The Morgue - Part 3 fiza saifi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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The Morgue - Part 3

रात के ठीक 2:17 बजे थे। शहर के पुराने सरकारी अस्पताल का मुर्दाघर फिर से उसी ठंडी खामोशी में डूबा हुआ था, जहाँ पिछली बार सब कुछ खत्म हुआ था… या शायद शुरू हुआ था।

डॉ. आरव को उस रात के बाद कई बार नींद में वही दृश्य दिखाई देता था—स्टील की ट्रे, आधा खुला दरवाज़ा, और वह शव जिसकी आँखें अचानक खुल गई थीं। पुलिस ने केस को “मानसिक तनाव” कहकर बंद कर दिया था, लेकिन आरव जानता था कि सच्चाई कुछ और थी।

उस रात उसे फिर से कॉल आया।

“सर… मुर्दाघर में कुछ गड़बड़ है,” वार्ड बॉय रमेश की काँपती आवाज़ थी।
“फिर से?” आरव के हाथ से फोन लगभग छूट गया।

वह तुरंत अस्पताल पहुँचा। गलियारे की लाइट्स झिलमिला रही थीं। जैसे ही वह मुर्दाघर के पास पहुँचा, दरवाज़ा अपने आप खुल गया। अंदर वही ठंडा कमरा… लेकिन इस बार पाँच नंबर की ट्रे खाली थी।

“शव कहाँ गया?” आरव फुसफुसाया।

अचानक पीछे से दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया। कमरे का तापमान और गिर गया। फ्रीज़र की मशीन अपने आप चालू हो गई, और दीवार पर टंगी घड़ी उल्टी दिशा में चलने लगी।

रमेश डर के मारे दरवाज़ा पीटने लगा, “सर, कोई हमारे साथ अंदर है…”

आरव ने टॉर्च जलाई। रोशनी एक कोने पर जाकर ठहर गई। वहाँ एक और ट्रे थी—जो पहले कभी नहीं थी। उस पर एक नया शव पड़ा था… लेकिन चेहरे पर चादर नहीं थी।

आरव धीरे-धीरे आगे बढ़ा। जैसे ही उसने चेहरा देखा, उसकी साँस रुक गई।

वह शव उसी का था।

उसी के चेहरे पर वही तिल, वही कट का निशान। और तभी पीछे से किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“डॉक्टर साहब… अब आपकी ड्यूटी खत्म हुई,” एक ठंडी आवाज़ गूँजी।

आरव ने पलटकर देखा—वही महिला, जिसका पोस्टमॉर्टम उसने तीन दिन पहले किया था। उसकी आँखें अब पूरी तरह काली थीं।

“आपने सच्चाई छुपाई थी…” वह बोली।

अचानक कमरे की सारी लाइट्स बुझ गईं। चीख की आवाज़ गूँजी… और फिर सब कुछ शांत हो गया।

अगली सुबह अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई। मुर्दाघर के अंदर दो और शव मिले—एक रमेश का… और दूसरा डॉ. आरव का।

लेकिन हैरानी की बात यह थी कि सीसीटीवी फुटेज में रात 2:17 के बाद कोई भी अंदर जाता या बाहर आता दिखाई नहीं दिया।

और पाँच नंबर की ट्रे… फिर से भरी हुई थी।

उस पर एक चिट लगी थी—

“सच्चाई को दफनाने की सज़ा, हमेशा मौत होती है।”

सीसीटीवी फुटेज फिर से चेक की गई। 2:16 AM तक सब सामान्य था। 2:17 पर स्क्रीन में हल्की गड़बड़ी हुई… और एक फ्रेम के लिए, कैमरे में कुछ दिखा।

वह परछाईं किसी इंसान की नहीं थी। उसका शरीर टेढ़ा-मेढ़ा था, जैसे हड्डियाँ उलटी जुड़ी हों।

मीरा ने फुटेज रोकी।
“ज़ूम करो।”

जैसे ही तस्वीर साफ हुई, मीरा का चेहरा पीला पड़ गया।

परछाईं… डॉ. आरव की थी।
लेकिन वह ज़िंदा नहीं लग रहा था।


मीरा ने खुद पाँच नंबर की ट्रे खोलने का फैसला किया।

अंदर वही महिला का शव था, जिसका पोस्टमॉर्टम आरव ने किया था। रिपोर्ट के अनुसार उसकी मौत “हृदयाघात” से हुई थी। लेकिन मीरा ने जब दोबारा जांच की, तो उसे गर्दन के पीछे हल्का सा इंजेक्शन का निशान मिला।

“यह प्राकृतिक मौत नहीं थी…” मीरा फुसफुसाई।

तभी पीछे से फ्रीज़र की सारी ट्रे एक साथ खिसकने लगीं।

खर्रर्रर्रर्र…

मीरा ने पलटकर देखा — हर ट्रे में एक ही चेहरा था।

डॉ. आरव।

हर शव की आँखें खुली थीं। और सब एक साथ उसे घूर रहे थे।


सच्चाई का खुलासा
अचानक कमरे की लाइट्स टिमटिमाईं। दीवार पर खून से लिखा हुआ संदेश उभर आया:

“सच लिखो… वरना तुम अगली हो।”

मीरा समझ गई — आरव ने उस महिला की हत्या को छुपाया था। किसी बड़े आदमी के दबाव में।
उस महिला की आत्मा तब से मुर्दाघर में फंसी हुई थी।

मीरा ने उसी वक्त नई रिपोर्ट टाइप की:

“मृत्यु का कारण — जहर का इंजेक्शन। हत्या।”
जैसे ही उसने “सबमिट” दबाया, कमरे की ठंडक धीरे-धीरे कम होने लगी। ट्रे वापस अपनी जगह चली गईं।

सब कुछ शांत हो गया।


लेकिन कहानी खत्म नहीं हुई…
मीरा राहत की साँस लेकर बाहर निकली।

अगले दिन अखबार की हेडलाइन थी:
“तीन साल पुराना हत्या का केस दोबारा खुला।”

लेकिन उसी रात…

ठीक 2:17 बजे…

मीरा के फोन पर एक अनजान मैसेज आया।

📩 “सच सामने आ गया… लेकिन कीमत अभी बाकी है।”

उसी समय अस्पताल के मुर्दाघर में पाँच नंबर की ट्रे अपने आप खुल गई।

अंदर इस बार कोई शव नहीं था।

सिर्फ एक आईडी कार्ड रखा था।

डॉ. मीरा सेन।

और कैमरे में… 2:17 पर…
एक नई परछाईं दिखाई दी।