The Morgue - Part 2 fiza saifi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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The Morgue - Part 2

अजय सिक्योरिटी रूम में बैठा था।

मॉर्ग के कैमरे की स्क्रीन अचानक झिलमिलाई।

फिर… तस्वीर साफ हुई।

बॉक्स नंबर 7 हिल रहा था।

धीरे-धीरे।

अंदर से।

अजय ने ज़ूम किया।

स्क्रीन पर साफ दिखा —
बॉक्स के अंदर रवि की लाश थी…

लेकिन उसकी आँखें खुली हुई थीं।

और वह… मुस्कुरा रहा था।


अजय हिम्मत करके मॉर्ग तक गया।

दरवाज़ा इस बार खुद-ब-खुद खुल गया।

अंदर की हवा सड़ी हुई थी… जैसे मांस कई दिनों से सड़ रहा हो।

सभी बॉक्स बंद थे।

लेकिन फर्श पर…
नाखूनों से खींची गई लंबी-लंबी लकीरें थीं।

जैसे किसी ने…
घिसटते हुए बाहर आने की कोशिश की हो।



अजय ने बॉक्स नंबर 7 खोला।

अंदर रवि था।

लेकिन उसका शरीर आधा सड़ा हुआ…
और उसके मुँह से कुछ काला-सा तरल बह रहा था।

अचानक उसकी गर्दन झटके से अजय की तरफ मुड़ी।

“तू भी आ गया…”

अजय पीछे हटने लगा।

तभी पीछे से धड़ाम की आवाज़ आई।

बाकी 12 बॉक्स खुल चुके थे।

अंदर की लाशें बैठ चुकी थीं।

उनकी हड्डियाँ चरमराने लगीं।

उनके सिर एक साथ अजय की तरफ घूमे।

और सबने एक साथ कहा—

“यह जगह खाली नहीं रहनी चाहिए…”


अजय भागने लगा।

लेकिन कॉरिडोर लंबा होता गया।

दरवाज़ा दूर होता गया।

लाइट्स टिमटिमाईं…

और अचानक सब शांत।


अगली सुबह


स्टाफ ने मॉर्ग खोला।

अब वहाँ 14 बॉक्स थे।

बॉक्स नंबर 13 में अजय।

बॉक्स नंबर 7 में रवि।

लेकिन…

दोनों बॉक्स के अंदर खरोंचें बाहर की तरफ नहीं…
अंदर की तरफ थीं।

जैसे कोई उन्हें बाहर आने नहीं दे रहा हो…

बल्कि अंदर बंद कर रहा हो।


पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए।

पता चला —
इस अस्पताल के नीचे पहले एक श्मशान था।

और मॉर्ग वहीं बनाया गया था…
जहाँ अधजली लाशें दफन की जाती थीं।

कहते हैं…

रात 2:13 पर
जिनकी मौत अधूरी रह जाती है…
वे वापस आते हैं।

अपने लिए जगह बनाने।


और अब…

मॉर्ग में 14 नहीं…

15 बॉक्स हैं।

क्योंकि कल रात…

किसी ने साफ सुना—

“जगह बनाओ… एक और आ रहा है…”


अस्पताल ने मामला दबा दिया।
रवि… अजय… “हार्ट फेलियर।”

लेकिन शहर में अफवाह फैल चुकी थी —
मॉर्ग में कुछ है।

फिर एक दिन आई —
डॉ. मीरा सेन, मनोचिकित्सक।

उसे बुलाया गया था यह साबित करने के लिए कि
“सब कुछ सामूहिक वहम है।”


2:13 — इस बार अकेली नहीं
मीरा ने तय किया —
वह 2:13 पर मॉर्ग के अंदर रहेगी।

उसने रिकॉर्डर चालू किया।
कैमरा ऑन किया।
दरवाज़ा बंद।

घड़ी ने 2:12 दिखाया।

अचानक…

उसके कानों में फुसफुसाहट।

लेकिन कमरे में कोई नहीं था।

“मीरा…”

उसका नाम।

धीरे… बहुत पास से।


आवाज़ें बाहर से नहीं आतीं
मीरा ने खुद को संभाला।
“ऑडिटरी हैल्यूसिनेशन,” उसने खुद से कहा।

लेकिन तभी—

बॉक्स नंबर 7 की धातु पर
अंदर से खरोंचने की आवाज़।

उसने हिम्मत कर ढक्कन खोला।

अंदर…

कोई लाश नहीं थी।

सिर्फ एक आईना।

स्टील के अंदर फिट किया हुआ।

उसने अपने चेहरे की तरफ देखा।

लेकिन प्रतिबिंब…
उसकी हरकत से आधा सेकंड देर से हिल रहा था।

फिर प्रतिबिंब मुस्कुराया।

मीरा नहीं।


अचानक बाकी सारे बॉक्स खुल गए।

लेकिन उनमें लाशें नहीं थीं।

हर बॉक्स में एक-एक आईना।

और हर आईने में मीरा।

लेकिन हर मीरा अलग।

एक रो रही थी।
एक चिल्ला रही थी।
एक खून से सनी थी।
एक… बिल्कुल शांत।

फिर सबने एक साथ कहा—

“तुम हमें दफन नहीं कर सकती।”


मीरा घुटनों पर गिर गई।

उसे याद आया।

सालों पहले…

उसने अपनी छोटी बहन को कमरे में बंद कर दिया था —
सज़ा के तौर पर।

दरवाज़ा जाम हो गया।

आग लग गई।

वह बच गई।

उसकी बहन नहीं।

उस दिन के बाद
उसने वह याद दिमाग के सबसे गहरे कोने में बंद कर दी।

अपने अंदर एक “मॉर्ग” बना लिया।

जहाँ उसने उस चीख को फ्रीज कर दिया।


2:13 — हर रात
अचानक मॉर्ग की दीवारें पिघलने लगीं।

स्टील नरम होकर मांस जैसा हो गया।

फर्श धड़कने लगा।

जैसे पूरा कमरा… जिंदा हो।

आईनों में मौजूद सारी “मीरा”
धीरे-धीरे बाहर निकलने लगीं।

उनकी त्वचा राख जैसी।
आँखें जली हुई।

सबने एक साथ फुसफुसाया—

“मॉर्ग इमारत में नहीं होता…”

“मॉर्ग दिमाग में होता है…”

“जहाँ तुम अपनी अधूरी मौतें रखती हो…”


अगली सुबह
अस्पताल स्टाफ ने मॉर्ग खोला।

अंदर सब सामान्य था।

सिर्फ एक बदलाव।

अब वहाँ 16 बॉक्स थे।

बॉक्स नंबर 16 में —
डॉ. मीरा।

लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा था —

“मस्तिष्क में गंभीर आंतरिक रक्तस्राव।”

और अजीब बात…

उसके नाखूनों के नीचे
स्टील के छोटे-छोटे टुकड़े थे।

जैसे उसने…
अंदर से…
बाहर निकलने की कोशिश की हो।



कहते हैं…

हर इंसान के दिमाग में एक मॉर्ग होता है।
जहाँ वह अपने अपराध, डर और अधूरी चीखें जमा करता है।

और जब घड़ी 2:13 बजाती है…

कोई न कोई बॉक्स खुल ही जाता है।

अब सवाल यह नहीं कि मॉर्ग कहाँ है।

सवाल यह है —

तुमने अपने अंदर कितने बॉक्स बंद कर रखे हैं?