डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 5 Jyoti Prajapati द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 5

रात के दस बज चुके थे। बच्चों को सुलाने के बाद काया ने पूरे घर का चक्कर लगाया। ड्राइंग रूम की लाइट बंद की, बिखरे हुए खिलौने समेटे और फिर रसोई की ओर बढ़ी। अमूमन इस वक्त तक घर में एक खुशनुमा शांति होती थी, लेकिन आज की शांति भारी थी। भूपेंद्र साहब और वंशिका दीदी के बीच हुई वह बहस हवा में अब भी तैर रही थी।
काया ने अपनी छोटी सी डायरी निकाली जिसमें वह घर के राशन का हिसाब लिखती थी। वह हिसाब लिख तो रही थी, पर उसका ध्यान बार-बार साहब के उस थके हुए चेहरे पर जा रहा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि जिस घर में सब कुछ इतना व्यवस्थित है, वहां अचानक 'और ज्यादा' की चाहत क्यों पैदा हो गई।

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण ने खिड़की पर दस्तक दी, तो काया हमेशा की तरह अपने काम में जुट गई।


"काया! मेरा नींबू पानी," वंशिका की आवाज़ आई। वह जिम जाने के लिए तैयार थी, लेकिन आज उसके चेहरे पर वह पहले जैसी चमक नहीं, बल्कि एक अजीब सी कठोरता थी।

काया ने गिलास पकड़ाते हुए धीरे से कहा, "दीदी, रात को आपने ठीक से खाना नहीं खाया था। आज नाश्ते में कुछ भारी बना दूँ? मेथी के परांठे?"

वंशिका ने बिना उसकी ओर देखे जवाब दिया, "नहीं काया, बस ये पानी काफी है। और सुनो, आज दोपहर में कोई आने वाला है, मेरे जिम के सिलसिले में। घर थोड़ा सलीके से रखना और चाय-नाश्ते का इंतजाम देख लेना।"

"जी दीदी," काया ने सिर झुकाकर कहा। उसने गौर किया कि वंशिका दीदी ने साहब का जिक्र तक नहीं किया, जबकि अमूमन वह सुबह के नाश्ते की मेज पर साथ होती थीं।

भूपेंद्र जब तैयार होकर बाहर आया, तो उसकी आँखें बता रही थीं कि वह रात भर ठीक से सो नहीं पाया है। उसने अपनी मेज पर रखी फाइलें उठाईं और जाने लगा।

"साहब, टिफिन तो ले जाइए," काया ने पीछे से टोकते हुए कहा। "और कल रात की बातों को दिल से मत लगाइए। दीदी बस थोड़े ऊंचे सपने देख रही हैं, बुराई तो कुछ नहीं है इसमें।"

भूपेंद्र ने रुककर काया की ओर देखा। उसे आश्चर्य होता था कि यह महिला, जो खुद इतने दुखों से गुजरी है, कैसे घर के हर सदस्य के मन को पढ़ लेती है। "सपनों में बुराई नहीं है काया, लेकिन उन सपनों की कीमत अगर घर की शांति हो, तो वह सौदा महंगा पड़ता है। खैर, मैं चलता हूँ।"


ऑफिस पहुँचकर भूपेंद्र ने खुद को काम में झोंकना चाहा, लेकिन उसका मन अशांत था। उसका ऑफिस एक ऐसी जगह थी जहाँ वह खुद को सुरक्षित महसूस करता था। वहां वह भूपेंद्र था—एक ईमानदार, आदर्शवादी क्लर्क। लेकिन आज वहां का माहौल भी कुछ बदला-बदला था।
उसके केबिन में उसका एक पुराना साथी, शर्मा आया। 

"भूपेंद्र भाई, सुना है ऊपर से बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स आने वाले हैं। अगर थोड़ा मैनेज कर लें, तो इस महीने सैलरी से ऊपर भी बहुत कुछ हाथ लग सकता है। तुम्हारी तो अब ज़रूरतें भी बढ़ रही होंगी, बच्चे बड़े हो रहे हैं।"


भूपेंद्र ने फाइल से नज़रें उठाईं और शांति से कहा, "शर्मा जी, तीस हजार की नौकरी में जो सुकून की नींद आती है, वह लाखों के मैनेजमेंट में नहीं मिलेगी। मुझे मेरी ईमानदारी ही रहने दीजिए।"

शर्मा कंधे उचकाकर चला गया, "तुम नहीं सुधरोगे। दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई और तुम अभी भी उन्हीं पुराने आदर्शों की पोटली बांधे बैठे हो। या फिर सिर्फ दिखावा है?"

भूपेंद्र ने एक लंबी सांस ली। उसे वंशिका की बातें याद आईं। क्या वाकई वह पीछे छूट रहा है? क्या उसकी ईमानदारी उसके परिवार की खुशियों के आड़े आ रही है?





इधर वंशिका के जिम में आज चर्चा का विषय कुछ और ही था। मिसेज खन्ना एक नई इन्वेस्टमेंट स्कीम के बारे में बता रही थीं जिससे रातों-रात पैसा दोगुना किया जा सकता था।

"देखो वंशिका, तुम यहाँ सिर्फ पसीना बहाकर अमीर नहीं बन सकतीं," मिसेज खन्ना ने ट्रेडमिल पर चलते हुए कहा। 

"तुम्हें बड़े लोगों के साथ उठना-बैठना होगा। देखो, मेरे पति ने पिछले महीने एक नई प्रॉपर्टी ली और आज 
उसकी कीमत डबल हो गई। तुम्हें भी अपना यह छोटा सा जिम अब लक्ज़री क्लब में बदलना चाहिए। पैसा ही पैसे को खींचता है।"

वंशिका के मन में यह बात घर कर गई। उसे लगा कि वह अब तक एक कुएँ की मेंढक बनी रही। उसने तय किया कि वह भूपेंद्र की रजामंदी का इंतज़ार नहीं करेगी। उसने अपने एक पुराने जानकार से संपर्क किया जो बिजनेस लोन और प्रॉपर्टी का काम देखता था।


दोपहर को जब वह शख्स घर आया, तो काया ने उसे चाय और नाश्ता सर्व किया। काया दूर रसोई से उनकी बातें सुन रही थी। लीज, मॉर्टगेज, बैंक गारंटी—ये शब्द काया के लिए नए थे, पर वह इनका भारीपन महसूस कर रही थी। उसे लग रहा था कि वंशिका दीदी कुछ ऐसा करने जा रही हैं जो शायद साहब को पसंद न आए।
वंशिका उस शख्स को समझा रही थी, "मुझे बगल वाला स्पेस हर हाल में चाहिए। आप लोन की कागजी कार्रवाई शुरू कीजिये। गारंटी के तौर पर मैं इस घर के अपने हिस्से के पेपर्स दे सकती हूँ क्या?"

काया के हाथ से चाय की छननी गिरते-गिरते बची। घर के पेपर्स? यह तो बहुत बड़ा जोखिम था। काया का मन हुआ कि वह अभी साहब को फोन करके सब बता दे, लेकिन उसे अपनी मर्यादा पता थी। वह इस घर की सदस्य जैसी थी, पर थी तो एक कर्मचारी ही। साहब और दीदी के निजी मामलों में दखल देना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं था।

दोपहर को जब बच्चे स्कूल से आए, तो काया ने उन्हें बहुत प्यार से नहलाया और उनके साथ खेलने लगी। वह चाहती थी कि बच्चों को घर के इस तनाव का पता न चले।
विहान ने खेलते-खेलते पूछा, "काया, पापा और मम्मा आज बात क्यों नहीं कर रहे? सुबह मम्मा ने पापा को बाय भी नहीं बोला।"

काया ने विहान के गाल सहलाए, "अरे बेटा, बड़े लोग कभी-कभी खामोश रहकर भी बहुत सारी बातें करते हैं। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, देखो मैम ने आज क्या होमवर्क दिया है।"


जब भूपेंद्र घर लौटे, तो वंशिका अपने कमरे में बंद थीं। काया ने चाय बनाई और साहब के पास ले गई। "साहब, चाय लीजिए।"

भूपेंद्र ने चाय का कप पकड़ा और कमरे की बंद खिड़की की ओर देखने लगा। "घर में आज बहुत शांति है काया। डर लगता है ऐसी शांति से।"

काया ने हिम्मत जुटाकर कहा, "साहब, कभी-कभी शांति इसलिए होती है क्योंकि अंदर तूफान पक रहा होता है। आप दीदी से खुलकर बात क्यों नहीं करते? उन्हें समझाइए कि छोटे कदम भी ऊँची मंजिल तक ले जाते हैं, बस दौड़ने की जरूरत नहीं है।"

भूपेंद्र फीकी हंसी हंसा। "उसे समझाना अब मेरे बस से बाहर लग रहा है काया। उसे लगता है कि मेरी सादगी मेरी कमजोरी है। उसे नहीं पता कि इसी सादगी ने इस घर की नींव को बचाकर रखा है।"


उस रात का खाना फिर से खामोशी की भेंट चढ़ गया। वंशिका ने खाने की मेज पर केवल इतना कहा, "मैंने अपने बिजनेस प्लान के लिए कदम उठा लिए हैं भूपेंद्र। मुझे अब तुम्हारी अनुमति की ज़रूरत नहीं, बस सहयोग की उम्मीद है।"

भूपेंद्र ने निवाला मुँह में लेते हुए सिर्फ इतना कहा, "सहयोग गलत रास्ते पर नहीं दिया जाता वंशिका। उम्मीद है तुम जानती हो कि तुम क्या कर रही हो।"

काया रसोई के कोने में खड़ी यह सब देख रही थी। उसे अपना अतीत याद आ गया। कैसे उसके पति की ज़िद और गलत आदतों ने एक हँसता-खेलता घर उजाड़ दिया था। यहाँ पति गलत नहीं था, यहाँ तो महत्वाकांक्षा की आग घर को झुलसा रही थी।
काया ने मन ही मन प्रार्थना की कि यह घर सलामत रहे। क्योंकि अगर यह घर बिखरा, तो उसका भी वह एकमात्र ठिकाना छिन जाएगा जहाँ उसे सम्मान मिला था।




क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

सर्वाधिकार सुरक्षित