एक माँ आज रो रही है।
उसका दम घुट रहा है, वह धीरे-धीरे मर रही है।
क्या कोई उसकी पीड़ा को समझ पाएगा,
या यह दर्द उसे उसके अंत की ओर ले जाएगा?
मैं उसे देख रही हूँ…
क्योंकि मैं उसी की कोख में पिछले पच्चीस सालों से रह रही हूँ।
उसकी कोख में मुझे हमेशा सुकून मिला है।
लेकिन आज वही कोख घायल हो रही है,
जिसे हमें संभालना था,
जिसे हमें बचाना था…
आज उसी को मार दिया जा रहा है।
जिस जीव ने सबसे पहले इसकी कोख से जन्म लिया होगा,
क्या उसने कभी सोचा होगा कि एक दिन अपनी ही माँ का अंत देखने की नौबत आ जाएगी?
क्या मैंने कभी सोचा था कि मेरे ही हाथों मेरी माँ का अंत होगा?
नहीं… बिल्कुल भी नहीं।
लेकिन आज इंसान के हर कदम के साथ
वही माँ, जिसने हमें जन्म दिया,
धीरे-धीरे घायल होती जा रही है।
क्या वह दुनिया अच्छी थी,
जब इंसान ने आग का आविष्कार भी नहीं किया था?
या आज की यह दुनिया अच्छी है,
जहाँ उसी माँ की कोख में
उसके ही बच्चों के बनाए हुए आविष्कार
आज उसके विनाश का कारण बन रहे हैं?
कभी जो आविष्कार जीवन को आसान बनाने के लिए किए गए थे,
आज वही धरती की साँसें छीनते जा रहे हैं।
आज पृथ्वी को बने लगभग 4.54 अरब वर्ष हो चुके हैं, ऐसा वैज्ञानिकों का मानना है। वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि पृथ्वी का निर्माण एक बार में नहीं हुआ, बल्कि यह प्रक्रिया धीरे-धीरे चलती रही और आज भी किसी न किसी रूप में चल रही है।
जब पृथ्वी का निर्माण हुआ था, तब यहाँ वह सब कुछ नहीं था जो आज हम देखते हैं—न हरे-भरे जंगल, न नदियाँ, न पहाड़ और न ही जीवन। समय के साथ-साथ पृथ्वी बदलती रही और धीरे-धीरे जीवन का जन्म हुआ।
जिसे हम आज “माँ पृथ्वी” कहते हैं, वह सच में हमारी माँ की तरह ही है। जैसे हम अपनी माँ की कोख से जन्म लेते हैं, वैसे ही इस पृथ्वी पर मौजूद हर जीव ने इसी की कोख से जन्म लिया है।
अगर यह हमारी माँ है, तो फिर हम इसके साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं?
क्या हम कभी अपनी माँ को जानबूझकर दर्द देते हैं?
लेकिन आज इंसान अपनी ही माँ को तकलीफ दे रहा है—जंगल काटकर, नदियों को गंदा करके, हवा को ज़हर से भरकर और युद्धों से इस धरती को घायल कर रहा है।
पृथ्वी हमें जीवन देती है, फिर भी हम उसे तड़प-तड़प कर मरने पर मजबूर कर रहे हैं।
जिस पृथ्वी ने हमें जन्म दिया, हमें इतनी सुंदर ज़िंदगी दी और अपने अनगिनत उपहारों से हमारी दुनिया भर दी,
आज वही पृथ्वी दर्द से गुजर रही है।
क्या कभी इंसान रुककर यह समझ पाएगा कि उसकी अपनी माँ किन तकलीफ़ों से गुजर रही है?जब मानव का विकास हुआ,
तब उसने अपनी ज़रूरतों के अनुसार जीना सीख लिया।
धीरे-धीरे उसके मानसिक और बुद्धि के विकास ने
उसे इस पृथ्वी पर रहने वाले सभी जीवों से अधिक शक्तिशाली बना दिया।
अपनी बुद्धि के बल पर उसने नए-नए आविष्कार किए,
प्रकृति को समझा और उसे अपने अनुसार बदलना शुरू कर दिया।माँ ने अपने बच्चों को सब कुछ दिया।
हर वह सुविधा दी, जिसकी उन्हें ज़रूरत थी।
उसने अपनी गोद में उन्हें पनाह दी,
अपने संसाधनों से उनकी हर आवश्यकता पूरी की।
लेकिन शायद माँ ने कभी नहीं सोचा होगा
कि एक दिन वही बच्चे
उसके अस्तित्व के लिए खतरा बन जाएँगे।और उनके पिता ने उन्हें वह दिया
जो उनकी माँ नहीं दे सकती थी—
अंधकार से दूर रहने का सहारा।
उनके पिता ने उन्हें उजाला दिया,
ताकि वे इस दुनिया को देख सकें,
समझ सकें और जीवन जी सकें।धीरे-धीरे माँ का बँटवारा होता गया।
उसके इतने टुकड़े किए गए कि उनकी कोई सीमा ही नहीं रही।
कभी जो माँ सबकी एक थी,
आज उसे देशों, सीमाओं और झंडों में बाँट दिया गया।
इंसान भूल गया कि धरती का सीना
रेखाओं से नहीं बँटता,
वह तो हमेशा सबकी एक ही माँ रहती है।और अब सब अपनी-अपनी होड़ में लगे हैं—
कौन सबसे आगे निकले,
कौन सबसे अधिक शक्तिशाली बने।
हर चीज़ में आगे बढ़ने की इस दौड़ में
इंसान यह भूल गया है
कि जिस धरती ने उसे जन्म दिया,
वही धीरे-धीरे उसकी इस होड़ का बोझ सह रही है।और कब तक वह सब कुछ सहती रहेगी,
यह किसी को नहीं पता।
कौन जानता है कि कब वह
अपना सीना चीर ले
और अपने ही बच्चों को
अपने अंदर समा ले।
क्योंकि जब माँ की सहनशीलता की सीमा टूटती है,
तो उसका दर्द पूरी दुनिया महसूस करती है।