सन 1921 की बात है। गंगा के किनारे बसे एक छोटे से कस्बे के बाहर एक पुराना श्मशान था, जिसे लोग “मसान” कहते थे। दिन में भी वहाँ सन्नाटा रहता था, और रात में तो कोई उस तरफ देखने की हिम्मत तक नहीं करता था। कहा जाता था कि वहाँ सिर्फ मरे हुए लोग नहीं, बल्कि अधूरी इच्छाएँ भी भटकती हैं।
उस कस्बे में एक आदमी रहता था, नाम था हरिराम। वह एक साधारण किसान था, लेकिन उसकी जिंदगी में एक गहरा दुख था। उसका छोटा बेटा अचानक बीमार पड़कर मर गया था। हरिराम उस दुख को सह नहीं पाया। वह हर दिन श्मशान के किनारे बैठकर अपने बेटे को याद करता रहता था।
एक दिन वहाँ एक अजनबी तांत्रिक आया। उसकी आँखें गहरी और आवाज धीमी थी। उसने हरिराम को रोते हुए देखा और पास आकर बोला, “अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारे बेटे को वापस ला सकता हूँ।”
हरिराम पहले तो डर गया, लेकिन अपने बेटे के लिए वह कुछ भी करने को तैयार था। उसने तांत्रिक से पूछा, “क्या सच में वह वापस आ सकता है?”
तांत्रिक ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “मसान में सब कुछ संभव है, लेकिन हर चीज की कीमत होती है।”
उसने हरिराम को एक तांत्रिक क्रिया के बारे में बताया, जो अमावस्या की रात श्मशान में करनी थी। उसने कहा कि आधी रात को एक नई चिता की राख लानी होगी, और उसी राख के बीच बैठकर मंत्र पढ़ना होगा। जो भी आए, जो भी दिखे, डरना नहीं है और पीछे मुड़कर नहीं देखना है।
अमावस्या की रात आई। आसमान काला था और गंगा का पानी भी अजीब सा शांत था। हरिराम डरते हुए श्मशान पहुँचा। वहाँ कुछ पुरानी चिताओं की राख अभी भी ठंडी नहीं हुई थी। उसने तांत्रिक के बताए अनुसार राख इकट्ठा की और एक जगह बैठ गया।
जैसे ही उसने मंत्र पढ़ना शुरू किया, चारों तरफ की हवा बदलने लगी। पेड़ हिलने लगे, जैसे कोई उनमें से गुजर रहा हो। दूर कहीं किसी के रोने की आवाज आने लगी। हरिराम का दिल तेजी से धड़कने लगा, लेकिन उसने मंत्र पढ़ना जारी रखा।
कुछ देर बाद उसे अपने पीछे किसी के चलने की आवाज सुनाई दी। जैसे कोई धीरे धीरे उसके करीब आ रहा हो। उसके मन में डर उठा, लेकिन उसने तांत्रिक की बात याद रखी और पीछे नहीं देखा।
अचानक उसके कंधे पर किसी का ठंडा हाथ पड़ा। उसका शरीर काँप उठा, लेकिन उसने आँखें बंद कर लीं और मंत्र पढ़ता रहा। तभी एक आवाज आई, बहुत ही जानी पहचानी आवाज, “बाबा…”
यह उसके बेटे की आवाज थी।
हरिराम की आँखों में आँसू आ गए। वह खुद को रोक नहीं पाया और धीरे से पीछे मुड़ गया।
उसने देखा कि उसके सामने उसका बेटा खड़ा था, वही चेहरा, वही कपड़े। लेकिन कुछ अलग था। उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं, और उसका चेहरा बिना किसी भाव के था।
हरिराम खुशी और डर के बीच फँस गया। उसने अपने बेटे को गले लगाने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन तभी तांत्रिक की बात उसके दिमाग में गूँजी। उसने कहा था कि पीछे मत देखना।
अब बहुत देर हो चुकी थी।
अचानक वह बच्चा जोर से हँसने लगा। उसकी आवाज बदल गई, भारी और डरावनी हो गई। उसका शरीर धीरे धीरे काला पड़ने लगा और उसकी शक्ल बिगड़ने लगी। कुछ ही पलों में वह एक भयानक रूप में बदल गया।
वह हरिराम के करीब आया और बोला, “तुमने नियम तोड़ दिया… अब तुम्हें कीमत चुकानी होगी…”
अगली सुबह, कुछ लोग श्मशान गए तो उन्होंने देखा कि राख के बीच हरिराम की लाश पड़ी थी। उसका चेहरा डर से जमी हुई था और उसकी आँखें खुली थीं।
लेकिन असली डर तब सामने आया जब लोगों ने देखा कि उसके पास छोटे छोटे पैरों के निशान भी थे, जैसे कोई बच्चा वहाँ से चला हो।
कस्बे में यह बात फैल गई कि तांत्रिक ने हरिराम को धोखा दिया। लेकिन एक बूढ़े ने एक अजीब बात कही, “तांत्रिक ने कुछ गलत नहीं किया… उसने सिर्फ दरवाजा खोला था…”
उस रात, गंगा के किनारे रहने वाले कई लोगों ने अपने घरों के बाहर किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनी। जो भी उस आवाज की तरफ गया, वह कभी वापस नहीं आया।
कुछ दिनों बाद, उसी श्मशान में एक और आदमी उसी तांत्रिक के साथ देखा गया। तांत्रिक फिर से वही बात कह रहा था, “मसान में सब कुछ संभव है…”
और दूर अंधेरे में, एक छोटा सा साया खड़ा था, जो धीरे धीरे मुस्कुरा रहा था। उसकी आँखें अब भी काली थीं।उस रात के बाद कस्बे में कोई भी गंगा के किनारे जाने की हिम्मत नहीं करता था। सूरज ढलते ही दरवाजे बंद हो जाते, और लोग धीमी आवाज में बस एक ही बात करते, “मसान जाग गया है।” लेकिन डर जितना दबाया जाता, उतना ही गहरा होता जाता।
कस्बे में एक स्कूल मास्टर थे, नाम था श्यामलाल। वह पढ़े लिखे आदमी थे और इन बातों को अंधविश्वास मानते थे। उन्होंने ठान लिया कि इस रहस्य का सच सामने लाकर ही रहेंगे। उन्होंने उन लोगों से बात की जिनके घरों के पास बच्चे के रोने की आवाज आई थी। हर किसी ने एक ही बात कही, आवाज सुनते ही दिल खुद ब खुद उस तरफ खिंच जाता था।
श्यामलाल ने फैसला किया कि वह खुद उस रात मसान जाकर देखेंगे। अमावस्या फिर से आने वाली थी। उसी रात, वह एक लालटेन और हिम्मत लेकर श्मशान की ओर निकल पड़े।
गंगा का किनारा बिल्कुल शांत था, लेकिन उस शांति में एक अजीब सी बेचैनी थी। जैसे कोई दूर से उन्हें देख रहा हो। श्यामलाल ने अपने कदम तेज किए और मसान के बीच पहुँच गए। वहाँ की राख अब भी ठंडी नहीं लग रही थी, जैसे उसमें कुछ जिंदा हो।
तभी उन्हें वही रोने की आवाज सुनाई दी। एक छोटे बच्चे की सिसकियाँ। आवाज पास ही से आ रही थी। श्यामलाल ने लालटेन ऊँची की और उस दिशा में बढ़े।
उन्होंने देखा कि एक छोटा सा बच्चा राख के पास बैठा रो रहा था। उसकी पीठ उनकी तरफ थी। श्यामलाल ने धीरे से कहा, “बेटा, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?”
बच्चा रोना बंद कर देता है। कुछ पल के लिए सब कुछ शांत हो जाता है। फिर वह धीरे धीरे अपना सिर घुमाता है।
उसका चेहरा देखकर श्यामलाल के पैरों तले जमीन खिसक जाती है।
वह चेहरा हरिराम के बेटे जैसा था, लेकिन आँखें पूरी तरह काली थीं। होंठों पर एक अजीब सी मुस्कान थी, जो किसी इंसान की नहीं लगती थी।
श्यामलाल पीछे हटने लगते हैं, लेकिन तभी उनके पीछे किसी के खड़े होने का एहसास होता है। वह मुड़कर देखते हैं।
वही तांत्रिक।
उसकी आँखें इस बार और भी गहरी थीं। वह धीरे से मुस्कुराता है और कहता है, “तुम सच जानना चाहते थे, ना?”
श्यामलाल डर के बावजूद पूछते हैं, “यह सब क्या है?”
तांत्रिक शांत आवाज में कहता है, “मसान में सिर्फ मरे हुए शरीर नहीं होते, यहाँ अधूरी इच्छाएँ और भूखी आत्माएँ भी होती हैं। मैंने बस उन्हें रास्ता दिया है।”
श्यामलाल गुस्से में कहते हैं, “तुम लोगों को मरवा रहे हो।”
तांत्रिक हँसता है, “मैं नहीं… ये लोग खुद आते हैं। अपने प्यार के लिए, अपने लालच के लिए। मैं सिर्फ दरवाजा खोलता हूँ, अंदर क्या आता है, वह मेरे बस में नहीं।”
तभी वह बच्चा धीरे धीरे खड़ा होता है और श्यामलाल की तरफ बढ़ने लगता है। उसकी चाल अब पहले से तेज थी। उसके पीछे पीछे कई और साये उभरने लगते हैं, जैसे राख के नीचे से कोई और भी जाग रहा हो।
श्यामलाल भागने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनके पैर जैसे जमीन में धँस जाते हैं। वह चिल्लाना चाहते हैं, लेकिन आवाज नहीं निकलती।
तांत्रिक धीरे से कहता है, “हर बार कोई एक दरवाजा खोलता है… और फिर बाकी अपने आप बाहर आ जाते हैं।”
अगली सुबह, कस्बे के कुछ लोग मसान पहुँचे। वहाँ राख के बीच श्यामलाल की लाश पड़ी थी। उसकी आँखें खुली थीं और चेहरा डर से जकड़ा हुआ था।
लेकिन इस बार कुछ अलग था।
राख पर सिर्फ एक या दो नहीं, बल्कि कई छोटे छोटे पैरों के निशान थे। जैसे एक नहीं, बल्कि कई बच्चे वहाँ से बाहर निकले हों।
कस्बे में अब कोई उस तांत्रिक को नहीं ढूंढ पाया। वह जैसे हवा में गायब हो गया था।
लेकिन असली डर अभी खत्म नहीं हुआ था।
कुछ दिनों बाद, कस्बे के अलग अलग घरों से एक ही आवाज आने लगी। रात के सन्नाटे में, दरवाजे के बाहर से।
धीमी, मासूम और डरावनी।
“बाबा… दरवाजा खोलो…”
और जो भी उस आवाज को सुनकर दरवाजा खोलता, वह अगली सुबह कहीं नहीं मिलता। गंगा के किनारे अब हर रात हल्की सी हँसी गूंजती है। और मसान की राख अब भी गर्म है, जैसे कोई उसे बार बार कुरेद रहा हो। कहते हैं अब उस तांत्रिक की जरूरत भी नहीं रही। दरवाजा एक बार खुल चुका है। अब वह खुद ही लोगों को बुला रहा है।