अधिनियम ३:
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दृश्य १९ – आर्यव का ठिकाना | गुरुवार रात ११ बजे
अंदर – गोवंडी की झुग्गी – रात
एक छोटा-सा कमरा। दीवार पर मुंबई का नक्शा, उस पर लाल निशान। मेज पर हथियार रखे हैं – पिस्तौल, चाकू, गोलियां, ग्रेनेड। आर्यव मेज के सामने बैठा है, अपनी पिस्तौल साफ कर रहा है – धीरे-धीरे, ध्यान से, जैसे कोई पुजारी पूजा कर रहा हो।
करीम कोने में बैठा है, उसे देख रहा है। उसके चेहरे पर डर और उत्सुकता दोनों हैं।
करीम: (धीमे से)
"कल रात है। चर्च में। तू अकेला जाएगा?"
आर्यव: (बिना पिस्तौल से नज़र हटाए)
"अकेला।"
करीम: "मैं भी चलूंगा।"
आर्यव: (अब करीम की ओर देखता है)
"नहीं। यह मेरी लड़ाई है। तू बाहर रहेगा। देखता रहेगा। अगर मैं न निकल पाऊं... तो यहाँ आकर यह सब जला देना।"
वह एक छोटी-सी डायरी करीम की ओर सरकाता है।
करीम: (डायरी उठाते हुए)
"यह क्या है?"
आर्यव: "सब कुछ। कबीर के बारे में, बाज़ के बारे में, उन सबके बारे में जिन्हें मैंने मारा। अगर मैं कल नहीं बचा... तो यह सच दुनिया के सामने आना चाहिए।"
करीम डायरी को देखता है – मोटी, पन्नों से भरी। फिर वह आर्यव को देखता है – उसकी आंखों में अब वही ठंडक नहीं है, थोड़ी नरमी है।
करीम: "तू वापस आएगा। तुझे आना ही होगा।"
आर्यव: (हल्की-सी मुस्कान के साथ)
"कोशिश करूंगा।"
वह उठता है, अलमारी से एक पुराना डिब्बा निकालता है। उसे खोलता है – अंदर वही तस्वीरें हैं – अन्या, मीरा, और वह। वह एक तस्वीर निकालता है – जिसमें तीनों हैं, सब हंस रहे हैं। उसे देर तक देखता है।
आर्यव (वॉइसओवर): (धीमा, भावुक)
"अन्या... मीरा... कल मैं उस आदमी से मिलने जा रहा हूं जिसने तुम्हें मुझसे छीना। पांच साल... पांच साल मैंने इस दिन का इंतजार किया। अगर कल मैं नहीं बचा... तो जानना कि मैं तुमसे हर रोज़ मिलता था। हर रात तुम्हें याद करता था। तुम मेरे साथ हो, हमेशा।"
वह तस्वीर को अपने सीने से लगाता है – एक पल के लिए। फिर उसे वापस डिब्बे में रखता है, और डिब्बा अलमारी में।
वह मुड़ता है, करीम की ओर देखता है।
आर्यव: "जा अब। सुबह मिलते हैं। आराम कर ले। कल बड़ा दिन है।"
करीम उठता है, जाते-जाते रुकता है।
करीम: "आर्यव... तू जानता है... मैंने अपने बाप को खोया, अपनी माँ को खोया... लेकिन तुझे पाकर लगा जैसे मुझे कोई मिल गया। तू मेरा... भाई जैसा है।"
आर्यव एक पल चुप रहता है। फिर वह करीम के पास जाता है, उसके कंधे पर हाथ रखता है।
आर्यव: "और तू मेरा... परिवार है। अब जा।"
करीम चला जाता है। दरवाजा बंद होता है।
आर्यव अकेला रह जाता है। वह खिड़की के पास जाता है, बाहर अंधेरे को देखता है। उसकी आंखों में आंसू हैं – लेकिन वह बहने नहीं देता।
वह अपनी घड़ी देखता है। रात के १२ बज रहे हैं। वह बटन दबाता है – ००:६०।
आर्यव (वॉइसओवर): "साठ सेकंड। कल ये साठ सेकंड मेरे होंगे। या कबीर के। देखते हैं किस्मत किसके साथ है। लेकिन एक बात पक्की – चाहे जो हो, आज के बाद कबीर राणा नहीं रहेगा। और बाज़... बाज़ हमेशा के लिए खत्म।"
वह घड़ी बंद करता है। लाइट बंद करता है। अंधेरे में उसकी आकृति धीरे-धीरे गायब हो जाती है।
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दृश्य २० – पुराना चर्च, गिरिगांव | शुक्रवार रात १०:३०
बाहरी – पुराना चर्च – रात
गिरिगांव के बीचों-बीच एक पुराना चर्च। यह अब इस्तेमाल नहीं होता – सालों से बंद है। इसकी दीवारों पर जंगली बेलें चढ़ गई हैं, रंगीन कांच की खिड़कियां टूट चुकी हैं, और घंटी टॉवर में अब सिर्फ कबूतर रहते हैं। चारों तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें हैं, लेकिन यह चर्च उनके बीच अकेला खड़ा है – एक भूत की तरह।
आज रात... यहां कुछ अलग होने वाला है।
चर्च के चारों तरफ अंधेरा है। दूर-दूर तक कोई रोशनी नहीं – गली की लाइटें भी बुझ गई हैं। सिर्फ चांदनी, जो टूटी खिड़कियों से अंदर झांक रही है। हवा चल रही है – ठंडी, सीटी मारती हुई।
चर्च के अंदर – तीस हथियारबंद आदमी। वे हर जगह हैं – प्यू के पीछे, अल्टार के पास, कन्फेशन बॉक्स में, ऊपर गैलरी में, खंभों के पीछे। सबके हाथों में हथियार – AK-47, शॉटगन, पिस्तौल, ग्रेनेड। कुछ के पास स्नाइपर राइफलें हैं, ऊपर की गैलरी में।
वे चुप हैं, सिर्फ आंखें हिल रही हैं। हर कोई अपनी जगह पर तैनात है, हर कोई तैयार है।
बीच में खड़ा है कबीर राणा। उसने पुलिस की वर्दी नहीं पहनी है – साधारण काले कपड़े, लेकिन उसके चेहरे पर वही अहंकार है, वही ठंडक। उसके हाथ में भी एक पिस्तौल है – सुंदर, चांदी जड़ी, कस्टम-मेड।
कबीर राणा: (अपने आदमियों से, ऊंची आवाज़ में, ताकि सब सुन सकें)
"याद रखना – वो अकेला है। सिर्फ एक आदमी है। लेकिन वो सौ के बराबर है। उसे कम मत समझना। जैसे ही दिखे, गोली मार देना। कोई सवाल नहीं, कोई बातचीत नहीं, कोई हीरोइज्म नहीं। बस मारो। एक साथ, सब लोग। और देखना कि वो गिरे – पूरी तरह गिरे।"
एक आदमी: (ऊपर गैलरी से)
"सर, अगर वो नहीं आया? अगर यह कोई जाल है?"
कबीर राणा: (ठंडी हंसी के साथ)
"वो आएगा। वो आएगा जरूर। उसे मालूम है कि मैं यहां हूं। और वो जानता है कि यही आखिरी मौका है। पांच साल का बदला... वो यहीं पूरा होगा। आज रात।"
वह घड़ी देखता है – रात के १०:४५।
कबीर राणा: "पंद्रह मिनट।"
वह अल्टार के पास जाता है, वहां एक बड़ी कुर्सी पर बैठ जाता है – जैसे कोई राजा सिंहासन पर बैठता है। उसके चारों तरफ उसके सबसे वफादार चार आदमी खड़े हैं – बॉडीगार्ड की तरह।
कबीर राणा: (अकेले में, धीमे से)
"आर्यव... पांच साल पहले मैंने तुझे खत्म कर देना चाहिए था। लेकिन तब तू काम का था। तेरी शूटिंग स्किल काम की थी। अब... अब तू सिर्फ एक कीड़ा है, जिसे कुचलना है। और आज रात... मैं कुचल दूंगा।"
वह मुस्कुराता है – एक खतरनाक, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान।
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दृश्य २१ – चर्च के बाहर | रात १०:५०
बाहरी – चर्च के पास की इमारत – रात
आर्यव और करीम एक पुरानी इमारत की छत पर हैं। वहां से चर्च साफ दिखता है – सामने, बिल्कुल साफ। आर्यव के हाथ में दूरबीन है। वह हर खिड़की, हर दरवाजा, हर संभावित स्थान को देख रहा है जहां कोई छिप सकता है। उसकी आंखें हर छोटी से छोटी डिटेल को नोट कर रही हैं।
करीम: (दूरबीन से देखते हुए)
"कितने हैं?"
आर्यव: (शांति से)
"तीस। शायद बत्तीस। हर जगह हैं – प्यू के पीछे, खंभों के पीछे, ऊपर गैलरी में। तीन स्नाइपर ऊपर। चार आदमी कबीर के आसपास – बॉडीगार्ड। बाकी फैले हुए। अंदर घुसना मुश्किल होगा। बहुत मुश्किल।"
करीम: (डरी हुई आवाज़ में)
"तो क्या करेंगे? इतने सारों के सामने अकेले?"
आर्यव: (दूरबीन नीचे रखते हुए)
"अंदर घुसेंगे। जैसे भी हो।"
करीम: "लेकिन... तीस के खिलाफ अकेले? यह पागलपन है!"
आर्यव: (करीम की ओर देखता है – उसकी आंखों में वही ठंडक, लेकिन अब थोड़ी नरमी भी)
"मैं अकेला नहीं हूं। तू है।"
करीम चौंकता है – हैरान, डरा हुआ, लेकिन उत्सुक भी।
करीम: "मैं? मैं क्या कर सकता हूं? मैंने कभी गोली नहीं चलाई। मैं तो बस..."
आर्यव: (उसके कंधे पर हाथ रखते हुए)
"तुझे गोली चलाने की जरूरत नहीं। तू बस मेरी आंखें बनेगा। ऊपर से। मुझे बताता रहेगा कि कहां कौन है, कहां से खतरा है, कब क्या करना है। तू मेरा नियंत्रण कक्ष होगा।"
आर्यव एक छोटा-सा बैग खोलता है। उसमें से एक वॉकी-टॉकी निकालता है, और एक छोटा कैमरा – पेन कैमरा, बटन के आकार का।
आर्यव: "ये कैमरा मैं अपनी शर्ट पर लगा लूंगा। तू यहाँ बैठकर इसकी स्क्रीन पर सब कुछ देख सकेगा। और ये वॉकी-टॉकी – इससे तू मुझसे बात कर सकेगा। बस याद रख – जब मैं अंदर जाऊं, तू हरकत पर नज़र रख। बता कौन कहां जा रहा है, कौन कहां छिपा है। समझा?"
करीम: (डरा हुआ, लेकिन दृढ़)
"समझ गया। मैं करूंगा। तू बस... तू बच के रहना।"
आर्यव हल्का-सा मुस्कुराता है – पांच सालों में पहली बार इतनी गहराई से।
आर्यव: "कोशिश करूंगा।"
वह कैमरा लगाता है, वॉकी-टॉकी चेक करता है। फिर वह अपने हथियार चेक करता है – दो पिस्तौल (एक में साइलेंसर लगा है), एक चाकू, तीन ग्रेनेड (एक स्मोक, दो फ्रैग्मेंटेशन)। सब ठीक है।
वह अपनी घड़ी देखता है – रात के १०:५८।
आर्यव: "दो मिनट।"
वह सीढ़ियों से नीचे उतरने लगता है – धीरे-धीरे, चुपचाप।
करीम: (पीछे से)
"आर्यव!"
आर्यव रुकता है – बिना मुड़े।
करीम: (भरे गले से)
"तुम... तुम वापस आओगे ना? वादा करो।"
आर्यव एक पल रुकता है। फिर वह धीरे-धीरे मुड़ता है – करीम की ओर देखता है। उसकी आंखों में अब वह ठंडक नहीं है – कुछ और है। शायद पिता जैसा प्यार, शायद भाई जैसा अपनापन।
आर्यव: (धीमे, मगर दृढ़ स्वर में)
"हां। इस बार... मेरे पास वापस आने के लिए कुछ है। तू है।"
वह अंधेरे में गायब हो जाता है।
करीम अकेला रह जाता है, कैमरे की स्क्रीन देखता हुआ – उसके हाथ कांप रहे हैं, लेकिन उसकी आंखों में दृढ़ संकल्प है।
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दृश्य २२ – चर्च में प्रवेश | रात ११:००
बाहरी – चर्च का पिछला हिस्सा – रात
आर्यव चर्च के पिछले हिस्से में है। यहां एक छोटा-सा दरवाजा है, जो शायद कभी पादरी के कमरे में जाता था। अब वह बंद है, जंग लगा है, बेलों से ढका है।
आर्यव धीरे-धीरे पास जाता है। वह एक छोटा-सा यंत्र निकालता है – लॉक पिक – और ताला तोड़ना शुरू करता है। उसके हाथ बिल्कुल स्थिर हैं। कुछ सेकंड में ताला खुल जाता है – क्लिक की हल्की आवाज़।
दरवाजा धीरे-धीरे खुलता है – चर्र-चर्र की आवाज़ के साथ, जो रात के सन्नाटे में गूंजती है। आर्यव रुक जाता है – सुनता है। कोई हलचल नहीं। वह अंदर घुसता है।
अंदर – चर्च का पिछला हिस्सा – रात
एक छोटा-सा कमरा – पादरी का पुराना कमरा। धूल भरा, सामान बिखरा – टूटी कुर्सियाँ, पुरानी किताबें, एक टूटा हुआ क्रॉस। एक दरवाजा है जो सीधे चर्च के मुख्य हॉल में खुलता है।
आर्यव दरवाजे के पास जाता है, धीरे से झांकता है।
मुख्य हॉल में रोशनी नहीं है, लेकिन चांदनी टूटी खिड़कियों से अंदर आ रही है – हल्की, रहस्यमयी रोशनी। वह हर जगह आदमियों को देख सकता है – उनकी परछाइयाँ दीवारों पर नाच रही हैं।
वह वॉकी-टॉकी दबाता है – हल्की-सी क्लिक।
आर्यव: (फुसफुसाते हुए)
"करीम, सुन रहा है?"
करीम (वॉकी-टॉकी पर): (घबराई हुई फुसफुसाहट में)
"हां। तुम अंदर हो?"
आर्यव: "हां। बता, अब कितने आदमी दिख रहे हैं तुझे? कहां हैं?"
करीम: (कैमरे की स्क्रीन देखते हुए)
"मुख्य हॉल में कम से कम बीस। बाकी ऊपर गैलरी में – तीन स्नाइपर, और दो आदमी उनके साथ। कबीर अल्टार के पास है – चार आदमी उसके आसपास। बाकी लोग प्यू के पीछे छिपे हैं। हर तरफ हैं, आर्यव। हर तरफ।"
आर्यव: "ठीक है। अब देखता रह। आंखें मत हटाना स्क्रीन से।"
वह ग्रेनेड निकालता है – स्मोक ग्रेनेड। पिन खींचता है, और उसे मुख्य हॉल में फेंक देता है।
ग्रेनेड हवा में घूमता है, फर्श पर गिरता है – धम्म की आवाज़ – और फिर फटता है। धुएं का गुबार – सफेद, घना – पूरे हॉल में फैल जाता है। कुछ ही सेकंड में पूरा हॉल धुएं से भर जाता है।
आदमी चिल्लाने लगते हैं – अफरा-तफरी मच जाती है।
आदमी: (चिल्लाता है)
"क्या है? क्या हुआ?"
दूसरा: "धुआं! धुआं है कहीं!"
तीसरा: "वो आ गया! वो यहीं है! फायर! फायर!"
अराजकता। गोलियां चलने लगती हैं – अंधाधुंध, बिना निशाने के, सिर्फ डर में। एक दूसरे पर, छाया पर, धुएं पर। चिंगारियाँ उड़ती हैं, गोलियां दीवारों से टकराती हैं, खिड़कियाँ टूटती हैं।
आर्यव धुएं का फायदा उठाते हुए मुख्य हॉल में घुस जाता है। वह नीचे झुकता है, प्यू के पीछे-पीछे रेंगता है – एक छाया की तरह, बिना आवाज़ के।
उसे एक आदमी दिखता है – पास में, प्यू के पीछे छिपा, चारों तरफ देख रहा है, डरा हुआ। आर्यव उसके पीछे से आता है – चाकू निकालता है। एक तेज वार – गर्दन पर, सटीक, बिना आवाज़ के। आदमी गिर जाता है – बिना चीखे, बिना किसी को बताए।
आर्यव आगे बढ़ता है – रेंगता हुआ, छिपता हुआ। दूसरा आदमी – उसकी पीठ आर्यव की तरफ। आर्यव उठता है, उसके पीछे जाता है। उसकी पिस्तौल – साइलेंसर लगा – उठाता है।
ठप्प।
एक हल्की आवाज़। गोली आदमी के सिर में, पीछे से। वह गिर जाता है – बिना आवाज़ किए।
तीसरा आदमी – थोड़ा दूर। आर्यव धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ता है। लेकिन इस बार आदमी मुड़ जाता है – उसे देख लेता है।
आदमी: (चीखता है)
"वहां है! वो यहाँ है!"
गोलियां चलने लगती हैं – उसकी तरफ से, और दूसरों की तरफ से भी। आर्यव प्यू के पीछे छिप जाता है। गोलियां लकड़ी को चीरती हुई निकल रही हैं – चिप्स उड़ रहे हैं, चिंगारियाँ उड़ रही हैं।
करीम (वॉकी-टॉकी पर): (घबराया हुआ)
"आर्यव! दो आदमी तुम्हारे बाएं से आ रहे हैं! तीन दाएं से! पीछे भी कोई है!"
आर्यव चारों तरफ देखता है – धुआं धीरे-धीरे छंट रहा है। वह एक ग्रेनेड निकालता है – असली इस बार, फ्रैग्मेंटेशन। पिन खींचता है, और उसे दाएं तरफ फेंकता है – जहां तीन आदमी आ रहे हैं।
धमाका।
जोरदार धमाका, रोशनी, चीखें। तीन आदमी हवा में उछलते हैं – उनके शरीर के टुकड़े बिखरते हैं। चीखें, धुआं, खून – सब एक साथ।
आर्यव उठता है, दौड़ना शुरू करता है। वह प्यू के बीच से भागता है, गोलियां उसके पीछे – वह झुकता है, स्लाइड करता है, उठता है, फिर झुकता है – सब एक लय में, जैसे कोई नृत्य हो।
वह उठता है, दो शॉट – दो आदमी गिरते हैं – एक के सीने में, एक के सिर में। फिर से छिपता है।
ऊपर गैलरी से गोलियां आ रही हैं – स्नाइपर। आर्यव ऊपर देखता है – तीन आदमी वहां हैं, लगातार फायर कर रहे हैं, उसे घेरने की कोशिश कर रहे हैं।
वह अपनी पिस्तौल देखता है – गोलियां खत्म। दूसरी पिस्तौल – उसमें भी कुछ ही बची हैं। वह गिनता है – पाँच।
वह तेजी से एक खंभे की ओर दौड़ता है, गोलियों से बचता हुआ। खंभे के पीछे छिपकर वह सांस लेता है – गहरी, धीमी सांस।
आर्यव: (वॉकी-टॉकी पर)
"करीम, ऊपर वालों की पोजीशन बता।"
करीम: "पहला – बाएं तरफ, खिड़की के पास। दूसरा – बीच में, उस खंभे के पीछे। तीसरा – दाएं, उस टूटे क्रॉस के पास।"
आर्यव सोचता है – एक पल। फिर उसकी नज़र एक टूटी हुई रंगीन कांच की खिड़की पर पड़ती है – बड़ी, गोल, जिसमें से चांदनी आ रही है, रंगीन रोशनी बिखेर रही है – लाल, नीली, पीली।
वह समझ जाता है।
वह खंभे से निकलता है, सीधा उस रोशनी में खड़ा हो जाता है – बिल्कुल सामने, बिना छिपे। गैलरी के आदमी उसे देख लेते हैं, गोली चलाते हैं।
लेकिन रंगीन कांच की रोशनी उनकी आंखों को धोखा देती है – वे उसे ठीक से देख नहीं पाते, उसकी पोजीशन का अंदाजा नहीं लगा पाते। गोलियां आर्यव के पास से निकल जाती हैं – इधर-उधर, ऊपर-नीचे।
आर्यव अपनी बची हुई पाँचों गोलियां चलाता है – एक, दो, तीन, चार, पाँच। एक के बाद एक, बिल्कुल सटीक।
पहली गोली – बाएं वाले स्नाइपर के सिर में। दूसरी – बीच वाले के सीने में। तीसरी – दाएं वाले के गले में। चौथी और पाँचवीं – उनके साथ खड़े दो आदमियों में।
पाँचों आदमी गैलरी से नीचे गिरते हैं – एक के बाद एक, भारी धमाके के साथ। उनके शरीर नीचे प्यू पर गिरते हैं, खून बिखरता है।
सन्नाटा – कुछ पल के लिए।
फिर एक गोली आर्यव के कंधे में लगती है। वह घूमता है – पीछे से एक आदमी ने गोली मारी है, जो प्यू के पीछे छिपा था। दूसरी गोली – उसकी टांग में, बाएं पैर की जांघ में। आर्यव घुटनों के बल गिर जाता है – दर्द से, लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं।
आदमी पास आता है, मुस्कुराता हुआ – उसे लगता है जीत गया। वह अपनी पिस्तौल आर्यव के सिर पर रखता है।
आदमी: (हंसते हुए)
"खत्म हुआ तेरा खेल, निशान। बहुत दूर तक आया, लेकिन यहीं रुकेगा। अलविदा।"
आर्यव उसकी आंखों में देखता है – उसकी आंखों में वही स्थिरता है, वही शांति। कोई डर नहीं, कोई घबराहट नहीं। बस एक अजीब-सी मुस्कान।
अचानक, उसका हाथ तेजी से उठता है – उसमें एक छोटा चाकू है, जो उसने अपनी कमर से निकाला था। वह आदमी के गले में भोंक दिया जाता है – बिजली की गति से, सटीक, बेरहमी से।
आदमी की आंखें फैल जाती हैं – हैरानी से, दर्द से। उसके हाथ से पिस्तौल छूट जाती है। वह अपने गले को पकड़ता है – खून बह रहा है, उंगलियों के बीच से। वह घुटनों के बल गिरता है, फिर मुंह के बल – बिल्कुल आर्यव के सामने।
आर्यव उठने की कोशिश करता है – उसकी टांग से खून बह रहा है, कंधे से भी। वह लड़खड़ाता है, लेकिन खड़ा हो जाता है – दीवार का सहारा लेकर।
वह आगे बढ़ता है – धीरे-धीरे, लंगड़ाते हुए। अल्टार की ओर। जहां कबीर राणा खड़ा है।
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दृश्य २३ – आमना-सामना | रात ११:१५
अंदर – चर्च का अल्टार – रात
अल्टार पर कबीर राणा खड़ा है। उसके हाथ में वही चांदी जड़ी पिस्तौल है। उसके चारों तरफ उसके अंतिम चार आदमी हैं – सबसे वफादार, सबसे खतरनाक, सबसे अनुभवी। उनके हाथों में भी हथियार हैं – सब तैयार।
आर्यव धीरे-धीरे आगे बढ़ता है – लंगड़ाता हुआ, खून से लथपथ, लेकिन फिर भी खड़ा है। उसके पीछे लाशों का ढेर है – कम से कम पच्चीस-छब्बीस लाशें। खून हर तरफ बहा है – प्यू पर, दीवारों पर, फर्श पर। चर्च अब एक श्मशान जैसा लग रहा है।
कबीर राणा: (ताली बजाते हुए, हंसते हुए)
"वाह आर्यव! वाह! सच में, तू महान है। अकेला, जख्मी, खून से लथपथ, फिर भी खड़ा है। मैंने तुझे कम आंका था – बहुत कम। तीस आदमी, और तूने उन्हें मार गिराया। सच में, तू कोई आम नहीं है।"
आर्यव: (हांफते हुए, लेकिन आवाज़ में वही ठंडक)
"कबीर... आज तेरा आखिरी दिन है। पांच साल का हिसाब... आज चुकता होगा।"
कबीर राणा: (हंसता है – एक ठंडी, खतरनाक हंसी)
"हां? तो फिर आगे बढ़। लेकिन देख, मेरे पास अभी भी चार आदमी हैं – मेरे सबसे अच्छे आदमी। और तू... तू मुश्किल से खड़ा है। तेरी टांग से खून बह रहा है, तेरा कंधा टूटा है, तेरी पिस्तौल खाली है। तू क्या करेगा? मुझे देखकर डरा देगा?"
वह अपने आदमियों की ओर देखता है – वे सब हंसते हैं, आत्मविश्वास से भरे।
कबीर के आदमी आगे बढ़ते हैं – धीरे-धीरे, आर्यव को घेरते हुए। आर्यव उन्हें देखता है – चारों तरफ से घिरा हुआ। वह अपनी पिस्तौल देखता है – खाली। वह उसे फेंक देता है। फिर वह अपनी कमर से चाकू निकालता है – आखिरी हथियार।
पहला आदमी: (हंसते हुए)
"चाकू से? पागल है? हम चार हैं, और तू एक चाकू लेकर खड़ा है?"
दूसरा आदमी: "चलो, मज़ा आएगा। जानवर को मरते देखेंगे।"
वे हंसते हैं। लेकिन अगले ही पल, आर्यव उन पर झपटता है – बिजली की गति से, जख्मी होने के बावजूद।
पहला आदमी – उसके पेट में चाकू, एक तेज वार। आदमी चीखता है, गिर जाता है।
दूसरा आदमी – पीछे से आता है, आर्यव की गर्दन पर हमला करने की कोशिश करता है। आर्यव मुड़ता है, उसकी कलाई पकड़ता है, घुमाता है। हड्डी टूटती है – चटाक् की आवाज़। आदमी चिल्लाता है, उसका हाथ बेकार हो जाता है।
तीसरा आदमी गोली चलाता है – आर्यव बचता है, गोली उसके कंधे के पास से निकल जाती है, बाल-बाल। वह आदमी की ओर बढ़ता है, उसकी पिस्तौल पकड़ लेता है, उसे उसी की ओर घुमा देता है। दो गोलियां – आदमी के सीने में, सीधे दिल पर। वह गिर जाता है।
चौथा आदमी – डर जाता है, भागने की कोशिश करता है। आर्यव उसके पीछे चाकू फेंकता है – चाकू हवा में घूमता है, आदमी की पीठ में धंस जाता है, ठीक कंधे के ब्लेड के बीच। वह गिर जाता है – मुंह के बल, कीचड़ में।
अब सिर्फ दो – आर्यव और कबीर राणा।
चर्च में सन्नाटा है। सिर्फ आर्यव की हांफती सांसें, और कबीर की ठंडी, स्थिर सांसें।
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दृश्य २४ – अंतिम युद्ध | रात ११:१८
अंदर – चर्च का अल्टार – रात
कबीर राणा ने अपनी पिस्तौल फेंक दी है। वह मुस्कुरा रहा है – एक अजीब, पागलपन भरी मुस्कान।
कबीर राणा: (हाथ फैलाते हुए)
"चल, हाथापाई करते हैं। देखते हैं, पांच साल में कितना सीखा है तूने। मैंने तुझे सिखाया था, याद है? मैं तेरा इंस्ट्रक्टर था, तेरा मेंटर। तू मेरा स्टूडेंट था। आज देखते हैं, स्टूडेंट ने मेंटर को पीछे छोड़ा या नहीं।"
वह झपटता है – तेज, अनुभवी, खतरनाक।
उसका पहला मुक्का आर्यव के चेहरे पर लगता है – जोरदार, पूरी ताकत से। आर्यव लड़खड़ाता है, पीछे हटता है। दूसरा मुक्का – पेट में, ठीक उस जगह जहां पहले से चोट है। आर्यव की सांस फूल जाती है, उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। तीसरा मुक्का – फिर चेहरे पर, इस बार और जोर से। आर्यव के मुंह से खून निकलता है।
आर्यव गिर जाता है – घुटनों के बल, फिर मुंह के बल। कबीर उसके ऊपर चढ़ जाता है, उसका गला दबाने लगता है – दोनों हाथों से, पूरी ताकत से।
कबीर राणा: (गुस्से से, चिल्लाते हुए)
"देखता है? तू कुछ नहीं कर सकता! मैंने तुझे बनाया था! मैंने तुझे शार्पशूटर बनाया! मैंने तुझे हथियार बनाया! और मैं ही तुझे खत्म करूंगा! देखता है, तेरी ताकत कितनी है मेरे सामने?"
आर्यव की सांसें रुकने लगती हैं – उसका चेहरा नीला पड़ रहा है, उसकी आंखें बाहर निकल रही हैं। वह हाथ पैर मारता है, लेकिन बेकार।
आर्यव: (हांफते हुए, बमुश्किल)
"तुमने... मेरा परिवार... मारा... अन्या... मीरा... मेरी बच्ची..."
कबीर राणा: (हंसते हुए, और जोर से दबाते हुए)
"कोलेटरल डैमेज, आर्यव! बस इतना है! तू समझता नहीं? तू गलत जगह था, गलत वक्त पर। तेरी पत्नी और बेटी... वो सिर्फ एक गलती थीं। एक छोटी-सी गलती, जो मेरे आदमियों ने कर दी। उनका मतलब तुझसे था, तेरे परिवार से नहीं। लेकिन हो गया। अब रोना मत। अब मर जा।"
आर्यव की आंखों में आग भड़क उठती है – पांच साल का दर्द, गुस्सा, बदले की आग – सब एक साथ, एक ज्वालामुखी की तरह फूटता है।
वह अचानक कबीर के हाथ को पकड़ता है – अपनी आखिरी ताकत से – और उसे मरोड़ता है, घुमाता है। कबीर चिल्लाता है – दर्द से, हैरानी से। आर्यव उसे पलट देता है – एक झटके में। अब वह ऊपर है, कबीर नीचे।
आर्यव का मुक्का – कबीर के चेहरे पर, पूरी ताकत से। दूसरा मुक्का – फिर। तीसरा – फिर। खून बहने लगता है – कबीर की नाक से, मुंह से, आंखों के पास से।
आर्यव: (हर मुक्के के साथ चिल्लाता है)
"ये मेरी पत्नी के लिए!"
मुक्का।
"ये मेरी बेटी के लिए!"
मुक्का।
"ये उन पांच सालों के लिए जो तुमने मुझसे छीन लिए!"
मुक्का।
"ये हर उस रात के लिए जब मैं उन्हें याद करता था!"
मुक्का।
"ये हर उस सुबह के लिए जब मैं उठता था तो उन्हें नहीं पाता था!"
मुक्का।
"ये मेरी बच्ची की आखिरी चीख के लिए!"
मुक्का।
कबीर का चेहरा अब पहचान में नहीं आ रहा – सूजा हुआ, खून से लथपथ, टूटा हुआ। उसकी आंखें मुश्किल से खुल पा रही हैं। लेकिन फिर भी वह हंस रहा है – एक अजीब, पागल, खौफनाक हंसी। खून से भरे मुंह से, टूटे दांतों के साथ।
कबीर राणा: (बड़ी मुश्किल से, हांफते हुए)
"मार... मुझे मार... जल्दी मार... लेकिन जान ले... तू जीत भी गया... तो क्या? तेरा परिवार वापस नहीं आएगा। अन्या वापस नहीं आएगी। मीरा वापस नहीं आएगी। तू खाली रह जाएगा। बिल्कुल खाली। देखता है? तू जीता... लेकिन हारा। हमेशा के लिए हारा।"
आर्यव रुक जाता है – उसका हाथ हवा में ही रुक जाता है। वह कबीर को देखता है – उसकी आंखों में अब गुस्सा नहीं है, सिर्फ एक अजीब-सी शांति है। शायद संतोष, शायद खालीपन।
वह कबीर को उठाता है – उसके कॉलर से पकड़कर, घसीटता हुआ अल्टार के पास ले जाता है। वहां एक टूटा हुआ क्रॉस है – लकड़ी का, बड़ा, जमीन में गड़ा हुआ, जिस पर अब भी ईसा की मूर्ति के अवशेष हैं।
आर्यव कबीर को उस क्रॉस पर पटक देता है – जोर से, पूरी ताकत से। कबीर की पीठ लकड़ी से टकराती है – एक भारी, धम्म की आवाज़। वह कराहता है, चीखता है – दर्द से।
आर्यव उसके सामने झुकता है। उसका चेहरा बिल्कुल पास, कबीर के खून से सने चेहरे के ठीक सामने। वह उसकी आंखों में देखता है – उन आंखों में, जिनमें कभी अहंकार था, अब सिर्फ डर है।
आर्यव: (बहुत धीरे, बहुत ठंडे, बहुत शांत स्वर में – हर शब्द पर जोर देते हुए)
"आज... कोलेटरल डैमेज... तुम हो। तुम और सिर्फ तुम।"
वह अपना हाथ कबीर की गर्दन पर रखता है – उसकी गर्म, कांपती, पसीने से भरी गर्दन। वह महसूस करता है उसकी नब्ज – तेज, डरी हुई।
एक झटका। तेज, सटीक, बेरहम।
चटाक्।
गर्दन मुड़ने की वह भयानक आवाज़ – जो अब आर्यव के लिए बहुत परिचित हो चुकी है।
कबीर राणा की आंखें फैल जाती हैं – आखिरी बार। उसका मुंह खुलता है, एक आवाज़ निकलने की कोशिश करती है – लेकिन नहीं निकल पाती।
उसका सिर एक तरफ झुक जाता है – अप्राकृतिक रूप से, बेजान होकर।
वह मर चुका है।
आर्यव उसे छोड़ देता है। कबीर का शरीर क्रॉस से नीचे गिरता है – पहले घुटनों के बल, फिर मुंह के बल – अल्टार की सीढ़ियों पर लुढ़क जाता है। खून का एक धार उसके मुंह से बहता है, सीढ़ियों से नीचे, फर्श पर।
सन्नाटा।
पूरा सन्नाटा।
सिर्फ आर्यव की सांसें – भारी, थकी हुई, लेकिन धीरे-धीरे स्थिर होती हुई।
आर्यव खड़ा है, कबीर की लाश के ऊपर। उसका सारा शरीर खून से लथपथ है – उसका अपना, और दूसरों का। उसके कपड़े फटे हैं, उसकी टांग से खून बह रहा है, उसका कंधा टूटा है। लेकिन वह खड़ा है।
वह कबीर को देखता है – उस आदमी को, जिसने उसकी जिंदगी बर्बाद कर दी, जिसने उसका परिवार छीन लिया। वह उसे देखता है – मरा हुआ, बेजान, तुच्छ।
फिर वह ऊपर देखता है – टूटे हुए क्रॉस की ओर, जिस पर अब भी ईसा की मूर्ति के अवशेष हैं। चांदनी उस पर पड़ रही है – एक अजीब, रहस्यमयी रोशनी।
उसकी आंखों से आंसू बहने लगते हैं। पांच साल में पहली बार। धीरे-धीरे, पहले एक-दो बूंदें, फिर बाढ़ की तरह। वह रोता है – चुपचाप, बिना आवाज़ के, लेकिन उसके कंधे कांप रहे हैं, उसका शरीर हिल रहा है।
वह धीरे-धीरे घुटनों के बल गिर जाता है – कबीर की लाश के पास, खून में। उसके घुटने खून में डूब जाते हैं। वह अपना सिर झुका लेता है, अपने हाथों से अपना चेहरा ढक लेता है। उसके कंधे कांप रहे हैं, सिसकियाँ सुनाई दे रही हैं।
वॉकी-टॉकी से करीम की आवाज़ आती है – पहले धीमी, फिर तेज।
करीम (वॉकी-टॉकी पर): (घबराया हुआ, चिंतित)
"आर्यव! आर्यव! तुम ठीक हो? क्या हुआ? सुन रहे हो? आर्यव! प्लीज़ बोलो! तुम ठीक तो हो? मैं आ रहा हूं! मैं अंदर आ रहा हूं!"
आर्यव कोई जवाब नहीं देता। वह बस रोता रहता है – चुपचाप, बेआवाज़। उसके आंसू खून में मिल रहे हैं, फर्श पर गिर रहे हैं।
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दृश्य २५ – सुबह | भोर ६ बजे
बाहरी – चर्च के बाहर – सुबह
सूरज उग रहा है – धीरे-धीरे, पूरब की तरफ से। पहली किरणें चर्च की टूटी खिड़कियों से अंदर आ रही हैं – सुनहरी, गर्म, उजली।
चर्च के बाहर सन्नाटा है। गलियाँ सूनी हैं। दूर कहीं एक कुत्ता भौंक रहा है, कहीं कोई मुर्गा बांग दे रहा है। नया दिन शुरू हो रहा है।
चर्च का दरवाज़ा खुलता है – चरमराती आवाज़ के साथ। करीम अंदर भागता है – डरा हुआ, घबराया हुआ।
वह लाशों के बीच से गुजरता है – हर तरफ खून, मलबा, गोलियों के खोल, टूटी प्यू, बिखरे कांच। उसकी आंखें फैली हुई हैं, उसका मुंह खुला है – वह इस नज़ारे को देखकर सहम गया है।
करीम: (चिल्लाता है)
"आर्यव! आर्यव कहां हो?"
कोई जवाब नहीं। वह आगे बढ़ता है – अल्टार की ओर। वहां और भी लाशें हैं – चारों तरफ। वह उनके बीच से गुजरता है, उन्हें धक्का देकर हटाता है।
आखिर में वह अल्टार के पास पहुंचता है। वहां कबीर राणा की लाश है – मुंह के बल पड़ी, खून में सनी। उसकी गर्दन टूटी हुई है, अजीब कोण पर।
और उसके पास... आर्यव नहीं है।
करीम: (चारों तरफ देखता है, हैरान)
"आर्यव? आर्यव कहां है? तुम कहां हो?"
कोई जवाब नहीं। वह पूरे चर्च में ढूंढता है – हर कोने में, हर प्यू के पीछे, हर खंभे के पास – लेकिन आर्यव कहीं नहीं है।
फिर उसकी नज़र दीवार पर पड़ती है – अल्टार के ठीक पीछे, वहाँ एक बड़ी-सी दीवार है, जिस पर कभी कोई धार्मिक चित्र रहा होगा।
वहां... खून से बना एक निशान है।
बाज़। वही बाज़, जो पांच साल पहले आर्यव के घर की दीवार पर बना था। वही पंख, वही आकृति, वही खतरनाक अंदाज।
लेकिन इस बार... उस बाज़ के नीचे एक और निशान है – एक गहरी, मोटी रेखा, जो बाज़ को बीच से काटती हुई। मानो बाज़ खत्म हो गया हो। मानो उसे मार दिया गया हो।
करीम उसे देखता है – घूरता है। वह समझ जाता है।
करीम: (खुद से, धीमे स्वर में)
"तूने कर दिखाया... तूने सच में कर दिखाया। पांच साल... पांच साल का इंतज़ार... आज खत्म हुआ।"
वह मुड़ता है, बाहर जाने लगता है। तभी उसकी नज़र जमीन पर पड़ी एक चीज़ पर रुक जाती है – कबीर की लाश के पास, खून में, कुछ चमक रहा है।
वह झुकता है, उसे उठाता है।
वह घड़ी। आर्यव की घड़ी। वही डिजिटल घड़ी, जो अन्या ने उसे पांच साल पहले जन्मदिन पर दी थी। उस पर अब खून के धब्बे हैं, कांच टूटा है, लेकिन वह अभी भी चमक रही है। उसके साथ लगा हुआ है – वही चिप, बाज़ का निशान।
करीम घड़ी को देखता है – उसे अपने हाथ में पकड़ता है, महसूस करता है। वह उसे अपने सीने से लगाता है, फिर दूर जाते सूरज की ओर देखता है।
करीम: (धीमे, भरे गले से)
"अलविदा, निशान। अलविदा, भाई। तूने वो कर दिखाया जो कोई नहीं कर सका। अब तू जा... जहां भी है... शांति से रह। तूने अपना काम पूरा कर लिया।"
वह धीरे-धीरे चर्च से बाहर निकलता है – घड़ी को अपने हाथ में कसकर पकड़े हुए। उसकी आंखों में आंसू हैं, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान भी है – शांति की, संतोष की।
पीछे, चर्च में, सूरज की किरणें लाशों पर पड़ रही हैं, खून सूख रहा है, और दीवार पर वह कटा हुआ बाज़ – एक युग के अंत का गवाह।
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दृश्य २६ – नया शहर, नया निशान | एक महीने बाद
बाहरी – कोलकाता, हावड़ा ब्रिज – सुबह
हावड़ा ब्रिज – कोलकाता की पहचान। सुबह का समय, भीड़ शुरू हो रही है। लोग ऑफिस जा रहे हैं – हाथ में टिफिन, बैग, अखबार। दुकानें खुल रही हैं – चाय की, सिगरेट की, फूलों की। साइकिलें, रिक्शे, टैक्सियाँ – सब अपनी-अपनी धुन में व्यस्त हैं। नीचे गंगा बह रही है – विशाल, शांत, अनंत।
इस भीड़ में एक आदमी चल रहा है। वह साधारण कपड़ों में है – जीन्स, टी-शर्ट, सिर पर टोपी, आंखों पर काला चश्मा। उसके चेहरे पर हल्की-सी दाढ़ी है, बाल थोड़े लंबे। वह बिल्कुल आम लगता है – एक और आदमी, एक और चेहरा।
कोई उसे पहचान नहीं पाता। कोई नहीं जानता कि वह कौन है, कहां से आया है, क्या करता है।
लेकिन वह जानता है।
वह एक छोटी-सी दुकान के पास रुकता है – अखबार की दुकान। वहां एक अखबार पड़ा है – 'आनंद बाजार पत्रिका'। उसके पहले पन्ने पर खबर है – "मुंबई के बदनाम पुलिस अधिकारी कबीर राणा की रहस्यमय मौत, जांच जारी। चर्च में मिली ३२ लाशें, पुलिस हैरान।"
आदमी अखबार को एक पल देखता है – उसकी आंखों के पीछे कुछ चमकता है, कुछ याद आता है। फिर वह अखबार वापस रख देता है, पैसे नहीं देता, बस चला जाता है।
वह एक पुरानी इमारत में घुसता है – तीन मंजिला, पुरानी, उखड़ता पेंट। ऊपर जाता है – तीसरी मंजिल पर। एक दरवाजे पर दस्तक देता है – तीन बार, फिर दो बार, फिर एक बार – एक तयशुदा पैटर्न।
दरवाजा खुलता है। अंदर एक आदमी है – राघव भसीन। उसने सफेद कुर्ता पहना है, हाथ में विस्की का गिलास। वह मुस्कुराता है – एक जानी-पहचानी, पुरानी मुस्कान।
राघव: (दरवाजा खोलते हुए)
"आ गए। मैं सोच रहा था तुम नहीं आओगे। एक महीना हो गया। सोचा, शायद तुम रुक गए, शायद तुमने सब छोड़ दिया।"
आदमी – आर्यव – अंदर घुसता है। उसने चश्मा उतारा, टोपी हटाई। उसका चेहरा अब और भी कठोर हो गया है, और भी गंभीर। लेकिन उसकी आंखों में अब वह पूरी शून्यता नहीं है – अब उसमें कुछ और है। शांति? संतोष? या बस... खालीपन, जो अब सहने लायक हो गया है?
आर्यव: (अंदर आते हुए, चारों तरफ देखते हुए)
"तुमने बुलाया। मैं आ गया।"
राघव: (मेज की ओर इशारा करते हुए)
"बैठो। पहले चाय पी लो। फिर बात करते हैं।"
आर्यव बैठ जाता है। राघव उसे चाय देता है – गरम, कड़क, सुगंधित। आर्यव चाय की चुस्की लेता है – पहली बार महीनों में उसके चेहरे पर थोड़ी नरमी आती है।
राघव: (उसके सामने बैठते हुए)
"एक महीना हो गया, आर्यव। कबीर मर चुका है। उसके सारे सहयोगी खत्म – कुछ मरे, कुछ डरे हुए, कुछ जेल में। बाज़ खत्म हो गया। तूने कर दिखाया।"
आर्यव: (चाय की चुस्की लेते हुए, शांति से)
"मैंने अपना बदला ले लिया। बस इतना था।"
राघव: (एक फाइल आगे बढ़ाते हुए)
"लेकिन बदला खत्म नहीं होता, आर्यव। दुनिया में और भी कबीर हैं। और भी बाज़ हैं – अलग नामों के साथ, अलग चेहरों के साथ। यह फाइल देखो।"
आर्यव फाइल खोलता है। अंदर एक तस्वीर है – एक आदमी की, लगभग ५० साल का, महंगे कपड़ों में, चेहरे पर अहंकार। उसके नीचे लिखा है – "विक्टर खन्ना, अंतरराष्ट्रीय हथियार तस्कर। ठिकाना: दुबई, सिंगापुर, कोलकाता। अफ्रीका, एशिया, यूरोप – हर जगह उसके नेटवर्क हैं। उसके हाथों हजारों लोग मारे गए हैं।"
राघव: "यह आदमी खतरनाक है। इसने हज़ारों लोगों को हथियार बेचे हैं – आतंकियों को, गैंगस्टरों को, भ्रष्ट सरकारों को। अगर यह रुका नहीं, तो और भी मासूम मरेंगे। और भी परिवार तबाह होंगे।"
आर्यव फाइल देखता है – तस्वीरें, जानकारी, पते, कमजोरियां। फिर वह राघव की ओर देखता है।
आर्यव: (शांत स्वर में)
"कबीर मर चुका है। मेरा काम खत्म हो गया। मैंने अपना बदला ले लिया। अब मैं..."
राघव: (बीच में काटते हुए, गंभीर स्वर में)
"तेरा काम कभी खत्म नहीं होता, आर्यव। तू जानता है। तू 'निशान' है। और इस दुनिया में निशानों की कमी नहीं है। हर दिन कोई न कोई मासूम मरता है, किसी न किसी का परिवार तबाह होता है। सवाल ये है कि तू चुनता है या नहीं। क्या तू उनके लिए आवाज़ उठाएगा, या चुपचाप बैठा रहेगा?"
आर्यव एक पल रुकता है। वह अपनी जेब से वह चिप निकालता है – बाज़ का निशान, जो उसे पोर्ट पर मिला था, जो उसके साथ हर जगह था। वह उसे देखता है – एक पल के लिए। फिर वह उसे राघव की मेज पर रख देता है – धीरे से, सावधानी से।
आर्यव: (धीमे, लेकिन दृढ़ स्वर में)
"यह खत्म हुआ। बाज़ खत्म हुआ। अब नया शुरू होगा। मेरे तरीके से, मेरी शर्तों पर।"
वह फाइल उठाता है – विक्टर खन्ना की। उसे खोलता है, फिर से देखता है। फिर उसे बंद करता है, अपने बैग में रख लेता है।
वह अपनी कलाई देखता है – वहां अब नई घड़ी है, पुरानी जैसी ही। वह उसे ऑन करता है – एक बटन दबाता है।
घड़ी: ००:६०
हरे अंक चमकते हैं – सेकंड गिनने को तैयार।
आर्यव (वॉइसओवर): (वही ठंडी आवाज़, लेकिन अब उसमें हल्का सा बदलाव है – शायद थकान, शायद संतोष, शायद एक नई शुरुआत की उम्मीद)
"साठ सेकंड। हर सेकंड की कीमत होती है। पहले मैं बदला ले रहा था – अपने लिए, अपने परिवार के लिए। अब... अब मैं बस काम कर रहा हूं। उनके लिए जो खुद नहीं लड़ सकते। क्योंकि दुनिया में बुराई खत्म नहीं होती। वो बस रूप बदलती है, चेहरे बदलती है। और जब तक बुराई है... 'निशान' की जरूरत रहेगी। शायद यही मेरी असली पहचान है। शायद यही मेरी असली जिंदगी है।"
वह दरवाजे की ओर बढ़ता है – उसी शांत, स्थिर चाल से, जैसे हमेशा चलता है।
राघव: (पीछे से, धीमे स्वर में)
"आर्यव।"
आर्यव रुकता है – बिना मुड़े।
राघव: (भरे गले से)
"तेरा परिवार... अन्या और मीरा... वो तुझ पर गर्व करेंगे। तूने उनका नाम रोशन किया है।"
आर्यव एक पल रुकता है – उसकी आंखों में हल्की-सी नमी आ जाती है, लेकिन वह बहने नहीं देता। उसके होंठ हिलते हैं – जैसे कुछ कहना चाहता हो, लेकिन शब्द नहीं मिलते।
फिर वह बिना कुछ कहे बाहर चला जाता है – दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद होता है।
राघव अकेला रह जाता है। वह मेज पर रखी उस चिप को देखता है – बाज़ का निशान, अब बेकार, अब बीते जमाने की निशानी। वह उसे उठाता है, देखता है, फिर अपनी मुट्ठी में बंद कर लेता है।
राघव: (खुद से, धीमे स्वर में)
"निशान... तू सच में अलग है। तूने वो कर दिखाया जो कोई नहीं कर सका। अब जा... दुनिया बदल दे। एक-एक कदम, एक-एक इंसाफ।"
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दृश्य २७ – समापन
बाहरी – हावड़ा ब्रिज – सुबह
आर्यव फिर से भीड़ में चल रहा है – उसी साधारण कपड़ों में, उसी टोपी के साथ। वह बिल्कुल आम आदमी लगता है – कोई उसे नहीं पहचानता, कोई नहीं जानता।
लेकिन जैसे ही वह ब्रिज के बीच में पहुंचता है, वह रुक जाता है। वह सामने देखता है – दूर गंगा नदी बह रही है, विशाल और शांत। सूरज की सुनहरी रोशनी पानी पर चमक रही है – लाखों हीरों की तरह। हवा में नमी है, गंगा की गंध है।
वह अपनी जेब से एक तस्वीर निकालता है – पुरानी, मुड़ी हुई, लेकिन साफ। अन्या और मीरा की। वह उसे देखता है – देर तक, ध्यान से। उसकी उंगलियाँ तस्वीर को छूती हैं – अन्या के चेहरे को, मीरा के बालों को।
फिर धीरे से मुस्कुराता है – एक हल्की, दर्द भरी, लेकिन सच्ची मुस्कान। पांच साल में पहली बार, सच में मुस्कुराता है।
आर्यव (वॉइसओवर): (धीमा, शांत, लगभग संतुष्ट)
"अन्या, मीरा... मैंने तुम्हारा बदला ले लिया। कबीर मर चुका है। बाज़ खत्म हो गया। लेकिन तुम वापस नहीं आओगी। मैं जानता हूं। फिर भी... मैं रुकूंगा नहीं। क्योंकि अगर मैं रुक गया... तो तुम्हारी मौत बेकार हो जाएगी। तुम्हारी कुर्बानी बेकार हो जाएगी। इसलिए मैं चलता रहूंगा। उन सबके लिए जो न्याय नहीं पा सके, उन सबके लिए जिनकी आवाज़ दबा दी गई, उन सबके लिए जिनका कोई नहीं है। तुम मेरे साथ हो – हर कदम पर, हर सांस में। हमेशा।"
वह तस्वीर को अपने होठों से लगाता है – एक आखिरी चुंबन। फिर उसे वापस जेब में रखता है – ध्यान से, सावधानी से, जैसे कोई अनमोल चीज़ हो।
फिर वह आगे बढ़ जाता है – भीड़ में घुलता हुआ, गायब होता हुआ। उसकी पीठ धीरे-धीरे दूर होती जाती है, भीड़ के बीच में खो जाती है।
स्क्रीन धीरे-धीरे फीकी पड़ती है – आखिर में सिर्फ भीड़ दिखती है, और उसके ऊपर सूरज की रोशनी।
स्क्रीन ब्लैक।
अंतिम टेक्स्ट:
"निशान"
जल्द ही... एक नए मिशन में... एक नए शहर में... एक नई कहानी के साथ...
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[समाप्त]