प्रेम न हाट बिकाय - भाग 14 DrPranava Bharti द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्रेम न हाट बिकाय - भाग 14

14--

    

        भारती के जाने से कुछ दिन तक तो आना को अकेलापन  महसूस हुआ, लगा वह एकाकी  पड़ गई है किन्तु ऐसा न था | अब शोध की  कुछ ऐसी महिला विद्यार्थियों से उसका संपर्क हुआ जो उसके विषय की तो नहीं थीं किन्तु उनके मानसिक स्तर व रुचियाँ  उससे मिलती थीं| 

    एक आई.एस ऑफ़िसर की बेहद खूबसूरत पत्नी  रत्ना बासु व समाज सेवा से जुड़ी समाजशास्त्र में पी.एच.डी करने वाली कुंजबाला बहन दीदी बन गईं , रेखा बहन व और भी दो-चार महिलाएँ  उसे अपनी उम्र की भी मिलीं |सबकी अपनी-अपनी  सीमाएँ थीं | बासु दी और रेखा बहन के साथ कितनी घुलमिल गई थी वह ! सभी विभागों के युवा इनके  साथ मिल-बैठकर वहाँ के सोते हुए वातावरण को सजीव करने लगे थे | ये सब दीदियाँ घर से बना खाना लातीं और चट कर जाते सब युवा शैतान भाई ! अच्छा लगता था | अनामिका को अनुज की स्मृति हो आती जिससे मिलना अब कम ही हो गया था |  

       बासु दीदी एक सीनियर आई.ए .एस ऑफ़िसर की पत्नी थीं जिनको यह भय लगा रहता कि यदि वे अपने मित्रों के साथ ठेले पर चाय पीएंगी तो कोई न कोई उन्हें पहचान ही लेगा जो मि.बासु को पसंद न आता | बात भी उन दिनों की है जब आई.ए .एस कुछ कम ही होते थे पर उनका वज़न कुछ अधिक ही होता था सो, बासु दी बड़ी सँभलकर रहतीं | समय पर उनका ड्राइवर उन्हें छोड़ने आजाता और अपने समय से वे वापिस भी चली जातीं | यानि इस उम्र में बचपना जीने का उनको अवसर ही नहीं मिल पाता था | 

     रेखा बहन अपनी ही परेशानियों में घिरी रहतीं, उनके पति का कुछ माह पूर्व ही देहांत हुआ था, तीन बच्चों की माँ रेखा बहन को पीएच. डी के साथ अपने बच्चों के लालन-पालन के लिए ट्यूशंस करने होते | बच्चे छोटे थे, उनका खाना-पीना तैयार करके आतीं वे और जल्दी से जल्दी अपने बच्चों के पास घर वापिस जाने की कोशिश करतीं जिन्हें वे अपनी उम्रदराज़ माँ के पास छोड़कर आती थीं इसीलिए उन्होंने अपनी माँ के घर के पास एक छोटा सा किराए का घर ले लिया था | स्वाभिमानी रेखा बहन बेशक कठिनाई से अपने बच्चों का लालन-पालन करतीं किन्तु भाई-बहनों पर अपने परिवार का भार नहीं डालतीं थीं| माँ के पास बच्चों को छोड़कर आना उनकी मज़बूरी थी |    

       कुंजबाला दीदी अपना काम पूरा करके अपने समाज-सेवा के संस्थान में जातीं, जहाँ वे काउंसलर थीं|उनके लिए वहाँ केस प्रतीक्षा करते रहते, उन मानसिक विषमताओं में कुछ केसेज़ की  स्टडी करके वह उन पर मनोवैज्ञानिक शोध कर रही थीं | 

     कैसा होता है न जीवन ! सबका अलग-अलग !सबके कर्म अलग-अलग ! सबका लेन-देन अलग-अलग ! ज़िंदगी अपने में ही डूबी हुई ! सब अपने-अपने मार्गों पर चलते हुए अपने-अपने गंतव्य पर पहुँचने का उपक्रम करते ! कभी पछाड़ खाता, कभी आसानी से गंतव्य पर पहुँचता जीवन का यह चक्कर चलता रहता है | 

      अपने आस-पास देखती तो जीवन की कितनी भिन्न परिभाषाएँ बना लेती | सच तो यह था कि बच्चों के छोटे रहते भी वह सबसे ज़्यादा फ़्री थी | घर भी पास ही था |चौदह साल साथ रहकर अम्मा जी यानि सास गुज़र गईं थीं |  पति के मुंबई ट्रांसफ़र के कारण बच्चों के स्कूल जाने के बाद वह और अधिक फ़्री रहती, पति को मुंबई में फ़्लैट मिल गया था लेकिन वो आज मुंबई में हैं तो कल कहीं बाहर टूर पर| अत: बच्चों को लेकर शिफ़्ट करने का कोई औचित्य न था | छुट्टियों में विवेक परिवार के पास आ ही जाते | 

अनामिका अपने सरल, सहज  स्वभाव के कारण सबमें खूब लोकप्रिय हो गई थी | 

 " एक दिन बासुदी  को भी ठेले पर चाय पिलाने ले चलेंगे ----क्या कहते हो बच्चों --? उसने  युवाओं की तिगड़ी के सामने प्रस्ताव रखा | 

" एक दिन क्या दीदी --आज ही क्यों नहीं ? "मयंक चहककर बोल उठा| 

“जल्दी का काम शैतान का काम --!” आना ने कहा | 

“अरे ! क्या दीदी, एक दिन तो शुरुआत करनी ही है तो क्यों न शुभस्य शीघ्रं –” अशोक ने भी उसका साथ दिया | 

       बासु दीदी का ड्राइवर जो उन्हें समय से छोड़ने आता और समय पर उन्हें वापिस ले जाने पहुँच जाता था, जमा ही तो रहता अंगद की तरह !कोई उसकी मेम साहब के आए बिना उसे वहाँ से उखाड़ नहीं सकता था | वह ज़रूर अड़ंगा डालता, उसे पता चल जाता तो ! उसकी मेम साब इस तरह से आम ठेले-थूले पे चा पीएँ, यह उसकी बर्दाश्त से बाहर की बात थी |  

" ओह ! नो--नो आई काँट----" बासुदी ने भी बौखलाकर कहा | 

      चुप्पी भरी हुई बँगाली दीदी रत्ना बासु को सब बासुदी कहकर पुकारने लगे थे |आना तो किसी गूंगे को भी बुलवाकर  छोड़ सकती थी |  यह हो ही नहीं सकता था कि उसके सामने कोई मौन धारण करके बैठा रहे | उसने बासु दीदी को भी बातूनी बनाकर ही दम लिया | 

"क्यों --नो--नो--दी---? अरे ! आपने ठेले की चा नी पी तो करा का ---?" राजेंद्र  ने उनको चिढ़ाने की कोशिश की | 

"अरे बाबा! तुम लोग समझता क्यों नहीं ---वो जे तुमारा लैंग्वेज में 'जमदूत ' बोलता न वो अमको कहाँ जाने देता है ? " यानि उनका मन भी था, वो सबके  साथ मस्ती करें , करने भी लगीं थीं किन्तु कैम्पस के अंदर ही बस ---वो भी सबसे छिपकर ! उसके आगे उनकी लक्ष्मण-रेखा बड़ी प्रगाढ़ थी, गंभीर मुखौटा ओढ़े एक बड़े अफ़सर की पत्नी !  

"ठीक है ---" अशोक ने चुटकी बजाई और अनामिका  को पुकारा | 

"आनादी, आप जाइए न मयंक के साथ ज़रा बासुदी के अंगद के पास और कहिए, अपने पाँव गाड़ी में जमाकर ही रखे | मेमसाहब का ज़रूरी काम चल रहा है | बस, वो थोड़ी देर में आ जाएंगी --और उसके सामने से निकलकर पहुंचिए ठेले पर, देखना भाई हिलेगा भी नहीं---"ये सब शरारती भी अनामिका को शॉर्ट-कट के यानि उसके घर के नाम से आना दी पुकारने लगे थे |   

 "पर ----" 

      मयंक की 'पर' हवा में अठखेलियाँ करती रह गई| अशोक व राजेंद्र ने बासुदी के लिए लायब्रेरी के पीछे से जाने का रास्ता तय किया | उसी तरफ़ से वे उन्हें सिर पर शॉल ओढ़ाकर बाहर निकालने वाले थे|अब ड्राइवर का तो कुछ ड़र था नहीं, वो अंगद तो जब तक उसकी मैडम आ न जाएं तब तक सिंहद्वार पर गाड़ी में जमा अपनी सीट से हिलने वाला था नहीं, उसके सामने से ही तो अनामिका और मयंक बातें करते निकले थे |उस भौंदू ड्राइवर का बस इतना ही काम था कि वह वही करे जो उसे कहा गया हो |अपना दिमाग तो चलता ही नहीं था सो सब रिलेक्स्ड थे |