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“ एक बात नहीं समझ आई ---” बड़े गंभीर स्वर में एक दिन चाय पीते हुए शीनोदा विवेक से बोल पड़ा |
“ऐसा क्या है जो नहीं समझे हो, अब तो तुम भारत में काफ़ी दिनों से हो –”
“वही तो ---व्हाय पीपल आर सो डुप्लिकेट, कन्फ़्यूज्ड ?”
“ये तो सब जगह होते हैं, आखिर मनुष्य के मन की भीतरी भावनाएँ, संवेदनाएँ तो एक सी ही हैं न !क्या जापान में नहीं होते डुप्लिकेट और कन्फ़्यूज्ड लोग ?”विवेक कुछ रुड थे |
शीनोदा विवेक से अपने मन की सारी बातें करने लगा था | अनामिका से भी करता था किन्तु कुछ बातों के कहने में वह कुछ झिझकता भी था |
“नहीं, मैं कहना चाहता हूँ कि गांधी जी की संस्था में ----इट शुड नॉट बी --–”
“मतलब ---?” विवेक ने प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखते हुए पूछा |
शीनोदा ने विवेक से खुलकर वो कहानी बता दी जो उसे भीतर से साल रही थी | विवेक के पास उसकी बात का कोई उत्तर नहीं था, वह उद्विग्न था और विवेक से कुछ स्पष्ट करना चाहता था |कुछ बातें ऐसी होती हैं कि उनके बारे में हम स्वयं ही मुँह में दही जमाकर बैठ जाते हैं फिर दूसरों को कैसे स्पष्टता दे सकते हैं ?
आना रसोईघर में थी, रामी को काम बताकर वह नैपकिन से हाथ पोंछते हुए डाइनिग-टेबल की कुर्सी पर आ जमी | कभी-कभी उसे बहुत थकान होने लगती थी, आज कुछ अतिथि आने वाले थे इसलिए वह रामी के साथ रसोईघर में व्यस्त थी |
“सब ठीक है न शीनोदा, तुम्हारा चेहरा बहुत फीका लग रहा है, क्या हुआ है ?”
“अब इसकी शादी हो जानी चाहिए, इसको कंपेनियन चाहिए ---”विवेक माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए मुस्कुराकर बोले |
“हाँ---बिल्कुल !कंपेनियन सबको चाहिए, मैं तो कब से कह रही हूँ | अब यहाँ जापानी कन्या तो मिलने से रही---”आना हँस पड़ी किन्तु थकान उसके पोर-पोर से टपक रही थी|
शीनोदा ने विवेक की ओर मुँह घुमाया, एक मायूसी सी उसके चेहरे पर थी | शायद विवेक भी नहीं समझ पा रहे थे उसकी बातों का क्या उत्तर दें, क्या बोलें ?आना ने शीनोदा के कुछ शब्द सुने तो थे लेकिन वह रसोईघर में व्यस्त रहने के कारण पूरी बात समझ नहीं पाई थी| सारा काम रामी पर तो नहीं छोड़ सकती थी इसीलिए उसके साथ लगी हुई थी और बुरी तरह थक गई थी ----
“आना दीदी, पहले आप ठंडा लींबू पाणी पीओ ---अणे अब्बी नईं आनेका रसोड़े में, थोड़ा काम रह गया –हूँ खतम करी नाखीश –”रामी ने अनामिका के सामने काँच के एक ग्लास में ठंडा नीबू का शर्बत लाकर रख दिया और उसके हाथ से नैपकिन ले लिया जो वह काम करते हुए हाथ पोंछते हुए उठाकर ले आई थी |दो घूँट में आना ने ग्लास खाली कर दिया| कभी-कभी इतनी थक जाती थी वह कि खुद से ही खुद की शिकायत करने लगती थी |
“कर लेती न रामी, तुम्हें भी थकने का कुछ ज़्यादा ही शौक है आना |” अनामिका पति के चेहरे पर कुछ तलाशने की दृष्टि से अवाक सी ताकने लगी | कैसे होते हैं न ये पुरुष ! साहब के कोई महत्वपूर्ण अतिथि हैं, यह तो पहले दिन ही ढिंढोरा पीट दिया गया था |उसका थका हुआ मुँह फूल गया | अभी तैयार भी होना था, पसीने में सराबोर हो रही थी आना | कुछ देर आराम करने के लिए अपने कमरे में जाकर लेट गई वह !
शीनोदा जाने की ज़िद कर रहा था किन्तु विवेक ने उसे डिनर के लिए रोक लिया, दोनों चुप्पी ओढ़े सिटिंग रूम में बैठे रहे |कभी-कभी ऐसा होता है न कि शब्द कहीं खो जाते हैं, हमारे पास शब्दों का अकाल पड़ जाता है, वैसे चाहे कितनी बकबक करते रहें लेकिन कभी आवाज़ का इंजन ऐसी जगह पर आकर ठिठक जाता है कि उसे आगे का मार्ग दिखाई ही नहीं देता | ऐसा ही कुछ विवेक के साथ हो रहा था | एक नॉर्मल स्थिति में कैसे ठहाके लगाते थे दोनों लेकिन अब कुछ समझ ही नहीं आ रहा था, दोनों में से किसी के भी| शीनोदा चुपचाप सामने पड़े अख़बार के पन्ने पलटता रहा और विवेक उसके उदास चेहरे को पढ़ने की कोशिश करते रहे |
लगभग एक घंटे में मेहमान आए तब तक आना भी स्वस्थ हो गई थी |रामी ने खाने की मेज़ को सुंदर सा सजा दिया था, सलाद इतना सुंदर सजाया था कि मेहमानों के मुख से प्रशंसा निकल ही गई | रामी के थके हुए चेहरे पर ताज़गी पसर गई, उसने खूब उत्साहपूर्वक मेहमानों को गर्मागर्म खाना खिलाया और वाहवाही लूटी | जाते हुए उसके हाथ में करारा नोट करकरा रहा था | शीनोदा सबके साथ चुप ही बैठा रहा वैसे भी वह इतनी आसानी से किसी से खुलता नहीं था फिर उस दिन तो उसका मूड बिल्कुल ही ऑफ़ था | डिनर लेकर वह चला गया |
रात में विवेक ने आना से शीनोदा की पीड़ा साझा की | शीनोदा ने विद्यापीठ के बगीचे में वहाँ के एक बड़े अधिकारी को गाड़ी में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था| वह किसी काम से विद्यापीठ गया था, रात के लगभग नौ बजे का समय था | विद्यापीठ के भीतर की सड़कें काफ़ी चुप और सूनी थीं | ये वो ज़माना था जब लोगों ने नए-नए ‘क्राउन’ के ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविज़न खरीदे थे | अपने काम से आकर लगभग हर घर में लोग टेलीविज़न के कान उमेठ देते थे | उन दिनों रिमोट वाले टेलीविज़न नहीं होते थे | उठकर ही चैनल बदलने या आवाज़ धीमी, ज़्यादा करने का कष्ट उठाना पड़ता था |
विद्यापीठ की एक चुप सी सड़क पर चलते हुए शीनोदा कुछ आवाज़ सुनकर आराम से पेड़ों के झुरमुट के बीच छिपी गाड़ी की ओर झाड़ियों में घुस गया था|वह उस आदमी से अच्छी तरह परिचित था, वह वहीं का एक बड़ा सम्मानीय पद पर प्रतिष्ठित बड़ा अधिकारी था जिसका वहाँ ख़ासा रुआब चलता था | शीनोदा विद्यापीठ की ही एक छात्रा के साथ उसे आपत्तिजनक स्थिति में देखकर असमंजस में आ गया | वह यह सोचकर परेशान था कि वह आदमी अचानक ही खुद को सँभालते हुए उस लड़की को उसके सामने बहन कहकर कैसे पुकारने लगा था?
शीनोदा जब यहाँ हॉस्टल में रहता था, उसने सब मित्रों को अपने कमरे पर बुलाया था तब शोर होने पर उसने व उसके सभी साथियों ने वहाँ के हॉस्टल-इंचार्ज से कितनी माफ़ी मांगी थी, उनकी कितनी बातें सुनी थीं | इस समय की हरकत के सामने तो वो कुछ भी नहीं था | मानता है, नियम के खिलाफ़ व्यवहार गलत था किन्तु वो जो उसने देखा और महसूस किया उसका क्या?उसके लिए ‘रिलेशनशिप’ का यह दूसरा ही रूप था, अनामिका के बताने से सर्वथा विपरीत !
उस प्रतिष्ठित पदाधिकारी की एक और भी कहानी थी | एक बार वह कहीं से आ रहा था कि उसका एयरक्राफ़्ट लैंड करते हुए एक पेड़ से टकरा गया | यह भयंकर दुर्घटना थी, लगभग पैंसठ यात्रियों, क्रू और पायलेट्स समेत वह जहाज़ बुरी तरह नष्ट हो गया था | पूरे शहर में एक शोर बरपा हो गया था | इतने लोगों में यदि बचा था तो यही पदाधिकारी जिसको शीनोदा ने आपत्तिजनक स्थिति में देखा था |लगभग छह/आठ माह बाद चेहरे पर बन गए कुछ निशानों के अतिरिक्त वह एकदम फिट था |शीनोदा जब कभी ऑफ़िस किसी काम से जाता, उस अधिकारी से ज़रूर मिलता था, साथ चाय पीता और उसकी प्रशंसा करते हुए यह सोचता कि गांधी जी की संस्था में अधिकतर सभी पवित्र आत्मा के लोग हैं |
‘यह ज़रूर कोई ग्रेट सोल है, इसीलिए इतने बड़े एक्सीडेंट से बस यह एक ही बचा ---‘वह सोचता | उसने कितनी बार और न जाने कहाँ कहाँ इस बात का अलग-अलग अंदाज़ में ज़िक्र किया था | उसके अनुसार में वह कोई बड़ी पवित्र आत्मा थी लेकिन उस दिन उसका मीठे सपनों से भरा घड़ा टूट गया और उसकी प्यास उथली हो गई | गांधी जी की संस्था से उसका विश्वास चरमराने लगा,
“मि. गौड ! आप कहते हैं, यह बारत है, यहाँ गर्ल फ्रेंड नहीं बना सकते तो ऐसा कर सकते हैं क्या ? आई थिंक दिस इज़ मीन ---वेरी मीन !इन माय ओपीनियन ही वाज़ ए ग्रेट सोल बट –आइ वाज़ रौंग – आपको जो भी करना है, खुलकर करना चाहिए न !ऐसे --”शीनोदा के ऐसा पूछने से जैसे विवेक पर घड़ों पानी पड़ गया था और वे चुप हो गए |क्या बताते यहाँ जो लोग गड़बड़ी करते हैं अधिकतर पर्दों में ही तो होती है | यहाँ खुलकर नहीं किया जा सकता –यहाँ तो ‘मुँह में राम, बगल में छुरी’ वाला ही मामला फिट रहता है लोगों के मस्तिष्क में !