कमरे में हल्की खामोशी थी। खिड़की से आती ठंडी हवा…और बिस्तर पर लेटी शानवी। टुक-टुक अभी भी उसके पास था।
लेकिन अब…शानवी की आँखों में सिर्फ़ डर नहीं था। सवाल थे।
शानवी धीरे-धीरे उठकर बैठ गई। उसने टुक-टुक को अपने सामने रखा। इस बार…वो पीछे नहीं हटी। उसने गहरी साँस ली…और पहली बार… सीधे उसकी आँखों में देखा। टुक-टुक भी उसे देख रहा था। बिल्कुल शांत। बिल्कुल स्थिर। जैसे…कुछ छुपा रहा हो…
या शायद… कुछ कहना चाहता हो।
वो पल…जब शानवी ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया। पहले थोड़ा रुकी…फिर हिम्मत करके…उसके सिर पर हाथ रखा। टुक-टुक ने आँखें बंद कर लीं। फुर्र फुर्र…लेकिन इस बार… ये सिर्फ़ बिल्ली का reaction नहीं था। ये…किसी इंसान जैसा भरोसा था। शानवी की आँखें हल्की बड़ी हो गईं।
शानवी बोली -
तुम… समझ रहे हो ना मैं क्या कर रही हूँ?
उसकी आवाज़ धीमी थी…पर दिल की धड़कन तेज़। टुक-टुक ने धीरे से अपना सिर उसकी हथेली में और दबा दिया।
अब शानवी को साफ़ महसूस हो रहा था ये हर स्पर्श को समझ रहा है ये उसकी भावनाओं पर react कर रहा है ये सिर्फ़ instinct नहीं…👉 सोच-समझकर जवाब दे रहा है
उसने धीरे से फुसफुसाया—
तुम… इंसान हो ना?
कमरे में सन्नाटा छा गया। एक पल के लिए…सब कुछ रुक गया।
टुक-टुक हिला नहीं। बस उसकी आँखों में देखता रहा।
शानवी का डर अब…धीरे-धीरे बदल रहा था।
डर → curiosity → जुड़ाव
वो बोली -
अगर तुम सच में इंसान हो....तो तुम मुझे नुकसान क्यों नहीं पहुँचाना चाहते…?
उसने धीरे से उसे अपनी गोद में उठा लिया। इस बार…डर कम था।
और अपनापन… थोड़ा ज़्यादा।कोने में…कार्तिकेय (टुक-टुक) का दिल तेज़ धड़क रहा था।
वो मन में बोला -
वो सच के बहुत करीब आ गई है…अब… मैं कब तक छुप पाऊँगा?
कमरे में सन्नाटा था। सिर्फ घड़ी की हल्की टिक-टिक…और दो धड़कनों की आवाज़। शानवी ने टुक-टुक को अपनी गोद में पकड़ रखा था। उसकी उंगलियाँ हल्के-हल्के उसके फर को सहला रही थीं। लेकिन इस बार…उसकी आँखों में डर नहीं था। सीधा सवाल था।
शानवी ने गहरी साँस ली…और धीरे से कहा—
तुम… कौन हो?
टुक-टुक बिल्कुल स्थिर हो गया। उसकी आँखें…सीधे शानवी की आँखों में टिक गईं।
वो बोली -
तुम सिर्फ बिल्ली नहीं हो… है ना?
कमरे की हवा जैसे भारी हो गई। कार्तिकेय के अंदर तूफान चल रहा था।
वो मन ही मन बोला -
बस… अब छुप नहीं सकता…वो समझ चुकी है…।
शानवी ने उसका चेहरा अपने हाथों में लिया।
वो बोली -
अगर तुम इंसान हो…तो मुझे बताओ…।
उसकी आवाज़ काँप रही थी…लेकिन उसमें भरोसा भी था कार्तिकेय का दिल तेज़ धड़कने लगा। उसने धीरे से अपना सिर उठाया। उसकी आँखों में अब सिर्फ़ मासूमियत नहीं… एक इंसान की भावनाएँ साफ दिख रही थीं। उसका शरीर हल्का सा काँपा…
जैसे वो… अभी बदलने वाला हो… शानवी की साँस रुक गई।
वो बोली -
ये… क्या…
अचानक…खिड़की से तेज़ हवा आई। परदे जोर से हिले। टुक-टुक अचानक उसकी गोद से कूद गया। और… फिर से सामान्य बिल्ली जैसा व्यवहार करने लगा। म्याऊं…फुर्र फुर्र…जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
शानवी वहीं बैठी रह गई। हाथ हवा में रुके हुए। दिल जोर से धड़क रहा था।
वो बोली -
अभी… अभी क्या होने वाला था?
मैंने सच में… कुछ देखा था… या…?
उसने टुक-टुक को देखा। वो अब भी मासूम सा बैठा था। लेकिन अब…
शानवी को यकीन हो गया था—
इसमें… कुछ है।
कुछ बहुत बड़ा… जो मुझसे छुपाया जा रहा है…।
कोने में बैठा कार्तिकेय… अंदर से टूट चुका था।
वो बोला -
मैं बता देता…पर… अगर वो डर गई तो?
उसने आँखें बंद कर लीं।
वो बोला -
थोड़ा और… बस थोड़ा और…
रात गहरी हो चुकी थी। कमरे में हल्की अंधेरी रोशनी…और शानवी बिस्तर पर बैठी थी। उसकी आँखें टुक-टुक पर टिकी थीं। अब डर कम था…जिद ज़्यादा थी।
वो बोली -
आज… मुझे सच जानना ही है…।
घड़ी धीरे-धीरे 12 के करीब जा रही थी। कार्तिकेय बेचैन था। दिल की धड़कन तेज़…।
वो बोला -
नहीं… आज नहीं…अगर ये देख लेगी तो सब खत्म…।
वो खिड़की की तरफ भागने लगा लेकिन…अचानक…दरवाज़ा तेज़ हवा से बंद हो गया। खिड़की शानवी ने बंद कर दी। कमरे में अजीब सी ठंड फैल गई। टुक-टुक वहीं रुक गया।
वो बोला -
ये… क्या…?
कार्तिकेय समझ गया वो उसे जाने नहीं दे रही। वो पल…जब घड़ी ने 12 बजाए। और…टुक-टुक का शरीर काँपने लगा। धीरे-धीरे…
उसका रूप बदलने लगा। पंजे… हाथ बने , छोटा शरीर… लंबा होने लगा, फर… गायब होने लगा।
शानवी की आँखें फैल गईं। साँस रुक गई। वो पीछे हट गई…
वो बोली -
ये… ये क्या हो रहा है…?
कुछ ही सेकंड में…उसके सामने…एक लड़का खड़ा था। सफेद शर्ट…गहरी आँखें…और चेहरा… वही…जिसकी फोटो उसने फाइल में देखी थी।
शानवी के होंठ काँपने लगे—
त… तुम…कार्तिकेय…?
कार्तिकेय चुप खड़ा था। उसकी आँखों में डर भी था…और राहत भी।
वो बोला -
हाँ…मैं… वही हूँ…।
शानवी पीछे हट गई। दिल जोर से धड़क रहा था।
वो बोला -
तुम… मेरे साथ थे… इतने दिनों से?
तुम… बिल्ली बनकर…?
कार्तिकेय ने नज़रें झुका लीं वो बोला—
मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता था…
मैं बस… तुम्हारे पास रहना चाहता था…
कमरे में सन्नाटा छा गया।
एक तरफ…👉 सच्चाई
दूसरी तरफ…👉 डर और टूटता हुआ भरोसा
🌫️ अंत में…
शानवी की आँखों में आँसू थे।
वो बोली -
तो… टुक-टुक… तुम ही थे…
कार्तिकेय ने धीरे से सिर हिलाया। कमरे में सन्नाटा था। सामने खड़ा था… कार्तिकेय। और सामने…शानवी। जिसकी दुनिया अभी-अभी बदल गई थी। शानवी एकदम पीछे हट गई। उसकी आँखों में डर था…और गुस्सा भी।
वो बोली -
तुम… इतने दिनों से… मेरे साथ… इस तरह…?
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
वो बोली -
तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?
मैं तुम्हें… अपना समझकर… तुमसे बातें करती रही…और तुम…?
आँसू उसकी आँखों से गिरने लगे।
कार्तिकेय ने धीरे से कहा—
मैं मजबूर था…
शानवी ने सिर झटका और बोली—
मजबूरी?
ये कोई मजबूरी होती है?
तुमने मुझे डराया… मुझे बेवकूफ बनाया!
उसका दिल टूट चुका था।
वो बोली -
तुम्हें अंदाज़ा भी है… मैं कितनी डर गई थी?
कार्तिकेय चुप रहा। उसकी आँखों में दर्द साफ दिख रहा था।
वो बोला -
मैं… तुम्हें खोना नहीं चाहता था…।
शानवी ने गुस्से में कहा—
अब बताओ… पूरा सच क्या है?
कार्तिकेय ने गहरी साँस ली और बोला -
मैं… 24 साल पहले… एक इंसान था…
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
वो बोला -
एक तांत्रिक था… बहुत शक्तिशाली…उसने अपनी ही बेटी को…
एक भयानक क्रिया में बलि दे दी…। मैं उसकी बेटी से प्यार करता था, वो भी मुझसे प्यार करती थी। पर उस तांत्रिक को आम इंसानों से सख्त नफरत थी।
शानवी की आँखें फैल गईं।
वो बोला -
मैंने उसे रोकने की कोशिश की…लेकिन… वो मुझसे और भी ज्यादा नफरत करने लगा…।
उसने मुझे श्राप दिया…कि मैं दिन में एक जानवर बनकर जिऊँगा…और रात में ही इंसान बन पाऊँगा…।
उसकी आवाज़ भारी हो गई।
वो बोला -
और जब तक… कोई मुझे दिल से स्वीकार नहीं करेगा…मैं इस श्राप से मुक्त नहीं हो सकता…।
शानवी चुप हो गई। उसका गुस्सा धीरे-धीरे… दर्द में बदल रहा था।
वो बोली -
तो… तुम मेरे पास इसलिए आए?
कार्तिकेय ने उसकी तरफ देखा और बोला —
क्योंकि… तुम बिल्कुल वैसी ही लगती हो…जैसी वो लड़की थी…
शायद… उसका दूसरा जन्म…।
शानवी का दिल काँप गया। उसने धीरे से पीछे कदम बढ़ाया।
वो बोली -
तो… मैं बस… एक वजह हूँ?
तुम्हारे श्राप को तोड़ने का तरीका?
कार्तिकेय चुप हो गया।
वो बोला -
नहीं… अब नहीं…अब… मैं तुम्हें सच में…
वो रुक गया।
शानवी ने हाथ उठा दिया और बोली—
बस!
उसकी आँखों में आँसू थे।
वो बोली -
मुझे… थोड़ा समय चाहिए…मैं… ये सब एक साथ accept नहीं कर सकती…।
वो मुड़ी…और कमरे से बाहर चली गई। कार्तिकेय वहीं खड़ा रह गया। अकेला।
वो बोला -
मैंने… सब खो दिया क्या…?