15 ---
जब तक अनु मयंक के साथ ड्राइवर के सामने से निकलकर चाय की लारी –(ठेले) पर पहुँची तब तक तिगड़ी पीछे के रास्ते से वहाँ पहुँचकर चाय का आर्डर दे चुकी थी | पास ही सैंडविच की लारी भी खड़ी रहती थी जिस पर ताज़े-ताज़े भिन्न भिन्न प्रकार के स्वादिष्ट सैंडविच बनते रहते | उनका भी ऑर्डर दिया जा चुका था | बस, प्रतीक्षा थी उन चीज़ों के तैयार होकर उनके सामने आने की | उन पर टूटना तो बनता ही था | सबको भूख लगी थी और टिफ़िन उनके कमरों में ही रखा था |वैसे, वो कहाँ बचकर जाने वाला था, वो सारे बदमाश बच्चे उसे भी चट करने वाले ही थे |
विद्यापीठ के बाहर तरह-तरह के ठेले खड़े रहते जिन पर चाट से लेकर चाय, कॉफ़ी, फलों की चाट, गरमा-गरम गुजराती और काठियावाड़ी चटपटे नाश्ते बनते रहते और सबके मुँह में पानी भरते रहते | वहीं कुछ बैंचें, कुछ मूढ़े पड़े रहते, सामने से सीधी सड़क निकलती और आने-जाने वालों से दुआ -सलाम, खा-खा, खी -खी होती रहती | बासुदी इन सबकी कहाँ आदी थीं?अनामिका को उन्हें देखकर हँसी का दौरा ही पड़ गया|कैसे एक चोर की भाँति शॉल में चेहरा लपेटे मूढ़े को लारी की ओर घुमाए बैठी थीं वे | वह तो अब इन छोटे भाइयों के साथ शैतानी करने की आदी हो चुकी थी, वैसे भी मूल स्वभाव से शैतान थी अनामिका ! बच्चों के साथ खूब उधम करती रहती घर पर !
"ऐ --तुम लोग मुजको मरवाना आज ----ठीक है न ---जे --मैं तुमको बोली आना --" मुस्कुराहट विराजमान थी उनके खूबसूरत चेहरे पर, कोई क्या ध्यान देता | किसी ने दिया भी नहीं, अनामिका ने भी नहीं जिसको टार्गेट करके बात कही गई थी | कैसे बच्चे बन जाते थे सब !
" लीजिए दी चाय पीजिए ---और ये आपका मनपसंद चीज़ सैंडविच ---" राजेन्द्र ने उनकी आगे पड़ी हुई तख़्ते वाली मेज़ पर दोनों चीज़ें सजा दीं |
"तुम लोक ----?"
"आ रहा है सबका दी, आप शुरू तो कीजिए ---लीजिए ये आ गया ---" चाय व सैंडविच लाकर लड़के ने लकड़ी की बेचारी सी हिचकोले खाती मेज़ पर टिका दिए थे |कभी –कभी डर भी लगता, किसी दिन ये मेज़ टुकड़ों में तब्दील हो जाएगी लेकिन जब कभी इस बात की शिकायत उसके मालिक से की जाती , अगले दिन मेज़ में कुछ और कीलों का इज़ाफ़ा हो जाता और मेज़ की थिरकन कुछ कम हो जाती लेकिन कुछ दिनों बाद फिर से उसका थिरकना शुरू हो जाता |आज बासुदी भी उसी थिरकती हुई मेज़ के सामने बैठी थीं |
अब सबके हाथों में काँच के छोटे-छोटे ग्लासों में चाय थी और दूसरे हाथ के सैंडविच भूखे पेट की ओर बढ़ रहे थे |
"ओहो---रेखा दीदी ---" मयंक खुशी से चीख़ा |
"आप लोग यहाँ, इस टाइम पर ---और बासुदी भी ----!" रेखा बहन अपने बच्चे के स्कूल से फ़ीस भरकर लौट रही थीं | सबको देखकर उनके चेहरे पर भी मुस्कान पसर गई |
" आप भी आइए, सच मानिए, आपको मिस कर रहे थे ---" बासु दी का शॉल से आधा घूँघट वाला सिर देखकर बहुत कम हँसने वाली रेखा बहन भी ज़ोर से हँस पड़ीं |
" सच में ---मज़ा आ गया ---जे --लाइफ़ में बेकार की अड़चनें कितना बोर करते हैं ---तुमको मालूम ?पर क्या करें--"बासुदी जब संवेदनशील होतीं, तब कुछ ऎसी ही भाषा बोलने लगती थीं |
"कोई बात नहीं दी, कभी-कभी चोरी में भी मज़ा आता है। है न ?" अनामिका ने कहा तो बासुदी और रेखा बहन दोनों मुस्कुरा उठीं | आना ने बासुदी के सिर पर लपेटे हुए शॉल को नीचे नहीं गिरने दिया था |
सर्र-- से चलती हुई एक कार आकर उस मंडली के पास रुकी और अनामिका का चेहरा अचानक सफ़ेद पड़ गया |
"हैलो अनामिका ! " गाड़ी में से एक पहचाना स्वर गूँजा |
"जी---जी---मि.बासु--- कैसे हैं आप ? " आना बौखला उठी और बासु दी का मुख में जाता हाथ जहाँ था, वहीं रुक गया | सब अपने स्थान पर खड़े हो गए थे | मि. बासु विद्यापीठ आते-जाते रहते थे अत: सब उन्हें पहचानते थे |अनामिका व विवेक का तो उनके घर भी आना-जाना हो गया था, वो लोग भी चले आते |
" हम तो अच्छा है ---आपको क्या हो गया ?आप ठीक ?"आना के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ी हुई थीं | ‘आज तो गए ---बेकार ही लाए बासुदी को ---‘उसने मन में सोचा |
"जी --जी, बिलकुल ---"
"और मि.गौड बॉम्बे हैं या यहाँ पर ---?"
"जी, अभी बॉम्बे हैं ---"
"रेखा जी, आप भी मज़े में ?" मि. बासु किसी के बारे में भी पूछना न भूलते |
"हाँ जी, सब ठीक है ----" संकोची रेखा बहन ने धीमे से उत्तर दिया |
" अनामिका ! आपकी दीदी कहाँ हैं ?ऑफ़िस में फ़ोन किया, पता चला वहाँ नहीं हैं ---"उन दिनों मोबाइल जैसे खिलौने तो होते नहीं थे |
"जी, वो आज लायब्रेरी में रेफ़्रेंस के लिए मैटर ढूँढ रही थीं, शायद वहीं हों ----वो ड्राइवर खड़ा है वहीं पर --" मयंक ने बीच में कूदकर सफ़ाई पेश करने की जल्दी मचाई | कहते हैं न चोर की दाढ़ी में तिनका ! सारे ही तो चोर थे लेकिन मि.बासु का चोर तो वहीं बैठा था शॉल में मुखड़ा छिपाए ----|
" ओ.के --- मैं चलता हूँ ---दीदी को बोलना मैं जाता हूँ, आज मिनिस्टर साहब से मीटिंग है, देर हो जाएगी | वैसे फ़ोन करेगा ---" उन्होंने कहा और अपने ड्राइवर को चलने का इशारा दिया |मि. बासु हिंदी और गुजराती अपनी पत्नी से अधिक अच्छी व शुद्ध बोलते थे | उनके शब्दों में बाँगला का उच्चारण काफ़ी कम था |
हाश ! उनकी गाड़ी के जाने के बाद सबकी रुकी हुई साँसें एक लंबी सी 'ओह !----' के साथ फिर से मुक्त हो बहने लगीं |
"देखा --हम तुमको बोला न ----तुम लोक नहीं जानता ----जे --" बासुदी के मुख में जाता हुआ सैंडविच कब नीचे टेबल पर रखी प्लेट में उनके हाथ से छूटकर गिर पड़ा था, उन्हें ही पता नहीं चला | हाँ, हाथ कुछ ऎसी दिशा में उठा हुआ था जैसे कौर मुख में रखने वाली हों –“कुछ हुआ ?क्यों बेकार में अपने मन के बच्चे को डाँटकर भीतर बैठा रही हैं ?----"अशोक ने ज़ोर से ठहाका लगाया जिसमें सभी जुड़ गए |
"अरे बाबा ! मैं तो कितना घबरा गई --जे --तुमको नहीं मालूम ?" बासुदी का चेहरा देखने लायक था |
'जे'उनका तकिया क़लाम था, बड़ी प्यारी लगती थीं जब वो अपने पूरे मूड में बोलती थीं|
" हाँ, वो सब ठीक है, जे--बासु साहब यमदूत तो हैं नहीं, सच ए स्वीट परसन ---!”राजेन्द्र ने उन्हें चिढ़ाने की कोशिश की फिर बोला ;
“अब इस विषय पर कोई चर्चा नहीं, बाद में करेंगे ---अब टूट पड़ो सब ---" राजेंद्र ने कई दिनों के भूखे की तरह सैंडविच का बड़ा सा टुकड़ा अपने मुख में रख लिया |
एक ठहाके के साथ सबने अपने भूखे पेट को पुचकारा और उसमें खाना भरने लगे ----
"अरे!बासुदी आपकी सैंडविच प्लेट में है ----" उनका उठा हुआ ख़ाली हाथ देखकर मयंक ने ज़ोर से कहा और बासुदी ने झेंपकर अपनी प्लेट में से सैंडविच उठाया और मुस्कुराकर उसे मुख के हवाले किया |
"दीदी ! मेरा फ़ाइनल ईयर है, आप सब जानते हैं ---और मुझे स्वराष्ट्र विश्वविद्यालय से नौकरी की ऑफ़र भी आ चुकी है | उनके पास दर्शन शास्त्र की सीट ख़ाली है | मैं तो अब बहुत कम दिन रहने वाला हूँ आप सबके साथ ---तो --मेरे लिए इतना तो करो कि कुछ मधुर स्मृतियों की अल्बम अपने साथ ले जा सकूँ -----" राजेंद्र सैंडविच खाते-खाते सबको इमोशनल करने के मूड में आ गया था |
"तो, यहाँ कौन ज़िंदगी भर जमा रहने वाला है ? भाईयों -बहनों जी लो, जी भरके ----" अशोक ने भी अपना मुखारविंद खोला और एक बार फिर सब उस विलक्षण क्षण में खोने लगे जो सबको अभिभूत कर रहा था ---ये हॉस्टल में रहने वाले लड़के बहनों का सब खाना हज़म कर जाते, डिमांड करते हर रोज़ नए-नए व्यंजनों की और सब बनाकर ले भी आते | फिर इस बात पर खूब ठहाके भी लगते | इसमें भी कोई संशय नहीं था कि वे सब अपनी इन दीदियों का खूब ध्यान रखते व सम्मान करते |