प्रेम न हाट बिकाय - भाग 26 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 26

26 - 

     होली के दिन धूप से खिलते चेहरे वाला शीनोदा होलिका-दहन के पास खड़ा था | सोसाइटी से बाहर सड़क पर धू-धू करती होली की लपटों से निकलने वाले प्रकाश में उसका चेहरा लाल-भभूका हो रहा था | मज़े की बात यह कि केवल वही नहीं, उसके साथ विवेक, दृष्टांत व अनिल भी एक कतार में खड़े थे | 

“मम्मा ! देखो शीनोदा अंकल ----”दृष्टि ने माँ का ध्यान उनकी ओर दिलवाया | 

       ओह ! पूरी पलटन पधारी है ! अभी तो वह घर से बड़बड़ करती निकली थी, बाप-बेटे दोनों सुस्ती में पड़े थे, उसका मूड कितना ख़राब हो गया था ! बस, उसका ही कहना नहीं मानना होता किसी को !अब देखो, सारे बंदर एक साथ !और ये शीनोदा टपक भी पड़ा?

 घर से निकलते हुए वह यह डायलॉग मारकर निकली थी;   

“करते वही हैं जो इनका मन करे---चल नहीं सकते क्या होलिका-दहन के दर्शन करने ?”

 आना  बड़बड़ करने लगी थी, साथ ही पूजा की तैयारी भी !

“यार ! तो तुमको थोड़े ही मना किया कभी किसी चीज़ के लिए भी ---?”

“बड़ा फ़र्क होता है मना करने और मानने में ---”खीजी हुई आना ने अपनी भड़ास निकाली | 

“यार !क्या है आना, औरतों की होती हैं ये सब बातें, करो तुम, हमें क्यों घसीटती हो ?”विवेक ने ऐसे ही कह दिया था |

“वैसे, ये बातें औरतों की होती हैं ?घर औरत का ही तो होता है, नाम तो मर्द का चिपका रहता है हर जगह  –औरतों की होती हैं ! हाँ, तुम भी तो मर्द ही हो न, तुम कैसे समझोगे हमारी बात कि हमें भी कंपनी चाहिए होती है अपने पति की ! मना नहीं किया, ये तो मना करने भी ज़्यादा तकलीफ़ देता है कि तुम ही कर लो न ! -- और ये हम कौन है ?” तरेरती हुई आँखों से उसने सामने वाले सोफ़े पर पसरे कॉमिक के पन्ने पलटते हुए अपने 'टीन–एज' बेटे को देखा | पिता-पुत्र की आँखों के इशारों से अनामिका और बिगड़ गई |

“पापा के ही गुण सीख लो ---” उसने बेटे की तरफ़ आँखें तरेरीं थीं |

“वैसे तो गुणगान करती रहती हैं आप पापा के ! आज क्या हो गया ?” विवेक ने मीठी सी मुस्कान पत्नी पर फेंकी |

     आना ने विवेक की बात का कोई उत्तर नहीं दिया और दृष्टि के साथ होली पूजने निकल गई  और अब ये सारे के सारे पंक्तिबद्ध उसके सामने खड़े थे | विवेक ऐसे मुस्कुराते हुए खड़े थे जैसे कुछ हुआ ही न हो |कमाल की होती है ये पुरुषों की जात भी ---हम कुढ़ते रह जाएँ, ये ऐसे व्यवहार करेंगे जैसे कुछ हुआ ही न हो ---कभी कुछ ऐसा बोलकर घर से बाहर निकल जाएँगे कि बैठे कुढ़ते रहो, अपने आप तो बाहर जाकर मस्त हो जाते हैं और--–ख़ैर आज तो वह भी यही सोच रही थी कि  देर में घर जाएगी | वह भी कुछ ऐसा ही  महसूसना चाहती थी जो अक्सर पति लोग महसूसते होंगे --  लेकिन ये देखो कैसे खड़े हैं पूरी टोली के साथ मुस्कुराते ----- सच! इन पतियों के मूड का कुछ पता ही नहीं चलता !वैसे तो कहते हैं कि स्त्री-जात को कोई नहीं समझ सकता !

     शीनोदा बेधड़क अनामिका के पास अग्नि के फेरे लगाने वाले वृत्त की पंक्ति में आ पहुँचा | उसने दृष्टि के हाथ से नारियल लेकर अग्नि को समर्पित किया|विवेक, अनिल और दृष्टांत दूर से ही देख रहे थे | अचानक आना की नज़र गीता और उसके पति पर पड़ी जो पूजा कर रहे थे| गीता शीनोदा की तरफ़ व्यंग्यात्मक दृष्टि से देख रही थी जो अपने पास खड़े लड़के से डंडा लेकर और सब की देखादेखी जलती अग्नि में से समर्पित किया हुआ अधजला नारियल निकालने लगा था |

    न जाने ऐसा क्या था गीता की नज़र में कि आना के भीतर आग सुलग उठी | विवेक भी सब कुछ देख रहे थे किन्तु उनकी मुस्कुराहट में कोई तबदीली न हुई |वैसे भी बड़ी मुस्कुराती छवि थी विवेक की ! उसके जैसे मुँह फाड़कर हँसते नहीं थे लेकिन एक मनोहारी स्मित सदा उनके चेहरे पर सजी रहती |

‘बला का पेशेंस है बंदे में ----!’आना ने मन ही मन सोचा और अग्नि की प्रदक्षिणा करने लगी | उससे रहा नहीं गया और फिर से एक बार आँखों के इशारे से विवेक को प्रदक्षिणा करने के लिए कहा ---लेकिन ---पक्का बंदा !वहीं खड़ा मुस्कुराते हुए उसको इशारा करता रहा कि वह अपना काम ज़ारी रखे !

“ओ ! यू आर कॉलिंग मि.गौड टू वरशिप द फ़ायर---ह—ह—आई विल एकंपनी यू –डोंत वरी ”लंबा शीनोदा आराम से हँसा और दृष्टि के पैरों के साथ ताल मिलाकर चलने लगा |

सबकी देखादेखी उसने सब कुछ किया और आना व दृष्टि के साथ प्रणाम की मुद्रा बनाकर अग्नि-वृत्त से बाहर निकल आया | वह दृष्टि की उँगली पकड़कर आगे-आगे ऐसे लंबे लंबे कदमों से चल रहा था जैसे कोई पिता अपने बच्चे की उँगली पकड़े चल रहा हो, दृष्टि लगभग भागती सी उसके पीछे चल रही थी |  बाकी सब भी उनके पीछे-पीछे आराम से वापिस लौटने लगे  थे | आना हाथ में पूजा की थाली व लोटा पकड़े अपनी नॉर्मल चाल से सबके पीछे थी, नारियल तो शीनोदा ले ही गया था |

    गीता के पति विवेक से दुआ-सलाम करके ‘विश यू हैप्पी होली’ कहकर अपनी पत्नी को वहीं छोड़कर आगे निकल गए | गीता अपनी चमची के साथ व्यंग्य से शीनोदा व गौड परिवार को देखकर मुस्कुरा रही थी | पेट में पीड़ा तो उसके तभी से ही होनी शुरू हो गई थी जब से अनामिका ने दुबारा पढ़ाई शुरू की थी और उसका एक शिक्षित दायरा बन गया था लेकिन शीनोदा को देखते ही तो न जाने गीता को  कैसी मिर्च लग जाती थीं कि उसके भीतर की जलन चेहरे पर पसरकर उसे विद्रुप बना देती | 

       मनुष्य अपनी सोच के अनुसार कर्म करता है और उन कर्मों के परिणाम स्वरूप जो कुछ भी उसके चेहरे पर उभरता है, वह उसे सुंदर या असुंदर बनाता है|उसके चेहरे को मन के भाव ही सुंदर या असुंदर बनाते हैं | बेशक साधारण रंग-रूप वाला हो मनुष्य लेकिन अपने बोलने के तरीके से, दूसरों के प्रति अच्छी भावनाओं व व्यवहार से ही वह दूसरों के मन में अपनी जगह बनाता है |व्यवहार ठीक न हो, विवेकहीन हो तो सब बेकार !   

    अच्छी ख़ासी सुंदर थी गीता लेकिन उसकी सोच का छिछरापन उसके चेहरे को एक अजीब सी परछाईं से भर देता |वह अपनी बात सदा एक ऐसे अजीब से अंदाज़ में कहती कि उसके चेहरे पर कड़वाहट पसर जाती | 

    ज़िंदगी जीने के लिए ही मिलती है, सब जानते हैं किन्तु हम अहं में ऐसे भरे रहते हैं जैसे सब कुछ अपने हाथ में हो और हम अमरता का पट्टा लिखवाकर लाए हों | अनामिका इस मामले में बड़ी भाग्यशाली थी, उसके इन सारे संबंधों  में ही न कोई अपेक्षा थी और न ही कोई उपेक्षा !ऐसे सरल संबंध जो रेशम की  डोर से नाज़ुक दिखते किन्तु पक्के इतने कि जीवन को एक व्यवस्थित ठहराव दे देते हैं ये  संबंध !  

     यही बात शायद उसके आस-पास रहने वालों को खलती लेकिन क्योंकि विवेक उसके साथ थे, वह बिंदास वही करती रही जो उसे करना होता था या जिसे वह ठीक समझती! 

शीनोदा फिर गोआ चला गया और उसने वहाँ से अनामिका को एक लंबी चिट्ठी लिखकर भेजी जिसमें लिखा था कि गोआ की किसी लड़की ने उसे ‘प्रपोज़’ किया है, उसने उसका पूरा परिचय व तस्वीर भी भेजी और अनामिका व विवेक से पूछा कि क्या वह लड़की उसके साथ ज़िंदगी भर चल सकेगी?

“इस भाई को भी क्या कहें, ऐसे पता थोड़े ही चलता है कि कोई साथ दे सकेगी या नहीं ऊपर से इतना सीधा है !कोई भी इसे झाँसा दे सकता है –”

“आपको ऐसा क्यों लगता है कि वह लड़की ठीक नहीं है ---”आना ने विवेक से पूछा |

“आना, तुम भी यार ---देख नहीं पा रहीं, यह ऐसी लड़की नहीं है जो इसका साथ दे सकेगी | जापान पहुँचने का लालच है, उसके बारे में जो बता रहा है शीनोदा, उससे सब पता लग तो रहा है, और कैसे देखोगे उसको ? ---बस ---वैसे भी कोई किसी के अंदर तो झाँककर देख नहीं सकता !”

वह चुप हो गई, बहस का कोई अर्थ नहीं था, उसने विवेक का मन्तव्य शीनोदा को लिख भेजा| विवेक दूर की सोचते थे, मनोमस्तिष्क से काम लेते जबकि अनामिका अधिक संवेदनशील हो जाती थी इसलिए आना  के अधिकतर मित्र विवेक से सलाह-मशवरा ज़रूर लेते थे |

      कुछ दिनों बाद शीनोदा वापिस आकर अपने काम में मग्न हो गया |रोज़ाना शाम की चाय विवेक के साथ पीने वाला बंदा पिछले सप्ताह केवल एक बार ही आया था, वो भी आना को कहीं जाना था अत: वह विवेक के पास बैठकर, गोआ के बारे में बातें करके अपना दिल हल्का कर गया था |बाद में विवेक ने आना से बहुत सी बातों का खुलासा किया |