह उस के बाजू में पड़ा था."

          " वह सब कुछ समझ गईं थी."

          " उस ने दोनों को आवेश में आकर इस दुनिया से दूर कर दिया था."

          " उस की जिंदगी में कुछ बचा नहीं था."

          " उस वक़्त पुलिस ने खून के आरोप में शकीला को जैल की सलाखो के पीछे ढकेल दिया था. इस घटना का सम्पूर्ण हवाला न्यूझ पेपर में प्रकाशित हुआ था. यह जानकर दादू तुरंत जैल में पहुंच गये थे. "

           " वह दादू के सामने खूब रोई थी. गिड़गिड़ाई थी.  पूरी दुनिया में उस का एक गरीब पिता के अलावा ओर क़ोई नहीं था. "

         "वह उसे मिलना चाहती थी."

         " उस ने दादू यह बताया था."

      " और दादू ने उस के पिताजी का पता लगाया था तो दूसरी सच्चाई उन के सामने आई थी. अपनी पत्नी के त्रास से बीमार होकर वह चल बसे थे. यह शकीला के लिये मनहूस खबर थी. वह खुद जीना नहीं चाहती थी. उस वक़्त दादू उस के सिर पर एक पिता की तरह हाथ रखा था."

         " यह किस्सा भी महज - आवेश का - culpable homicide  का केस था. उस का इरादा किसी को मारने का नहीं था. यह तो संजोग का तकाजा था. "

        "  दादू उसे हिम्मत बंधाई थी. उस को गरिमा के NGO में दाखिल करवाया था और उसे नई जिंदगी मिली थी."

      " और उन्हें भगवान ने एक ओर बेटी का उपहार दिया था. और उस ने दादू कोई बडे पापा' का सन्मान दिया था. "

      " उस को भी मानो नया जीवन मिला था."

       " उस के लिये गरिमा और गौरव ने दादू की काफ़ी तारीफ की थी. "

       " उस की शादी भी करवाई थी."

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      " जूही और शकीला में एक समानता थी. दोनों 18 साल की छोटी उम्र के थे.  इस लिये क़ानून उसे चाहते हुए भी उन के साथ कुछ नहीं कर सकते थे."

       " और दोनों को मामूली सजा देकर छोड़ दिया गया था."

         " शकीला पर दादू ने क़ोई एहसान नहीं किया था.  केवल अपना कर्तव्य समजकर  उसे मुसीबत से उगारा था, बाहर निकाला था. उस की अच्छे घर में शादी मुक़म्मल हुई थी. उस के घर वालों ने भी दादू का एहसान माना था. "

        " शकीला को तो वह ज़ब चाहे तब मिल सकते था.लेकिन जूही के बारे में उन्हें क़ोई पता नहीं था. उन्हें हरदम चिंता सताती थी. वह हर रोज उस के सुखी, समृद्ध जीवन के लिये ईश्वर से प्रार्थना करते थे.  जिस का उन्हें फल भी मिला था. उन्हें जूही के बारे में भी पता चला था. उस की शादी हो गईं थी और दो बच्चे की मा बन चुकी थी. "

      " उन दोनों के साथ दादू का क़ोई रिश्ता नहीं था. लेकिन वह दोनों दादू दिलो दिमाग़ में घर बनाकर बैठ गईं थी जिन्हे वह चाहकर भी निकाल नहीं पाये थे. "

       "+क़ोई भी रिश्ता हो. इंसान उसे अपनी मर्जी से नहीं जोड़ सकता. वह सब कुछ ईश्वर की इच्छा के आधीन होता हैं. और जो रिश्ता वह बनाता हैं उसे क़ोई नहीं तोड़ सकता. "

        " दादू  यह बात भली भ्रान्ति जानते थे. "

        "  रिश्ते में मिलना, बातें करना जरूरी नहीं होता. केवल यादो के सहारे भी उसे निभाये जा सकता हैं. उस का एहसास एक लड़की ने दादू को दिलाया था.

               0000000000000   ( क्रमशः)