प्रेम न हाट बिकाय - भाग 44 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 44

44—

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 गाडियाँ (ट्रेन्स)

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“मैं1988 मार्च 14 को जापान आयी थी। जापान में अंग्रेजी भाषा बिल्कुल नहीं है मुझे उस समय मालूम नहीं था।जापानी भाषा सीखने के लिए टोक्यो के एक स्कूल में जाना शुरू किया। उसके लिए गाडी (ट्रेन) से 1.30 घंटे का सफर करना होता था।
ट्रेन का टिकट मशीन से खरीदना होता था। पहले तो बहुत मुश्किल लगा क्योंकि सब कुछ जापानी भाषा में लिखा था।बड़ी मुश्किल से टिकट खरीदकर प्लेटफार्म पर गई| अजीब नज़ारा था -- न कुली, न चायवाले की आवाज़, न समोसे की दुकानें | इनकी जगह वेन्डिंग मशीन में दो भाग देखे जिनमें ऊपर गर्म चीजें और नीचे के भाग में ठंडी। सब प्लेटफार्म पर लाइन से खड़े हुए थे।गाड़ी रुकी तो उतरने वाले यात्री पहले उतरे बाद में चढने वाले यात्री चढे। 

एक नॉर्मल गाड़ी में 10 से 15 तक कोच होते हैं। (डिब्बे) कोच के बीच के भाग में तीन लम्बी सीटें आमने सामने होती हैं। एक लम्बी सीट पर 7 यात्री बैठ सकते हैं। कोच के आगे के दरवाज़े  ओर पीछे के द्वार पर तीन-तीन यात्री बैठ सकते हैं | आमने सामने की सीटें होती है। लम्बी सीट पर साथ बैठा जा सकता है लेकिन कोई बीच में घुसकर नहीं बैठ सकता, यहाँ  तक कि छोटा बच्चा भी नहीं।
सीट के बीच के रास्तों पर खड़े होने वालों की जगह होती है |खड़े होते समय भी यात्री सीट के पास लाइन लगाकर खड़े होते हैं । जिससे बैठे हुए यात्री के जाने के बाद  उसके सामने खड़ा हुआ यात्री ही उस जगह पर बैठे।किसी को परेशानी न हो इसलिए यात्री अपने बैग्स अपनी गोदी में ही रखते हैं | ”

   अनुशासन के बारे में रंजु ने बहुत सी बातें पहले भी आना से साझा कीं थीं कि जापान में बिलकुल हमसे विपरीत होता है | वहाँ पर सभी काम बहुत अनुशासित तरीके से होते हैं | सब लोग हर जगह पर नियमों का पालन करते हैं |  
     कोई शोर-शराबा नहीं, सब चुपचाप अपनी-अपनी किताबें पढ़ते हुए या ऊँघते हुए दिखाई देते हैं ।युवा लड़कियाँ मेकअप भी ठीक करती हुई दिखाई देती हैं |यहाँ का जीवन बहुत व्यस्त है जिससे सब अपने में ही व्यस्त रहते हैं |

आगे की पंक्तियाँ भी गाड़ी के बारे में ही थीं --- 
“सब गाडियाँ समय से आती-जाती हैं।मेरा शहर छोटा है वहाँ  हर 20 मिनिट में ट्रेन आती है। लेकिन टोकियो को लिंक करने वाले स्टेशनों पर हर तीन मिनट पर समय से गाड़ियाँ आती- जाती हैं ।टोकियो में तो लाइनों के जाल बिछे हुए है।कुछ ऊपर हैं तो कुछ ज़मीन के नीचे। पहली सब-वे ट्रेन 1919 में चली थी। ज़मीन कम होने के कारण सब-वे लाइन जाती हैं। टोकियो में 278 सब-वे स्टेशन और 13 सब-वे लाइनें हैं।
इतनी प्रगति देखते हुए मुझे अहसास हुआ जापान भारत से कम से कम 20 साल आगे चल रहा है।
अगर कभी एक या दो ही मिनट के लिए गाड़ी के आने में  देर हो जाये तो ड्राइवर अनाउंस करके बार-बार माफी माँगते हैं।
पहले-पहले तो मुझे बहुत आश्चर्य होता था एक-दो मिनिट ही तो देर हुई है जिसके लिए ड्राइवर देरी का कारण बताते हैं और क्षमा-याचना करते  हैं | अनुशासन के कारण सभी जगह पर संतुलन बना रहता है और जीवन आसानी से चलता है |इस सबके लिए ड्राइवर्स व कंट्रोल रूम विशेषज्ञों तथा अन्य सभी स्टाफ़ को कड़ी ट्रेनिंग दी जाती है|” 

   इसके आगे शायद रंजु अभी कुछ और लिखना चाहती होगी किन्तु उस बड़े से कागज़ों के रोल में आगे के पन्ने खाली थे | शायद उसे अभी अधिक लिखने का समय नहीं मिल पाया होगा लेकिन जितनी सूचनाएँ भी आना को मिली थीं, उसके पास सोचने, चिंतन करने के लिए काफ़ी मसौदा था |वह फिर से रिश्तों के बारे में, अपने जीवन के बारे में सोचने के लिए विवश हो गई | उसे हँसी भी आई कि एक दिन में 200 पृष्ठ से अधिक पन्नों की पुस्तक पढ़ लेने वाली आना की पढ़ने की रफ़्तार कैसे इतनी काम हो गई थी कि रंजु के लिखे हुए पृष्ठ वह कितने लंबे समय तक पढ़ ही नहीं पा रही थी | इसका सीधा सा कारण यह तो था ही कि उसने उन्हें लगातर पढ़ने का प्रयत्न ही नहीं किया था | जब भी रंजु ने उससे पूछा कि क्या उसने वह पढ़ लिया है तो वह झूठ नहीं बोल पाई फिर तो वह भी अपनी गृहस्थी में मगन हो गई थी | 

आना को इस बात की बड़ी खुशी थी कि रंजु ने किस प्रकार से जापानी संस्कृति को अपने भीतर, अपने आचार-व्यवहार में उतार लिया था जैसे वहीं जन्मी और बड़ी हुई हो |शीनोदा और उसका परिवार उससे बहुत खुश था और उनका जीवन आनंद में व्यतीत हो रहा था|