डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 13 Jyoti Prajapati द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 13

वंशिका ने रात भर अपनी योजना को शब्द दिए थे। उसने तय कर लिया था कि वह अब और बर्दाश्त नहीं करेगी। जैसे ही सूरज की पहली किरण कमरे में दाखिल हुई, उसका बुखार तो उतर गया था, लेकिन मन का उबाल शांत नहीं हुआ था। वह उठकर बाहर जाने ही वाली थी कि मुख्य द्वार पर ज़ोर-ज़ोर से घंटी बजने लगी। इतनी सुबह कौन हो सकता था?

जैसे ही काया ने दरवाज़ा खोला, घर का माहौल एक पल में बदल गया। सामने मनोरमा देवी और शिखा खड़ी थीं, उनके हाथों में भारी सूटकेस थे और चेहरों पर वही पुरानी अधिकार वाली चमक।

"अरे! राजा बेटा कहाँ है मेरा?" मनोरमा ने भीतर कदम रखते ही अपनी आवाज़ बुलंद की।

भूपेंद्र, जो अभी सोकर उठा ही था, माँ की आवाज़ सुनकर हड़बड़ा गया। "माँ? शिखा? तुम लोग अचानक... बताया भी नहीं?"

भूपेंद्र के चेहरे पर खुशी तो थी, लेकिन साथ ही एक गहरी चिंता की लकीर भी उभर आई। उसे पता था कि अब घर का वह लचीलापन, वह आज़ादी और वह शांति खत्म होने वाली है। अब घर में नियमों का एक ऐसा बंधन शुरू होगा जहाँ उसे हर कदम फूंक-फूंक कर रखना होगा। उसकी माँ और बहन की एंट्री का मतलब था कि घर में अब केवल उनकी हुकूमत चलेगी।


वंशिका बेडरूम के दरवाज़े पर खड़ी यह नज़ारा देख रही थी। पहले तो उसे गुस्सा आया, पर अचानक उसके दिमाग की बत्ती जली। 'काया को निकालने का काम मैं खुद क्यों करूँ? माँ और शिखा उसे इतना नचाएंगी कि वह खुद ही बोरिया-बिस्तर समेट कर भाग जाएगी। और भूपेंद्र? वह अपने आदर्शवाद के साथ भी अपनी माँ और लाडली बहन का विरोध तो कभी कर ही नहीं पाएगा।' वंशिका ने मन ही मन एक कुटिल मुस्कान ओढ़ ली और अपना गुस्सा शांत कर लिया।

मनोरमा और शिखा ने आते ही पूरे घर का मुआयना ऐसे किया जैसे वे किसी ज़ब्त की गई जागीर को देख रही हों। उनकी नज़र काया पर पड़ी।

"कौन है ये?" मनोरमा ने नाक सिकोड़कर पूछा।

"माँ, ये ही तो काया है। घर का सारा काम यही तो संभालती है," भूपेंद्र ने जवाब दिया।

काया, जो अब तक साहब की पसंदीदा बनकर घर की आधी मालकिन बन चुकी थी, उसने बड़ी शिद्दत और बनावटी विनम्रता के साथ मनोरमा के पैर छुए। उसने सोचा कि वह इन लोगों को भी अपनी सेवा से जीत लेगी।
लेकिन मनोरमा और शिखा का इरादा कुछ और ही था।
"काया! ज़रा हमारे लिए कड़क चाय बनाओ। और सुनो, दूध कच्चा नहीं रहना चाहिए, मुझे बासी दूध की चाय पसंद नहीं," मनोरमा ने सोफे पर पसरते हुए आदेश दिया।

शिखा ने तुरंत अपना बैग काया की ओर बढ़ाया। "और ये लो, मेरे कपड़े निकालकर प्रेस कर देना। दोपहर तक मुझे बाहर जाना है। और हाँ, कमरा ठीक से साफ करना, मिट्टी का एक दाना भी नहीं दिखना चाहिए।"

काया की मुस्कुराहट गायब हो गई। उसे आदत हो गई थी भूपेंद्र की प्लीज वाली बातों की और बच्चों के काया-मम्मा वाले दुलार की। यहाँ तो सीधे मिलिट्री जैसा अनुशासन था। वह रसोई में गई और काम करने लगी, लेकिन अब उसकी फुर्ती में वह पहले वाला उत्साह नहीं था। वह चिढ़ रही थी, पर चेहरे पर एक बनावटी, फीकी मुस्कान चिपकाए काम कर रही थी।

वंशिका हॉल में आकर बैठ गई। वह बहुत शांत थी। उसे अपनी बीमारी के बहाने थोड़ा और आराम करने का मौका मिल गया था। मनोरमा ने उसे देखते ही ताना मारा, "आ गईं बहू रानी! सुना है तुम्हारी तबीयत ढीली थी? देखो, जब तक घर की लक्ष्मी फुर्तीली न हो, घर में अलक्ष्मी का वास होने लगता है। अब देखो, इस नौकरानी के भरोसे घर छोड़ रखा है।"

वंशिका ने बस सिर हिला दिया। वह मनोरमा और शिखा की बातों का बुरा नहीं मान रही थी, बल्कि वह देख रही थी कि कैसे वे दोनों काया को नचा रही थीं।

"काया! अरे चाय ला रही हो या बागान से पत्तियां तोड़ने गई हो?" शिखा ने रसोई की ओर चिल्लाकर कहा।
काया चाय लेकर आई। मनोरमा ने एक घूँट पिया और चेहरा बना लिया। "छिः! ये क्या बनाया है? इसमें तो इलायची की महक ही नहीं है। वंशिका, तुमने इसे क्या सिखाया है? इससे अच्छी चाय तो हमारी पुरानी महरी बना लेती थी।"

शिखा ने भी मौका नहीं छोड़ा। "मम्मी, रहने दीजिये। भैया इसकी इतनी तारीफ कर रहे थे, मुझे लगा पता नहीं क्या जादू होगा। पर यहाँ तो सब गुड़-गोबर है। वंशिका भाभी, कम से कम आपको इसे सलीका तो सिखाना चाहिए था, या फिर आपको खुद भी नहीं आता?"

भूपेंद्र बीच में बोलने की कोशिश कर रहा था, "माँ, वह बहुत अच्छा काम करती है, आप बस..."

"भूपेंद्र! तू चुप रह। माँ को मत सिखा कि काम कैसे लिया जाता है," मनोरमा ने उसे डांटा।

वंशिका को अंदर ही अंदर बहुत सुकून मिल रहा था। वह देख रही थी कि काया की आँखों में आँसू आ रहे थे। काया को लगा था कि वह इस घर की धुरी है, लेकिन मनोरमा और शिखा ने उसे उसकी औकात एक सेकंड में दिखा दी थी।

दोपहर के खाने तक स्थिति और बिगड़ गई। मनोरमा रसोई में जाकर खड़ी हो गई और काया को हर छोटी बात पर टोकने लगी। "नमक इतना क्यों डाला? तेल कम इस्तेमाल करो, मेरे बेटे का स्वास्थ्य खराब हो जाएगा। और ये रोटियां इतनी मोटी क्यों हैं? शिखा को पतली फुलकी पसंद है।"


काया का चेहरा लाल हो गया था। वह भूपेंद्र की ओर उम्मीद भरी नज़रों से देख रही थी, लेकिन भूपेंद्र अपनी माँ के सामने सिर झुकाए बैठा था। वह राजा बेटा अपनी माँ की किसी बात को काटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।

शिखा ने मेज पर बैठते ही कहा, "भैया, इस काया से अच्छा तो आप कोई और रख लेते। ये तो बात-बात पर मुँह फुला लेती है। और वंशिका भाभी, आप तो बस आराम ही करती रहती हैं, कम से कम अपनी निगरानी में काम तो करवाइये।"

वंशिका ने मुस्कुराकर कहा, "ननद जी, काया को साहब और बच्चों ने बहुत सिर चढ़ा रखा है। मैं तो अब बस दर्शक हूँ।"

वंशिका का यह पासा सटीक पड़ा था। उसने काया को भूपेंद्र की नज़र में बेचारी और मनोरमा की नज़र में कामचोर बनाने का खेल शुरू कर दिया था। काया को समझ आ गया था कि अब उसका संघर्ष साहब के साथ अपनी नज़दीकियों को बचाने का नहीं, बल्कि इन दो महिलाओं के चंगुल से अपनी इज़्ज़त बचाने का है।
भूपेंद्र परेशान था। वह चाहता था कि काया की तारीफ करे, पर माँ के गुस्से के डर से वह चुप था। उसे लग रहा था कि घर की शांति अब किसी गहरे गड्ढे में गिर रही है।





क्रमशः

ज्योति प्रजापति 

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