रात इतनी गहरी थी कि जैसे अंधेरा खुद सांस ले रहा हो। हवा में एक अजीब सी ठंडक थी और मंदिर के टूटे हुए खंडहरों के बीच खड़े उस पीपल के पेड़ की परछाईं जमीन पर किसी विकृत आकृति की तरह हिल रही थी।
कहते हैं, उस जगह पर कभी एक महान विद्वान ब्राह्मण रहता था, जिसकी मृत्यु के बाद उसकी आत्मा शांति नहीं पा सकी। लोग उसे अब ब्रह्मराक्षस कहते हैं। और उस रात, मैं उसी के ठिकाने पर खड़ा था।
यह घटना उस समय की है जब गाँवों में बिजली नहीं होती थी और रात होते ही हर कोई अपने घरों में दुबक जाता था। मैं अपने गुरु के साथ शास्त्रों का अध्ययन करता था। एक दिन उन्होंने मुझे एक पुरानी ताड़पत्र की पांडुलिपि दी और कहा कि इसे उस पुराने मंदिर में जाकर वापस रख आओ जहाँ से यह लाई गई थी। मैंने पूछा कि वह जगह कहाँ है, तो उन्होंने बस इतना कहा, वहाँ जहाँ कोई जाना नहीं चाहता।
गाँव के बुजुर्गों ने मुझे रोका। उन्होंने कहा कि उस मंदिर में एक ब्रह्मराक्षस रहता है जो कभी एक महान पंडित था। उसने अपने ज्ञान का गलत उपयोग किया और श्रापित हो गया। अब वह उन लोगों को सजा देता है जो अहंकारी होते हैं या पवित्र चीजों का अपमान करते हैं। लेकिन मेरे मन में डर से ज्यादा जिज्ञासा थी।
रात के समय मैं उस मंदिर की ओर निकल पड़ा। जैसे जैसे मैं पास पहुँचा, हवा भारी होने लगी। मंदिर के टूटे हुए द्वार के पास पहुँचते ही मुझे लगा जैसे कोई मुझे देख रहा हो। अंदर कदम रखते ही मेरे पैरों के नीचे सूखे पत्ते चरमराए और वह आवाज पूरे खंडहर में गूंज उठी।
मंदिर के अंदर अजीब सी गंध थी, जैसे कुछ सड़ रहा हो। दीवारों पर पुराने मंत्र लिखे हुए थे, जिनमें से कई जगह जगह से खून जैसे धब्बों से ढके हुए थे। मैंने कांपते हाथों से पांडुलिपि को वेदी पर रखने की कोशिश की ही थी कि अचानक पीछे से किसी के धीमे कदमों की आवाज आई।
मैंने मुड़कर देखा।
अंधेरे में दो जलती हुई आँखें मेरी ओर घूर रही थीं। धीरे धीरे वह आकृति सामने आई। उसका शरीर झुका हुआ था, बाल लंबे और उलझे हुए, गले में टूटे हुए जपमालाओं की माला लटकी थी। उसके चेहरे पर एक विकृत मुस्कान थी और उसकी आँखों में भूख और क्रोध दोनों जल रहे थे।
वह ब्रह्मराक्षस था।
उसने भारी आवाज में कहा, ज्ञान का अपमान क्यों किया। उसकी आवाज में इतनी गहराई थी कि मेरे सीने में कंपन होने लगा। मैंने डरते हुए कहा कि मैं तो बस यह पांडुलिपि वापस रखने आया हूँ।
वह हंसा। उसकी हंसी मंदिर की दीवारों से टकराकर गूंजने लगी। उसने कहा, झूठ मत बोल। यह वही ग्रंथ है जिसे तुमने पढ़ा और उसमें से मंत्र सीखकर अपनी शक्ति बढ़ाई। तुम भी उसी रास्ते पर हो जिस पर मैं था।
मुझे समझ नहीं आया कि वह क्या कह रहा है। मैंने कभी उस ग्रंथ को खोला भी नहीं था।
तभी उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरी आँखों के सामने एक दृश्य उभर आया। मैंने खुद को देखा, उसी पांडुलिपि को पढ़ते हुए, उसमें लिखे मंत्रों का अभ्यास करते हुए। मेरे चेहरे पर एक अजीब सा अहंकार था। मैंने देखा कि मैं अपने ही गुरु से झूठ बोल रहा हूँ और उनकी दी हुई शिक्षा का गलत उपयोग कर रहा हूँ।
मैं घबरा गया। यह कैसे संभव था।
ब्रह्मराक्षस ने कहा, यह तुम्हारा भविष्य है। मैं भी कभी तुम्हारी तरह था। ज्ञान ने मुझे अंधा कर दिया। मैंने उसे हथियार बना लिया। और फिर मुझे श्राप मिला।
मैंने कांपते हुए कहा, मैं ऐसा नहीं करूंगा।
वह और करीब आ गया। उसकी आँखें अब मेरे बिल्कुल सामने थीं। उसने धीरे से कहा, हर कोई यही कहता है।
अचानक उसने पांडुलिपि उठा ली और उसे फाड़ने लगा। मैंने रोकने की कोशिश की लेकिन मेरे हाथ जैसे जड़ हो गए। उसने कहा, अब तुम्हारे पास दो रास्ते हैं। या तो तुम अभी यहीं मर जाओ, या फिर वही बन जाओ जो मैं हूँ।
मैं चिल्लाया, मुझे जाने दो।
तभी मंदिर के बाहर से किसी के आने की आवाज आई। वह मेरे गुरु थे। उन्होंने अंदर आकर एक तेज मंत्र का उच्चारण किया। अचानक पूरा मंदिर कांपने लगा। ब्रह्मराक्षस पीछे हट गया और उसकी चीख पूरे जंगल में गूंज उठी।
गुरु ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे बाहर खींच लिया। हम दोनों दौड़ते हुए मंदिर से दूर आ गए। मैंने पीछे मुड़कर देखा, वह आकृति अब भी दरवाजे पर खड़ी हमें घूर रही थी।
गाँव लौटकर मैंने गुरु से पूछा कि वह सब क्या था। उन्होंने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, हर ब्रह्मराक्षस कभी एक इंसान होता है। और वह तब बनता है जब ज्ञान का गलत उपयोग किया जाता है।
मैंने पूछा, क्या मैं भी वैसा बन सकता हूँ।
उन्होंने मेरी आँखों में देखा और धीरे से कहा, यह तुम्हारे ऊपर है।
उस रात के बाद मैंने उस पांडुलिपि को कभी नहीं छुआ। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
कुछ दिनों बाद, मैंने खुद को रात में नींद में उठकर कुछ लिखते हुए पाया। मेरी उंगलियां खुद ही चल रही थीं। जब सुबह मैंने देखा, तो वह वही मंत्र थे जो मैंने उस दृश्य में देखे थे।
और सबसे डरावनी बात यह थी कि मेरे गले में एक टूटी हुई जपमाला पड़ी थी, जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
उस रात, जब मैं फिर से सोने गया, मुझे लगा जैसे कोई मेरे कान के पास आकर फुसफुसा रहा हो, तुमने पहला कदम उठा लिया है।
मैंने आंखें खोलीं, लेकिन कमरे में कोई नहीं था। सिवाय उस परछाईं के, जो मेरी नहीं थी।