शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (63) Ramesh Desai द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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शहद की गुड़िया - रंजन कुमार देसाई (63)

                    

                 शहद की गुड़िया- प्रकरण 63

       " बिभूति को मिलने की ख्वाहिश दादू के दिल में एक दिये की तरह जलती रही थी.. ना तो वह कभी बुझी थी ना तो उस की रौशनी कम हुई थी. उम्मीद की किरणों के उजाले में वह सदैव जीवंत रही थी."

        " एक बार उन की तबियत ख़राब थी. उस वक़्त उन्होंने ने मुझे गुजारिश की थी."

        " मुझे बिभूति से बात करनी हैं."

        " उस दिन इतवार था. सुबह के दस बज गये थे. फिर भी वह बिस्तर में लेटे थे. उन के कहने पर मैंने बिभूति को वीडियो कोल लगाया था."

        "  उसे कुछ मालूम नहीं था. इतनी  देर तक दादू को बिस्तर में देखकर वह एक दादी मा की तरह उन्हें डांटने लग गई थी."

        " क्या बडे पापा! दस बज गये और आप कुम्भ कर्ण की तरह सोये हुए हो. "

       "  उस पर मैंने उसे जानकारी दी थी."

       " तुम्हारे बडे पापा की तबियत कुछ ज्यादा ख़राब हो गई हैं. वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रहे हैं. "

        " यह सुनकर उस ने मेरी माफ़ी मांगी थी.. और जल्द ठीक हो जाने की ईश्वर को प्रार्थना की थी. "

        " उसी समय अमरिका से म्युझिका का फोन आया था. "

        " उन की तबियत के बारे में सुनकर वह भी चिंतित हो गई थी. "

       "  उस ने अपनी आदत के मुताबिक, दादी मा के अंदाज में अपना ख्याल रखने की दादू हिदायत दी थी."

       "  इतने साल के बाद भी उस का प्यार तनिक भी कम नहीं हुआ था. उन की बेटी रिधिमा ने भी उन का हाल चाल पूछा था. उस से मानो क़ोई जादू या चमत्कार हो गया था."

      " दादू में काफ़ी सुधार आ गया था."

       " वह अमरिका में साहित्य क्षेत्र से जुडी हुई थी."

       "  दादू ने उसे बताया था: "

       " मैं अपनी जीवनी के आधारित उपन्यास लिख रहा हूं. "

        " यह तो अच्छी बात हैं? क्या नाम पसंद किया हैं? "

        ' यादों की सहेलगाह '

        " दादू! मम्मी ने मुझे सब कुछ बताया हैं.. यह हमारा सौभाग्य हैं जो भगवान ने आप को हमारी जिंदगी में भेज दिया हैं. "

         " यह मेरी भी खुशनसीबी हैं, भगवान ने मुझे तुम्हारी मम्मी का उपहार दिया हैं, जिस ने मेरे दिल में एक दादू का जैसा प्यार  छलका दिया हैं. दादू ने बड़े उत्साह से जवाब दिया था. ऊस ने ही सर्व प्रथम जानकारी दी थी. "

         " दादू! मैं साहित्य में पी एच डी कर रही हूं. मेरा यहाँ लेखकों और प्रकाशको ज्यादा उठना बैठना रहता हैं..आप को क़ोई मदद की आवश्यकता हो तो जरूर बताइयेगा. यहाँ प्रकाशन कार्य सरल हैं और  अच्छा पुरस्कार भी मिलता हैं !"

         " ऊस पर दादू ने बहुत कुछ कहां था : अच्छा किया बेटा. तूने मुझे बता दिया.. मेरा सारा तनाव कम हो गया. यहाँ, पढने लिखने की लोगो को आदत नहीं होती. . सब से बड़ी बात हैं. यहाँ क़ोई ऐसा वेतन नहीं मिलता जो किसी को लेखन कार्य को व्यवसाय बनाने की हिम्मत प्रदान करे. लोगो से, पड़ोसियों से मांगकर पढ़ने की आदत हैं. "

       " हमारा भारत बहुत से मुआमले में आगे निकल गया हैं लेकिन संकुचित मानसिकता की वजह से वह जरूरी चीजों में काफ़ी पीछे रह गया हैं.

      " मेरे घर वालों को भी मेरा लिखना पसंद नहीं. क्यों की उस से क़ोई आमदनी नहीं होती हैं. "

     " सही हैं. ज़ब आप क़ोई काम में इतना जुड़ जाते हो तो कम से कम गुजारे के लिये तो पैसे चाहिये.. वह न मिले तो विरोध करना सहज हो जाता हैं. रिधिमा ने दादू को कहां था. "

     " ऊस का दादू ने जवाब दिया था :मैं भी यही मानता हूं. लेकिन मैं क्या करुं? भगवान ने मेरे हिस्से में यही काम छोडा हैं. मैंने ना जाने कितनी लघु कथा ये लिखी हैं, जो प्रकाशित भी हुई है लेकिन पैसों के मुआमले में नाकामी ही मिली है. "

      " क़ोई बात नहीं उपन्यास का लेखन कार्य समापन होने तक आप की बेहतरीन कहानी भेजते रहियेगा.."

     " लेकिन वह गुजराती या हिंदी में हैं.  दादू ने खुलासा किया था. "

      " क़ोई बात नहीं. आप मुझे भेज दो. मैं उन का अंग्रेजी में अनुवाद कर लूंगी. "

      " और उन्होंने ' मीनू मास्टर', 'आश्रित ' ' ओह मा तु? ' फ्लोरा डिसोजा ', और ' खल नायक ' कहानिया तुरंत मोबाईल के जरिये रिधिमा को पोस्ट कर दी थी. जो तीन महिने के भीतर पांच विधविध सामायिक में प्रकाशित हुई थी जिस का उन्हें अच्छा खासा पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था. "

       " इस सफलता ने दादू को रातो रात दोबारा  जवान कर दिया था."

       " सब से पहले उस ने ' मीनू मास्टर ' कहानी की सराहना की थी. "

       "पिता की आँखों के सामने एक जवान बेटी दम तोड़ देती हैं., इस बात ने उस के घर वालों को तो रुलाया था, साथ में म्युझिका और रिधिमा की आँखों में आंसू का झरना बहा  दिया था."

       " ज़ब एक कहानी का कथा बीज  किसी को रुलाता हैं, उसे ही वास्तव में   टेलंट कहां जाता हैं, उसे कला का बेनमुन नमूना माना जाता हैं.."

      "कहानी के अंत में बारे में उस ने बखूबी से कहां था:"

     " दम तोड़ने के समय अपने पति को दूसरी शादी के लिये मिन्नत करना यह अपने आप में बड़ी महानता हैं. दुनिया में उस से बढ़कर कुछ नहीं होता. "

     " मीनू को मरते दम तक  एक बात का अफ़सोस रहा था. "

        "उस की लापरवाही की बजह से उस का भाई अपाहिज हो गया था. यह बात उसे अपराधी होने का एहसास करा रही थी. उस में क़ोई वजूद नहीं था. हकीकत में वह ईश्वर की मर्जी थी."

      "उस की जिद के कारण उसे दूसरी लड़कियो की तरह भाई मिला था, जिसे वह राखी बांधना चाहती थी..लेकिन उस ने भाई  को उस के काबिल नहीं रखा था. "

      "हादसे में उस के दोनों हाथ छिन गये थे. जिस की वजह से मीनू अपने भाई को राखी बाँधने के काबिल  नहीं रही थी."

     " उसे राखी का झूनून था.. ओबसेशन था.."

      "कभी भैया यह बहना ना पास होगी

      कहीं परदेस बैठी उदास होगी... (2)

      बहना उदास होगी मिलने की आश होगी

      जाने कौन बिछड़ जाये कभी भाई बहना."

      "और उस की बहन बिछड़ गई थी."

       "यह एक भारी सदमा था."

       "भाई के साथ हादसा हुआ था.. उस में उस का इतना ही दोष था. वह राखी दिलाने के लिये उस के भाई के साथ जा नहीं पाई थी. उसे दूसरों के भरोसे छोड़ दिया था और एक खटारे ने उसे कुचल दिया था."

       " इस वजह से उस के दोनों हाथों को गहरी चोट लगी थी. जिस ने उसे सदा के लिये उसे अपाहिज कर दिया था. "

        " यह  बात सुनकर रिधिमा के संवेदनशील दिल को बहुत दुःख हुआ था. "

                     000000000000  ( क्रमशः)