वेलकम मिस्टर वैम्पायर ziya द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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वेलकम मिस्टर वैम्पायर

शहर की वो रात बाकी रातों से अलग थी।
आसमान पर चाँद था, मगर उसकी रोशनी में सुकून नहीं, एक अजीब-सी बेचैनी घुली हुई थी। जैसे चाँद भी किसी राज़ का बोझ ढो रहा हो। सड़कें सुनसान थीं और हवा में एक ठंडी सी नमी थी, जो इरा की त्वचा से टकराकर उसके दिल तक उतर रही थी।
टैक्सी के रुकते ही इरा ने सामने देखा—
पुरानी, ऊँची और डरावनी हवेली।
उसकी खिड़कियाँ काली आँखों की तरह घूर रही थीं।
“यहीं है मैडम,” ड्राइवर ने कहा, जैसे जल्दी से वहाँ से निकल जाना चाहता हो।
इरा ने सिर हिलाया, किराया दिया और टैक्सी जाते हुए देखती रही। जैसे ही टैक्सी मोड़ी और ओझल हुई, उसके आसपास की खामोशी और गहरी हो गई।
उसने गहरी सांस ली।
नई ज़िंदगी, नई नौकरी और कोई सहारा नहीं—इसलिए उसे यह जगह चुननी पड़ी थी।
पर दिल लगातार कह रहा था… यहाँ कुछ गलत है।
लोहे के गेट पर हाथ रखते ही ठंडक उसकी हथेली से होते हुए रगों में फैल गई। गेट ने धीमी सी आवाज़ के साथ रास्ता दिया।
हवेली के आंगन में कदम रखते ही उसे महसूस हुआ जैसे किसी ने उसे देख लिया हो।
लेकिन वहाँ… कोई नहीं था।
“वहम है,” उसने खुद से कहा और दरवाज़े की ओर बढ़ी।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
इरा ठिठक गई।
हवेली के अंदर हल्की पीली रोशनी थी। लकड़ी का फर्श चमक रहा था, जैसे अभी-अभी साफ किया गया हो। दीवारों पर पुरानी तस्वीरें टंगी थीं—कुछ चेहरे धुंधले, कुछ बेहद साफ… और कुछ ऐसे, जिनकी आँखें उसे देखते हुए लगती थीं।
“अजीब…”
उसने बुदबुदाया।
तभी—
“तुम देर से आई हो।”
आवाज़।
गहरी, ठंडी और बेहद पास।
इरा का दिल जैसे रुक गया।
उसने तेजी से पीछे मुड़कर देखा।
एक आदमी।
लंबा, चौड़े कंधे, काले कपड़े और ऐसा चेहरा, जिसमें खूबसूरती और खतरनाकपन दोनों साथ थे। उसकी आँखें गहरी थीं—इतनी गहरी कि उनमें झाँकते ही इंसान खुद को खो दे।
“आप…?”
इरा की आवाज़ काँप गई।
वो आदमी हल्का सा मुस्कुराया।
“आरव,” उसने कहा, “इस हवेली का मालिक।”
“लेकिन… एजेंट ने कहा था कि यहाँ कोई नहीं रहता।”
आरव उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ा।
हवा और ठंडी हो गई।
“वो बहुत कुछ नहीं जानते,” उसने कहा, “और बेहतर है कि कुछ बातें अनकही ही रहें।”
इरा को लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक रही हो।
कुछ तो था इस आदमी में—जो डराता भी था और खींचता भी।
“अगर आप यहाँ रहते हैं, तो आपने कमरा किराए पर क्यों दिया?”
इरा ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
आरव की नज़र कुछ पल उसके चेहरे पर टिकी रही, फिर वो बोला—
“क्योंकि मैं अकेलेपन से थक चुका था।”
उसकी आवाज़ में एक ऐसा सन्नाटा था, जो इरा के दिल को चीर गया।
रात गहराती गई।
इरा को उसका कमरा दिखाया गया—ऊपर, लंबे गलियारे के आख़िर में।
गलियारे की दीवारों पर लगी मोमबत्तियाँ खुद-ब-खुद जल रही थीं।
“बिजली?”
इरा ने पूछा।
“यहाँ चीज़ें थोड़ी… अलग तरीके से चलती हैं,” आरव ने कहा।
कमरे में पहुँचते ही इरा ने राहत की सांस ली। कमरा साधारण था, मगर साफ़ और सलीके से सजा हुआ।
आरव दरवाज़े पर रुका।
“अगर किसी भी चीज़ की ज़रूरत हो,” उसने कहा, “तो रात में अपने कमरे से बाहर मत आना।”
“क्यों?”
इरा के मुँह से सवाल निकल ही गया।
आरव की आँखों में एक अजीब सी लाल चमक उभरी—बस एक पल के लिए।
“क्योंकि रात…”
उसने धीमे से कहा,
“…मेरी होती है।”
और वो चला गया।
दरवाज़ा बंद होते ही इरा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसने खुद को संभाला और बिस्तर पर बैठ गई।
नींद आने की कोई उम्मीद नहीं थी।
आधी रात के बाद—
उसे लगा कोई उसे देख रहा है।
उसने आँखें खोलीं।
कमरे में अंधेरा था, मगर एक परछाईं खिड़की के पास खड़ी थी।
“क…कौन?”
उसकी आवाज़ डर से कांप गई।
परछाईं आगे बढ़ी—
और आरव सामने था।
“आप… यहाँ क्यों आए हैं?”
इरा ने चादर कसकर पकड़ ली।
आरव उसकी तरफ़ देख रहा था, जैसे किसी संघर्ष में हो।
“मैंने कहा था बाहर मत आना,” उसने कहा, “पर मैंने ये नहीं कहा था कि मैं अंदर नहीं आ सकता।”
वो उसके करीब आया।
बहुत करीब।
इरा की सांसें तेज़ हो गईं।
उसके शरीर से ठंडक निकल रही थी, मगर उसकी आँखों में आग थी।
“आप मुझे डरा रहे हैं,”
इरा ने कहा।
“मैं तुम्हें बचा रहा हूँ,”
आरव ने धीमे से कहा।
अचानक—
उसने इरा की कलाई पकड़ी।
उसका स्पर्श बर्फ़ की तरह ठंडा था।
“आपका हाथ…”
इरा ने फुसफुसाया।
आरव ने अपनी नज़र उसकी गर्दन पर टिकाई।
उसकी धड़कन साफ़ सुनाई दे रही थी।
“तुम्हें नहीं पता, तुम यहाँ क्यों आई हो,”
उसने कहा,
“और ये अनजाने में नहीं हुआ।”
उसके दाँत—
अब साफ़ दिख रहे थे।
नुकीले। खतरनाक।
इरा की आँखों में आँसू भर आए।
“आप क्या हैं?”
उसने काँपते हुए पूछा।
आरव ने आँखें बंद कीं, जैसे खुद पर काबू पा रहा हो।
“मैं वही हूँ,”
उसने कहा,
“जिससे इंसान सदियों से डरते आए हैं।”
“व…वैम्पायर?”
इरा के होंठ काँपे।
आरव ने सिर हिलाया।
“और तुम…”
उसने इरा की ठुड्डी उठाई,
“…मेरी कमजोरी हो।”
इरा का दिल डर और अजीब से खिंचाव से भर गया।
वो भागना चाहती थी…
मगर उसके शरीर ने धोखा दे दिया।
“अगर मैं तुम्हें चाहता…”
आरव ने उसके कान के पास फुसफुसाया,
“…तो तुम अभी ज़िंदा नहीं होती।”
उसने उसे छोड़ दिया और पीछे हट गया।
“सुबह तक सब सामान्य लगेगा,”
उसने कहा,
“लेकिन याद रखना—तुम अब इस दुनिया का हिस्सा नहीं रहीं।”
दरवाज़ा बंद हुआ।
इरा बिस्तर पर बैठी काँपती रही।
आँसू चुपचाप बहते रहे।
उसे समझ आ गया था—
ये सिर्फ़ एक हवेली नहीं…
ये एक खतरनाक प्रेम की शुरुआत है।
और वो प्रेम…
उसकी जान भी ले सकता है।
या उसकी रूह।