कोख से अंत तक - 2 ARTI MEENA द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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कोख से अंत तक - 2

“माँ, जिसका काम है चोट खाकर भी फिर से खड़े हो जाना, वह अपने घाव भर लेगी। लेकिन अगर उसकी ही कोख में अब हम सुरक्षित नहीं रह सकते, तो वह फिर जीवन को जन्म दे देगी। पर क्या हम ही अपने भविष्य को खोते जा रहे हैं? शायद हम दोबारा इस धरती माँ की गोद में जन्म ही न ले पाएं।
तो फिर हम यह विकास किसके लिए कर रहे हैं? क्या हमने इतना विकास सिर्फ इसलिए किया है कि अंत में हम ही न रहें? अगर हमारी आने वाली पीढ़ियाँ ही सुरक्षित नहीं रहेंगी, तो इस प्रगति का अर्थ क्या रह जाएगा?”“आज जब हर देश विकास की ऊँचाइयों को छू चुका है—चाँद और मंगल तक पहुँच गया है, अंतरिक्ष में अपनी जगह बना चुका है—तो एक अनकही होड़ सी लग गई है कि कौन सबसे पहले नए-नए आविष्कार करेगा।
लेकिन यह कैसी होड़ है? हम सबको जन्म देने वाली प्रकृति एक ही माँ है। आज भले ही हम अलग-अलग देशों और सीमाओं में बँट गए हों, लेकिन हमारे भीतर बहता रक्त एक जैसा है, और हर इंसान को भूख, प्यास और जीवन की जरूरतें समान रूप से महसूस होती हैं।
तो फिर यह प्रतिस्पर्धा किसलिए? क्या इंसान ने कभी ऐसी दुनिया बनाने का सपना देखा था, जहाँ आगे चलकर न पानी बचे, न साफ़ हवा? क्या हमने कभी यह सोचा था कि हमारी ही आने वाली पीढ़ियाँ साँस लेने के लिए तरस जाएँगी?”आज हमने सब कुछ देख लिया है—चाहे युद्ध हों, चाहे दुनिया की सबसे बड़ी महामारी, या फिर भयानक भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएँ।
लेकिन सवाल यह है कि ऐसा हो क्यों रहा है? हाँ, कुछ कारण प्रकृति से जुड़े होते हैं, लेकिन यह भी सच है कि इंसान का लालच और स्वार्थ अब इतना बढ़ गया है कि वह खुद इंसान को ही नुकसान पहुँचाने लगा है।
हमने विकास तो बहुत कर लिया है, लेकिन क्या हमने इंसानियत को उतना ही आगे बढ़ाया है? यही सबसे बड़ा सवाल है आज के समय में।”जब मैं अपने नज़रिए से इस दुनिया को देखती हूँ, तो कई बार सोच में पड़ जाती हूँ—क्या इंसान का इतना समझदार होना सही था? या अगर हमारी बुद्धि भी जानवरों जैसी सीमित होती, तो शायद सब कुछ सरल होता।
क्या हमारा विकास दूसरी जीवों की ज़िंदगी को और मुश्किल में डाल रहा है? क्या आज उनके साथ सबसे बड़ा अन्याय नहीं हो रहा है?
कभी-कभी लगता है कि अगर प्रकृति ने उन्हें भी थोड़ी समझदारी दी होती, तो शायद वे भी अपने लिए एक सुरक्षित स्थान बना सकते थे।
मैं सोचती हूँ कि यह गलती समाज की व्यवस्था की है या धर्म और विचारधाराओं की। हर देश में धर्म इतना महत्वपूर्ण क्यों है? और क्या कभी इंसानियत, धर्म और सीमाओं से ऊपर उठकर सबसे बड़ी पहचान बन पाएगी?”जब मैं बचपन में गाँव के खेतों में घूमने जाया करती थी, तब पक्षियों की चहचहाहट सुनकर मन खुशी से भर जाता था। भारत के गाँव कभी सुकून, हरियाली और प्रकृति की गोद का प्रतीक हुआ करते थे। सुबह की शुरुआत पक्षियों के मधुर स्वर से होती थी और शामें भी प्रकृति के संगीत में बीतती थीं।
लेकिन आज, वर्षों बाद जब उन्हीं गाँवों में जाती हूँ, तो वह दृश्य कहीं खो गया सा लगता है। वे पक्षी, जिनकी आवाज़ें कभी हर दिशा में गूँजती थीं, अब बहुत कम दिखाई देते हैं। इसका कारण हम सभी जानते हैं। बढ़ता प्रदूषण, पेड़ों की कटाई, रासायनिक खेती, और लगातार फैलता शहरीकरण उनके प्राकृतिक आवासों को समाप्त कर रहा है।
हम जिस विकास पर गर्व करते हैं, वही विकास धीरे-धीरे प्रकृति के संतुलन को निगलता जा रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाली एक-दो सदियों में शायद बहुत कुछ केवल किताबों और तस्वीरों में ही रह जाए। सवाल यह नहीं है कि हम कितनी तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या हम अपने साथ उस प्रकृति को भी बचा पा रहे हैं, जिसके बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं है।”“जब मैं दुनिया के देशों को देखती हूँ—चाहे यूरोप हो, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या एशिया के अन्य राष्ट्र—तो लगता है कि इतिहास में सभी ने कहीं न कहीं ऐसी गलतियाँ की हैं, जिनके परिणाम आज पूरी मानवता भुगत रही है।
इतिहास हमें बताता है कि कभी शक्तिशाली साम्राज्यों ने अपने प्रभाव और नियंत्रण को बढ़ाने के लिए दूसरे देशों पर शासन किया। आज दुनिया का स्वरूप बदल चुका है, लेकिन देशों के बीच प्रभाव, शक्ति, संसाधनों और नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा अब भी मौजूद है।
सवाल यह है कि यदि विज्ञान, तकनीक और शिक्षा ने हमें इतना आगे बढ़ा दिया है, तो क्या हमारी सोच भी उतनी ही आगे बढ़ी है? क्या शक्ति का उद्देश्य केवल दूसरों से आगे निकलना होना चाहिए, या फिर पूरी मानवता के लिए बेहतर भविष्य बनाना?
दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियाँ—जलवायु परिवर्तन, गरीबी, महामारी, युद्ध और संसाधनों की कमी—किसी एक देश की नहीं हैं। इनका समाधान भी तभी संभव है जब राष्ट्र प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग को भी महत्व दें।
शायद असली महानता सबसे शक्तिशाली बनने में नहीं, बल्कि अपनी शक्ति का उपयोग मानवता और पृथ्वी के कल्याण के लिए करने में है।”