और सालों बाद जब (डरावनी प्रेम कहानी) भाग 1 Abhishek Chaturvedi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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और सालों बाद जब (डरावनी प्रेम कहानी) भाग 1

और सालों बाद जब (डरावनी प्रेम कहानी) भाग-०१

_लेखक:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'_

और सालों बाद जब हमारे रास्ते दोबारा टकराए, न जाने कितनी ही यादें ताज़ा हो गईं...

उनका चेहरा सामने आ ही गया जैसे मानो आसमान में सैकड़ों तारे एक साथ जगमगा रहे हो, चेहरे पर सूर्य की आभा, उसके होंठ मानों छोटे बच्चों की किलकारी की तरह चमक रही हो,दमक रही हो, उसके नैन-नक्श तो वैसे ही थे जैसे उसने मुझे मेरे जीवन के दौरान मैंने उसे महसूस किया था।

यह बात बहुत पहले की है जब मैं अपनी स्कूल की कक्षा को पूरी करें अपने कॉलेज की पढ़ाईपूरी करने दूसरे कॉलेज में दाखिला लिया।

वह मन से कुछ ऐसा था मोनो मानो किसी एक छोटे से तालाब की छोटी सी मछली बड़े से समुद्र तो नहीं लेकिन अद्भुत की नदी में चली गई हो वहां अनेकों अनेक वेशभूषा, रंग-बिरंगे कपड़े पहने कुछ तो फटे हुए कपड़े तो कुछ छोटे कपड़े पहने लोग दिख रहे थे।

जब मैं अपने एडमिशन का अपने हॉस्टल का कार्ड लेकर अपने हॉस्टल के कमरे की तरफ बढ़ा तुम मेरे कमरे के बगल वाले कमरे से मुझे कुछ चीखने , कुछ चीजें टूटने और किसी के रोने की आवाज मेरे कानों में पड़ी मानो ऐसा लग रहा हो कि वह कहीं किसी बहुत बड़ी मुसीबत में फंसा है उसे मदद चाहिए किंतु मैं जैसे ही मदद के लिए आवाज लगाने ही वाला था और अंदर जाने ही वाला था अचानक वह चीखें और रोने की आवाजें अचानक हंसने और ताली मारने में बदल गई यह सुनकर मैं अचंभित रह गया इन सब बातों को मैं अनदेखा करके अपने हॉस्टल के कमरे में चला गया और अपने आपको व्यवस्थित करने लगा।

लेकिन मेरे मन में वह चीख एक मार्मिक और एक वास्तविक लग रही थी किंतु मेरा मस्तिष्क मेरा दिमाग उसे वास्तविक समझने से परहेज कर रहा था।

ख़ैर मैं अपने आपको व्यवस्थित करने के बाद जान पहचान करने के लिए हॉस्टल के बाहर चाय के स्टॉल पर बैठे लोगों से बातें करने लगा और बातें बातों में ही मालूम पड़ा कि यहॉं पर लोग अपने सहेलियों को भी लेकर आते हैं और यह बात उस हॉस्टल के वार्डन को पता नहीं रहती यह सब चुप के लाया जाता है चुप कर किया जाता है।

खैर मैंने भी सोचा मुझे इस से क्या मैं आया हूॅं अपने डिग्री ख़त्म करूॅंगा और उम्मीद करूंगा कि डिग्री खत्म होते होते मुझे कहीं किसी जगह अच्छी नौकरी हो जाए जिससे मैं अपनी आर्थिक व्यवस्था सुदृढ़ कर सकूं ।

आप गलत मत सोचिए मैं किसी गरीब घर से नहीं हूं मेरे पापा और मेरी मम्मी दोनों अच्छा-खासा कमाने वाले हैं लेकिन मुझे अपने आप अपने बलबूते पर कुछ बनना है यही बात मैंने बैठे-बैठे वहां पर अपने नए दोस्त से बताई...

धीरे-धीरे हॉस्टल की ज़िंदगी मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गई। सुबह उठकर क्लास जाना, लाइब्रेरी में देर तक पढ़ना और फिर कमरे में लौटकर खिड़की से आसमान को निहारते हुए अपने भविष्य के बारे में सोचते रहना – यही मेरी दिनचर्या थी।

पर उस दिन, जब मैंने पहली बार बगल वाले कमरे से चीखें और हँसी सुनी थी, वह स्मृति अब भी मेरे साथ थी। कभी-कभी रात को अचानक वही आवाजें फिर सुनाई दे जातीं—चीख, रोना, फिर अचानक ठहाका। मुझे समझ नहीं आता था कि यह सब हकीकत है या कोई अजीबोगरीब मज़ाक।

एक शाम मैं हॉस्टल के पीछे बने मैदान में टहल रहा था। वहाँ कुछ लड़के अपने दोस्तों के साथ हंसी-मज़ाक कर रहे थे, कुछ क्रिकेट खेल रहे थे। तभी मेरी नज़र दूर बेंच पर बैठी एक लड़की पर पड़ी।

वह क़िताब खोले बैठी थी, पर निगाहें बार-बार आसमान की ओर उठ रही थीं। मुझे लगा, यह वही चेहरा है जिसे मैंने बरसों पहले अपने स्कूल में देखा था।दिल की धड़कन जैसे तेज़ हो गई। वह वही थी—वही मुस्कान, वही चमकता चेहरा, वही आँखें जिनमें कभी मैंने अपने सपनों का आधा संसार देखा था।

इतने सालों बाद अचानक उसका मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं था।मैं कुछ पल वहीं खड़ा रहा, मानो पैरों में जड़ें जम गई हों। मन बार-बार कह रहा था कि जाकर उसे आवाज दूँ, पर होंठ खुल नहीं रहे थे।

तभी उसने सिर उठाकर इधर देखा। हमारी नज़रें मिलीं। कुछ क्षण के लिए समय थम गया। उसकी आँखों में वही पुरानी पहचान झलक रही थी, पर साथ ही एक अजनबीपन भी था।मैं हिम्मत जुटाकर उसके पास गया। उसने मुस्कुराते हुए कहा,“इतने सालों बाद… सच कहूँ तो मुझे उम्मीद ही नहीं थी कि तुम _..........(कहानी के अगले भाग में पढ़ें आगे क्या हुआ, क्यूं वो....)

_© *रचनाकार:- अभिषेक चतुर्वेदी 'अभि'*