बिना अलविदा के InkImagination द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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बिना अलविदा के

बिना अलविदा के

कभी-कभी जिंदगी में वो पल आते हैं, जब आप फोन पर स्क्रॉल कर रहे होते हैं, और अचानक एक मैसेज आता है। वो मैसेज जो बस एक सिम्पल "हाय" होता है, लेकिन आपकी पूरी शाम बदल देता है। क्या तुम्हें भी कभी ऐसा हुआ है? वो शाम जब आप अकेले बैठे होते हो, कॉफी का कप हाथ में, और सोचते हो कि आज का दिन भी वही पुराना था – घर, कॉलेज, घर। फिर वो नोटिफिकेशन की घंटी बजती है, और आप मुस्कुरा उठते हो। मेरी स्टोरी भी कुछ ऐसी ही शुरू हुई थी। शायद तुम्हारी भी।
मैं अठारह की थी। कॉलेज का पहला साल। वो उम्र जब सब कुछ नया लगता है – नए दोस्त, नई किताबें, और दिल की वो हल्की-सी हलचल जो बताती है कि जिंदगी में कुछ स्पेशल होने वाला है। मैं थोड़ी इंट्रोवर्ट टाइप थी – ज्यादा बातें नहीं करती, बस किताबों में या अपनी डायरी में खोई रहती। सोशल मीडिया पर भी एक्टिव नहीं, बस कभी-कभी स्टोरीज देखती। एक शाम, इंस्टाग्राम पर एक रैंडम रिक्वेस्ट आई। नाम था – आर्यन। प्रोफाइल देखी – 21 साल का, कॉलेज में, कुछ फोटोज ट्रिप्स की, कुछ फ्रेंड्स के साथ। कुछ खास नहीं, लेकिन उसकी बायो में लिखा था – "जीना तो है, लेकिन अपनी शर्तों पर।" मुझे पसंद आया। रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली।
पहला मैसेज उसी का था। "तुम अलग लगती हो... तुम्हारी स्टोरी में वो किताब की फोटो देखी। क्या पढ़ रही हो?" बस इतना। मैंने रिप्लाई किया – "एक नॉवेल। तुम्हें पढ़ने का शौक है?" और बस, बात शुरू हो गई। पहले दिन सिर्फ किताबों पर। अगले दिन म्यूजिक पर। फिर फिल्मों पर। वो कंफीडेंट था – बातें करने में तेज, हमेशा कुछ ऐसा कहता जो मुझे स्पेशल फील कराता। "तुम्हारी बातों में एक डेप्थ है, जो कम लोगों में होती है," वो कहता। मैं मुस्कुराती, और सोचती – क्या सच में?
धीरे-धीरे वो मेरी आदत बन गया। सुबह उठते ही फोन चेक करती – उसका गुड मॉर्निंग मैसेज। "आज का दिन कमाल का हो!" वो लिखता, और मैं रिप्लाई करती – "तुम्हारे मैसेज से तो हो गया।" शाम को कॉलेज से लौटकर, डिनर से पहले हम चैट करते। कभी वो अपनी फैमिली की स्टोरीज शेयर करता – कैसे उसके पापा स्ट्रिक्ट हैं, लेकिन वो रिबेल है। कभी मैं अपनी – मां की चिंताएं, कॉलेज का स्ट्रेस। रात को "सो जाओ, कल बात करते हैं" कहकर वो ऑफलाइन हो जाता, और मैं सोचती – कल का इंतजार रहेगा। वो मेरी हर छोटी बात सुनता, एडवाइज देता, हंसाता। लगता जैसे कोई अपना मिल गया हो। क्या तुम्हें भी कभी ऐसा लगा है? वो फीलिंग जब कोई अनजान इतना अपना लगने लगे कि बिना उसकी बात के दिन अधूरा लगे?
फिर वक्त बदला। पहले तो नोटिस नहीं किया। एक दिन मैसेज लेट आया। "सॉरी, बिजी था।" मैंने कहा, "नो प्रॉब्लम।" लेकिन अंदर से थोड़ा सा डर लगा। फिर हफ्ते में एक-दो दिन ऐसा होने लगा। मैं पूछती – "सब ठीक है ना?" वो कहता – "हां, बस असाइनमेंट्स का प्रेशर।" मैं मान लेती। लेकिन धीरे-धीरे गुड मॉर्निंग कम होने लगे। रात की बातें छोटी हो गईं। मैं मैसेज करती – "आज क्या किया?" जवाब आता – घंटों बाद, "बस ऐसे ही। तू बता।" मैं बताती, लेकिन वो डिटेल्स नहीं पूछता जैसे पहले पूछता था।
मैंने खुद को समझाया – शायद सच में बिजी है। कॉलेज, फ्रेंड्स, लाइफ। मैं भी तो बिजी हूं। लेकिन दिल जानता था – कुछ बदल रहा है। एक शाम मैंने कॉल ट्राई की। वो नहीं उठाया। मैसेज किया – "कॉल क्यों नहीं उठाया?" जवाब आया – "मीटिंग में था।" मीटिंग? 21 साल का लड़का कौन-सी मीटिंग? लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। डर था कि कहीं झगड़ा न हो जाए। क्या तुमने भी कभी ऐसा किया है? वो डर कि अगर ज्यादा पूछा तो वो और दूर हो जाएगा?
फिर वो दिन आया। कोई मैसेज नहीं। सुबह नहीं, शाम नहीं। मैंने भेजा – "हाय, कैसा है?" सीन। लेकिन रिप्लाई नहीं। अगले दिन फिर – "कुछ हुआ क्या?" सीन। फिर कुछ नहीं। मैं घबराई। क्या ब्लॉक कर दिया? चेक किया – नहीं। ऑनलाइन आता था, स्टोरीज लगाता था – फ्रेंड्स के साथ, हंसते हुए। लेकिन मेरे मैसेज का जवाब नहीं। मैंने गुस्से में लिखा – "क्या प्रॉब्लम है? बता तो सही!" सीन। फिर साइलेंस।
ना कोई झगड़ा। ना कोई ब्रेकअप। ना कोई एक्सप्लेनेशन। बस... वो गायब हो गया। बिना अलविदा कहे। मैं रातों में फोन देखती रहती – शायद अब आएगा। लेकिन नहीं आया। पहले हफ्ते मैंने खुद को समझाया – "शायद सच में बिजी होगा।" फिर महीने – "शायद वापस आएगा।" और आखिर में – "शायद मेरी ही गलती थी। क्या मैं ज्यादा अटैच हो गई?" दोस्तों से शेयर किया – "यार, वो ऐसे ही है। भूल जा।" मैं मुस्कुराती, "हां, भूल गई।" लेकिन भूलती कहां?
दिन बीतते गए। महीने। फिर दो साल। आज वो कहीं अपनी लाइफ में बिजी होगा। शायद किसी और से बातें कर रहा होगा, किसी और को स्पेशल फील करा रहा होगा। मैं? बाहर से स्ट्रॉन्ग हूं। नई जॉब, नए दोस्त, हंसती हूं, घूमती हूं। लोग कहते हैं – "तू तो पूरी चेंज हो गई!" मैं कहती हूं – "फर्क नहीं पड़ता अब।" लेकिन सच? जब कहीं कोई कपल देखती हूं, हाथ में हाथ डाले, हंसते हुए, तो दिल के किसी कोने से आवाज आती है – "कभी हम भी ऐसे थे..." रातों में, जब सब सो जाते हैं, मैं पुराने चैट्स स्क्रॉल करती हूं। और खुद से पूछती – "मैं किसे बताऊं कि आज भी दर्द होता है?"
अगर जाना ही था, तो कम से कम बता तो देता। एक अलविदा कहकर। क्योंकि सबसे ज्यादा दर्द छोड़ जाने से नहीं, बिना बताए छोड़ देने से होता है। वो खालीपन, वो सवाल – "क्यों?" जो कभी जवाब नहीं मिलता।
क्या तुमने भी कभी ऐसा महसूस किया है? वो फीलिंग जब कोई बिना अलविदा कहे चला जाता है, और तुम सालों बाद भी सोचते रहते हो – "क्या मैं इतनी भी वैल्यू नहीं रखती थी?" कमेंट में बताओ – शायद तुम्हारी स्टोरी किसी को हिम्मत दे दे। शायद मुझे भी।

ये कहानी कैसा लगा कमेंट में बताए।

“इश्क़… जुनून… और एक माफिया का खतरनाक दिल।
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अगर हिम्मत है… तो इस प्यार की गहराई में उतर कर देखिए।”

📌 "Mafiya ki deewangi", read it on Pratilipi :,

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