काया ने महसूस कर लिया था कि भूपेंद्र पिछले कुछ दिनों से उखड़ा-उखड़ा रहता है। उसके चेहरे की हवाइयाँ और उसकी चुप्पी काया को आशंकित कर रही थी। उसे लगा कि शायद वंशिका की याद या घर के वकील के बढ़ते खर्चे के कारण आई तंगी भूपेंद्र को उससे दूर कर रही है। उसने अपनी पकड़ मज़बूत करने के लिए एक नया और घातक उपाय सोचा। वह बाज़ार गई और अपनी मर्यादा की बची-कुची कतरनें भी बेच आई। उसने अपने लिए ऐसी फ्रॉक खरीदी जो किसी भी सभ्य घर के आंगन में तबाही लाने के लिए काफी थी।
घर आकर जब उसने वह ड्रेस पहनी, तो आईने में अपना अक्स देख उसे गर्व हुआ। वह फ्रॉक न केवल घुटनों से बहुत ऊपर थी, बल्कि उसका कपड़ा इतना बारीक और पारदर्शी था कि वह तन ढकने के बजाय नुमाइश के लिए ज़्यादा लग रहा था। गला इतना गहरा था कि काया की देह का हर उभार साफ़ झलक रहा था।
उसी शाम, भूपेंद्र घर लौट रहा था। उसके चेहरे पर एक फीकी मुस्कान थी। आखिरकार उसे एक छोटी कंपनी में नौकरी मिल गई थी। वेतन मात्र पंद्रह हजार था, जो उसकी पिछली तनख्वाह का एक चौथाई भी नहीं था। लेकिन कुछ न होने से यह बेहतर था। काया के सामने साहब बने रहने के लिए वह अपने दोस्तों से हज़ारों का उधार ले चुका था और अब दोस्त भी कन्नी काटने लगे थे। उसने रास्ते से काया के लिए मोगरे के गजरे खरीदे, यह सोचकर कि उसकी साड़ी पर ये बहुत फबेंगे। उसे क्या पता था कि घर में साड़ी का नामो-निशान तक मिट चुका है।
बेडरूम से निकलकर काया जब हॉल में आई, तो मनोरमा सोफे पर बैठी माला जप रही थीं। जैसे ही उनकी नज़र काया के उघड़े बदन पर पड़ी, उनके हाथ से माला छूट गई। काया उस छोटी सी फ्रॉक में, नंगे कंधों और खुली जाँघों के साथ साक्षात निर्लज्जता की मूरत लग रही थी।
मनोरमा ने अपनी आँखें शर्म से बंद कर लीं। उन्हें वंशिका की वह आधुनिकता याद आई जिस पर वे रोज़ ज्ञान देती थीं। वंशिका जिम जाती थी, टाइट कपड़े पहनती थी, लेकिन वे सोबर और सलीकेदार होते थे। उसमें एक शालीनता होती थी। लेकिन काया का यह रूप तो भड़काऊ और बाज़ारी था।
काया ने अपनी कमर मटकाते हुए मनोरमा के पास जाकर पैर सोफे पर रखा, जिससे उसकी ड्रेस और भी ऊपर चढ़ गई। उसने अपने उलझे बालों का जूड़ा बनाया और अपनी गर्दन को तिरछा करके मनोरमा की ओर देखा।
"क्या हुआ बुढ़िया? आँखें क्यों बंद कर लीं? देख... तेरा बेटा इसी हुस्न पर फिदा है। इसी जिस्म की आग ने उसे वंशिका का घर छुड़वाया है," काया ने बड़ी बेहयाई से ठहाका लगाया।
मनोरमा का चेहरा गुस्से और शर्म से तमतमा उठा। "शर्म कर कलमुँही! इस घर की मर्यादा मिट्टी में मिला दी तूने। तू भूल गई है कि इस घर में एक माँ और बड़ी औरत बैठी है?"
काया ने सोफे पर अपने पैर फैलाए और अपने नाखुन चबाते हुए बोली, "माँ? तू तो अब सिर्फ एक फालतू का बोझ है। आज तू अपने इस कमरे से बाहर मत निकलना, क्योंकि आज इसी सोफे पर रंग जमेगा। आज साहब को मैं वो नशा दूँगी कि वो अपनी नौकरी की सारी थकान भूल जाएंगे।"
फिर उसने मनोरमा के कान के पास झुककर ज़हरीले स्वर में कहा, "तू क्या बड़ी-बड़ी बातें करती है? तू भी कभी जवानी में ऐसे ही कुछ पहनकर ससुर जी के सामने जाती, तो शायद वो आज तुझे खुश रखते। देख... ऐसे ही अंग-प्रदर्शन से मर्द काबू में रहते हैं। तूने तो पूरी उम्र घूँघट में निकाल दी, इसीलिए आज तेरी ये हालत है कि दाने-दाने को मोहताज है।"
मनोरमा का जी चाहा कि वे धरती में समा जाएं। काया की बातों में इतनी गंदगी थी कि मनोरमा को लगा उनकी परवरिश और उनकी मर्यादा सरेआम नीलाम हो रही है। काया बार-बार अपने पैरों को सहला रही थी और अपने होंठों को दांतों तले दबाकर भूपेंद्र के आने का इंतज़ार कर रही थी, जैसे वह शिकार के लिए तैयार बैठी हो।
तभी दरवाज़ा खुला और हाथ में गजरा लिए भूपेंद्र अंदर दाखिल हुआ। जैसे ही उसकी नज़र काया पर पड़ी, वह ठिठक गया। उसने काया के लिए साड़ी के हिसाब से गजरे लाए थे, पर सामने तो कुछ और ही मंज़र था।
काया दौड़कर उसके पास आई और उसके गले में बाहें डाल दीं। "कैसे लग रहे हैं साहब? आज आपकी काया कुछ अलग दिख रही है न?"
भूपेंद्र ने एक नज़र अपनी माँ की बंद आँखों पर डाली और दूसरी काया के उघड़े बदन पर। उसे एक पल के लिए घृणा महसूस हुई। उसे लगा जैसे वह घर में नहीं, बल्कि किसी कोठे पर खड़ा है। पंद्रह हजार की नौकरी और सर पर चढ़ा लाखों का कर्ज़... क्या यह आधुनिकता उसे शोभा दे रही थी? लेकिन काया ने उसे मौका ही नहीं दिया। उसने भूपेंद्र के हाथ से गजरे छीने और उन्हें अपने बालों में नहीं, बल्कि अपने चेहरे पर रगड़ते हुए उसे उकसाने लगी। "साहब, गजरे तो बाद में देखेंगे, पहले ये बताइये कि प्रमोशन की पार्टी कब दे रहे हैं?"
भूपेंद्र के हाथ कांपने लगे। वह सच कैसे बताए? वह उस साहब वाली छवि को बचाने के लिए खुद को और कितना गिराएगा?
भूपेंद्र ने जब काया के उस भड़काऊ और अमर्यादित रूप को देखा, तो उसे सुख के बजाय एक अजीब सी जुगुप्सा महसूस हुई। पंद्रह हजार की नौकरी का बोझ और सर पर चढ़े कर्ज के तनाव ने उसकी कामुकता को मार दिया था। उसने चिढ़कर गजरे मेज पर पटके और रुखे स्वर में कहा, "आज बहुत काम किया है, थक गया हूँ। ये सब तमाशा बंद करो।"
उसने एक नज़र अपनी माँ की ओर डाली, जिनकी आँखें शर्म और दुख से झुकी हुई थीं। भूपेंद्र बिना काया की ओर दोबारा देखे चुपचाप अपने कमरे में चला गया। मनोरमा भी अपना अपमान समेटे अपने कमरे में जा दुबकीं। बिस्तर पर लेटे हुए भूपेंद्र का दिमाग फिर से तुलना करने लगा। उसे वंशिका याद आई, जो थककर आने पर उसका सिर सहलाती थी, सलीके से कपड़े पहनती थी और घर की मर्यादा का मान रखती थी। और एक तरफ काया थी, जिसे केवल नुमाइश और फरमाइशों से मतलब था।
कुछ महीने बीत गए। वंशिका का केस अब निर्णायक मोड़ पर था। कोर्ट में बच्चों की कस्टडी को लेकर बहस छिड़ी। मनोरमा ने गवाही दी कि बच्चे बाप के पास रहने चाहिए, क्योंकि वही वंश का चिराग हैं। लेकिन एडवोकेट महिमा ने भूपेंद्र की नई पत्नी का आचरण, उसकी बेरोज़गारी और घर के कलहपूर्ण माहौल के सबूत पेश किए।
जज ने सख्त लहजे में कहा, "एक ऐसा घर जहाँ पिता के अनैतिक संबंध हों और बच्चों की माँ को अपमानित कर निकाला गया हो, वहाँ बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं है।" कस्टडी वंशिका को मिल गई। साथ ही, कोर्ट ने भूपेंद्र को आदेश दिया कि वह वंशिका को एलिमनी (गुजारा भत्ता) के रूप में एक मोटी एकमुश्त रकम और बच्चों के खर्च के लिए हर महीने दस हजार रुपये दे।
कोर्ट रूम में ही भूपेंद्र की आर्थिक स्थिति का काला चिट्ठा खुला। जब एलिमनी की रकम तय हुई, तब पता चला कि भूपेंद्र पहले से ही लाखों के कर्ज में डूबा है। यह सुनते ही पास खड़ी काया के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह तो भूपेंद्र को सोने की खदान समझकर रही थी, यहाँ तो केवल कोयला और कर्ज निकला।
वंशिका ने जब काया के चेहरे पर आती-जाती हवाइयाँ देखीं, तो उसने एक ठंडी और विजयी मुस्कान उछाली। वह मुस्कान काया के कलेजे में आग की तरह लगी। उसने सोचा था मालकिन की जगह लेकर खुद मालकिन बनेगी लेकिन यहां तो सब उल्टा हो गया था।
क्रमशः
ज्योति प्रजापति
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