प्रेम न हाट बिकाय - भाग 23 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 23

23 --    

       अगले दिन विद्यापीठ जाने पर सबने शीनोदा का चेहरा मुस्कुराता हुआ पाया |उसके चेहरे पर रात की तकलीफ़ की ज़रा सी शिकन तक दिखाई नहीं दे रही थी | बासुदी ने सुना तो बोलीं ; 

“ए –शीनोदा ! तुमारा अचार–बिचार बिल्कुल बंद –अभी खिचड़ी, छाछ खाओ ---”उन्होंने रौब मारने की कोशिश की | 

 अब तक तो ग्रुप का जापानी बाबा भी पक्का हो गया था | 

“अचार के बिना खाना -----ओह ! टौर्चर ----” मुस्कुराते हुए बोला शीनोदा | 

“और तुम जे इन लोकों को टौर्चर किया -----” बासु दी भी मुस्कुराईं | 

पर बंदे ने जैसे सोच ही लिया था कि अपने आपको पक्का कर लेगा स्पाइसी फूड के लिए ! 

और उसने तीखा अचार व चटनी खाना नहीं छोड़ा | 

“अगर फिर बीमार हो गए न –तो हम साथ में नहीं आएँगे –” अशोक ने उसे टोका | 

“डोंट वरी---नाऊ आई नो द डॉक्टर ----”

“अरे ! बाबा रे ! देखना तो दीदी ---कितना बेशर्म हो गया ये -----” अशोक वैसे तो राजेन्द्र के जाने से उदास था किन्तु ग्रुप में बैठकर अपने को फन्ने-खाँ समझता रहता, मन भी उसका ऐसी जगहों  में ही लगता ---उसे लगा शीनोदा को ‘बेशर्म’ तो समझ नहीं आएगा| बोला भी कुछ अजीब सा उच्चारण करके था वो |

“आई नो ---दोस्त ---आपका मतलब हाई मैं शेमलैस हूँ ----?”

“ओ माई गॉड ---इसको तो ये भी पता चल गया---ओ ! शीनोदा भाई, आई एम सॉरी –” खिसियाहट के कारण  अशोक के कान और गाल लाल हो गए थे | पहाड़ी बंदा, वैसे भी कम गोरा तो था नहीं -----! क्या सोचता होगा, कितने खराब शब्द का प्रयोग कर दिया !  

“इट’स—ओ.के  --वी आर फ्रैंड्स -----” उसने बड़े आराम से ‘बेशर्म’ शब्द  पचा लिया था लेकिन अनामिका को वह बात अच्छी नहीं लगी थी, उसे शीनोदा कुछ उदास भी लगा –लेकिन ऐसा कुछ था नहीं , वह उसी प्रकार चटोरा बना रहा |     

      विद्यापीठ के वे दिन अनामिका के लिए मुश्किल तो थे लेकिन उल्लास से भरे हुए थे | लगता था जैसे एक बड़े बच्चों का झुंड शरारतें करने इक्कठा होता है|विद्यापीठ के लोगों को भी कुछ अजीब लगता था, विशेषकर आस-पास के गाँवों से आने वाले लड़के इन सबको कुछ ऐसे देखते हुए पास से निकलते जैसे वे कुछ अजूबा हों लेकिन इन सबको आनंद आने लगा था | शिकायतें भी होतीं लेकिन उनसे कभी कुछ अधिक पूछताछ नहीं की गई | इसका कारण---उस ग्रुप में अधिक उम्र की महिला-छात्राएँ थीं | 

        धीरे-धीरे सबके शोध समाप्त होते गए और सबका मिलना कम होता गया |जो बहुत स्वाभाविक था |मयंक व अशोक दोनों के कोर्स पूरे हो चुके थे |मयंक एक गुजराती दैनिक पत्र  में संवाददाता के पद पर काम करने लगा, अशोक को जयपुर में नौकरी मिली | बासुदी और कुंजबाला दीदी के शोध जमा होकर उनका साक्षात्कार भी हो चुका था और उनका विद्यापीठ में आना लगभग बंद हो गया था | शीनोदा भी विद्यापीठ छोड़ गया और उसने एस.पी.आई यानि ‘सरदार पटेल विश्वविद्यालय’ में अर्थशास्त्र में प्रवेश ले लिया था |

      हाँ, रेखा बहन को वहीं पर ‘आदिवासी विभाग’ में काम मिल गया था | इसलिए अनामिका की उनसे लगभग रोज़ाना थोड़ी-बहुत देर के लिए मुलाक़ात होती रहती| विशेषकर सुबह प्रार्थना-हॉल में कताई करते समय एक-दूसरे की आँखें चार हो जातीं और  कभी समय मिलने पर साथ में बैठकर कुछ खाने-पीने का कार्यक्रम बन जाता | लेकिन ये मुलाकातें इतनी ऊर्जावान न होतीं क्योंकि रेखा बहन अपने पति के जाने के सदमे से अभी तक बाहर नहीं निकल पाईं थीं और छोटे बच्चों का उत्तरदायित्व उनके कंधों पर पहाड़ सा रखा था | 

     वे अक्सर चाय पीते हुए अनामिका से  बातें करते हुए अपने सी.ए पति के बारे में बात करने लगतीं जो अनामिका न जाने कितनी बार सुन चुकी थी और उनकी आँखों से आँसू टप-टप टपककर उनकी खादी की साड़ी के हवाले होते रहते |अनामिका उन्हें ढाढ़स देती और उनके साथ उसकी आँखों में भी आँसू भर जाते |जैसे उन दोनों का यह कभी-कभी का मिलन बस आँसुओं का उदास मिलन बनकर रह जाता | पहले की भाँति दाँत फाड़ते हुए नहीं, आँखों में आँसू भरकर दोनों विदा लेते |   

“अनामिका बहन ये ज़िंदगी बहुत दुख आपे छे | कितने लाड़-प्यार में पाल रहे थे बच्चों के पप्पा इनको अब मम्मी-पापा के ऊपर छोड़ते हुए संकोच भी बहु थाय छे पण सू करिए ?  भाई-बेन पण केटलु करे छे ---”उनके बोलने में भी हिन्दी से गुजराती व स्वराष्ट्र  की भाषा मिली रहती थी |जब भी अनामिका के साथ बैठतीं रोने लगतीं और उनके पूरे मन के आकाश में जैसे आँसुओं के बादल बिखर-बिखर जाते | 

      वो अपने पति की अच्छाइयों का इतने विस्तार से और इतनी बार वर्णन करतीं कि उनकी आँखें बरसने लगतीं और अनामिका का मस्तिष्क सुन्न पड़ जाता | पहले मिलते थे तो हँसने, मुस्कुराने के लिए मिलते थे, खिलखिलाते थे | वैसे रेखा बहन को खिलखिलाने का सबसे कम समय मिला था।वह अधिकतर अपनी ही उलझनों में उलझी रहीं | अब कभी-कभी अनामिका और वो चाय पीने के लिए मिलते लेकिन  हर बार दुख सांझा हो जाते |अनामिका उन्हें हँसाने की कोशिश करती, उसका कोई न कोई चुटकुला छेड़ देना रेखा बहन को कुछ तो हल्का कर ही देता |शीनोदा भी कभी-कभी चाय पीने विद्यापीठ आ जाता लेकिन वो खिलखिलाहट वापिस नहीं आई जो सबके साथ मिलकर सबके चेहरों को रंग-बिरंगे फूलों का बगीचा बना देती थी | सब तरह की सुगंध वाले फूल खिला करते थे उन दिनों --लेकिन अब---?यही जीवन है !  

         दो वर्ष में सबके शोध व साक्षात्कार भी अपने-अपने समयानुसार पूरे हो चुके थे, आख़िर में अनामिका ही रह गई थी जिसका शोध-प्रबंध भी लगभग पूरा हो चुका था | अब टाइपिंग में चल रहा था | इसलिए वह भी विद्यापीठ कम ही आती थी | नियमानुसार उपस्थिति लगानी ज़रूरी थी अत: रविवार के अतिरिक्त सभी दिनों में उसे कताई और प्रार्थना के समय  पर विद्यापीठ तो जाना ही होता था|तभी रेखा बहन को लेकर वह प्रार्थना-सभा के हॉल के बाहर की सीढ़ियों पर चाय मंगवाती, कुछ दुख-सुख सांझा करते और अनामिका अपने शोध-प्रबंध की टाइपिंग का काम देखने चली जाती |वह टाइपिस्ट से दुखी हो गई थी, इतनी गलतियाँ ! और दुबारा ठीक करने के लिए देती तब भी वो ही गलतियाँ रिपीट मिलतीं | उसे बहुत सा काम अपने सामने बैठकर करवाना पड़ता !          

      शीनोदा भी अपनी योजनाओं में व्यस्त हो गया था किन्तु अक्सर घर आता रहता, खाना खाता और वे दोनों मिलकर कोई कार्यक्रम बना लेते |कभी होटल का, कभी बासुदी के घर का, कभी उसके घर ही सब मिलने आ जाते | उन दिनों मोबाइल्स नहीं होते थे लेकिन लैंड-लाइन अब तक लगभग सभी के पास आ गईं थीं |

    अनामिका की नानी के बीमार होने की ख़बर आते ही विवेक ने उन्हें देखने जाने का कार्यकर्म बना लिया | बच्चे कहने लगे कि वे रामी आँटी के साथ रह सकते हैं |गंगाराम भी सोसाइटी में चक्कर लगाता रहता था लेकिन विवेक का मन नहीं माना | अनामिका को भी लगा, उसके कंट्रोल में तो रहता नहीं उसका शैतान बेटा, रामी के बसका तो बिल्कुल भी नहीं था उसे सँभालना !उसकी अपनी सीमाएँ भी तो थीं |इतने बड़े तो थे नहीं कि उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता| दोनों पति-पत्नी सोच में ही थे कि शीनोदा ने बच्चों के पास रहने का प्रस्ताव रख दिया | 

      अब तक वह घर का सदस्य ही बन चुका था, एयरपोर्ट से ही फ़ोन कर देता कि आ रहा है, उसके लिए नाश्ता बनवा लेना |चटनी न होती तो बच्चों की सी मासूमियत से पूछता ;

“व्हेयर इज़ माय चतनी---?” गर्ज़ यह कि अनामिका को उसके लिए फ्रिज़ में चटनी रखनी ही पड़ती | 

“हद है, यह लड़का भी –”वह विवेक से कहती |

“इतनी तबीयत खराब हुई इसकी इस चटनी, आचार से लेकिन यह बंदा टस से मस नहीं हुआ अपने चटनी-आचार प्रेम से ! भाई ! प्रणाम है तुझे ---” वह उसके आगे अपने दोनों हाथ जोड़ देती | 

    विवेक को उस पर अपने छोटे भाइयों जैसा ही भरोसा हो गया था | बस! हो गया तय ! बच्चे बड़े खुश थे कि शीनोदा अंकल के साथ रहेंगे | कभी घर पर नूडल्स की दावत होगी तो कभी रेस्टौरेंट की तफ़री !

    शीनोदा ने उन दोनों से वादा लिया था कि वे  स्कूल से घर आकर अपना खाना-पीना ढंग से खाएँगे  और अपना ‘होम-वर्क’ गंभीरता से करेंगे|सब बहुत खुश थे कि अब तो शीनोदा अंकल से जापान के बारे में कहानियाँ सुनने को मिलेंगी |हुआ भी ऐसा ही ।रामी तो घर पर थी ही, उसके साथ वैसे भी खाने की कोई तकलीफ़ नहीं होती थी, ऊपर से रामी  का अमरीकी भाई यानि शीनोदा!वैसे भी रामी इस परिवार का हिस्सा बन चुकी थी सो कोई परेशानी तो होनी नहीं थी उल्टे शीनोदा अंकल के एक इशारे पर बच्चे काम करते थे | वह भी उनका काम पूरा हो जाने पर उन्हें रात में घुमाने, आइसक्रीम खिलाने ले जाता | 

     हाँ, घर पर ज़रूर चुस्ती से पूछताछ हुई | सबको बहुत आश्चर्य भी हुआ कि ऐसे किसी विदेशी के पास अपने ‘टीन-एज’के बच्चों को छोड़कर आना कहाँ तक ठीक था ?अनामिका को तो सब अभी भी नासमझ ही समझते जो सब पर आराम से विश्वास कर लेती थी | उसे सब पर आसानी से भरोसा हो जाता, अगर उसे कोई ख़राब बात लगे तो वह वहाँ से हट जाती थी बस ---लेकिन विवेक को तो बहुत होशियार समझा जाता था पूरे परिवार में ! आखिर वो कैसे छोड़ सके बच्चों  को ? उनसे भी पूछा तो गया ही, वो मुस्कुरा दिए और सबको आश्वासन दिया कि चिंता करने की कोई बात नहीं है, बच्चे सुरक्षित रहेंगे !

“इतना विश्वास ---!” बीमारी में भी नानी के मुख से टूटे-फूटे शब्दों का निकलना यानि उनका   अत्यधिक चिंतित होना !    

     अनामिका के सामने ही नानी अधिक बीमार हो गईं और तीन-चार दिनों में ही वे परलोक सिधार गईं | अब जल्दी वापिस जाना संभव नहीं था|शीनोदा से फ़ोन पर बात हुई, अब उसे बच्चों के पास और अधिक समय रुकना था | उसका काम भी खटाई में पड़ा था लेकिन रुकना था तो रुकना था |

    एक अलग ही अनुभव रहा यह जीवन का !एक दुखद व सुखद का मिश्रित अनुभव ! सारी शंकाओं को निर्मूल सिद्ध करता --- आज हम ऐसे ज़माने में से गुज़र रहे हैं कि हर क़दम पर  भयभीत रहते हैं, अपने स्वयं के संबधियों से अपने बच्चों को दूर रखते हैं |वहाँ एक ऐसा बंदा जिस पर भारतीय होने का ठप्पा भी नहीं था जो अनजाने देश, अनजाने वातावरण से आया था, जिसके बारे में कुछ विशेष जानकारी भी नहीं थी, उसका विश्वास मानवता का विश्वास था, ऐसा विश्वास था जो भीतर से डरा हुआ  तो था किन्तु कहीं न कहीं एक पक्की डोरी से बंधा हुआ था| विश्वास की यह डोरी इतनी मज़बूत रही कि सबको मानना पड़ा कि मनुष्य  की संवेदना, स्वस्थ विचारों, भावनाओं से ऊपर कोई चीज़ नहीं !