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आज इस गर्ल्स हॉस्टल के प्राँगण में खड़ी अनामिका को मोटे मास्टर जी याद आए और उसके चेहरे की मुस्कान गहरा गई |
वह सोच में पड़ गई, बहुत कठिन था बच्चों को घर में सुबह ताले में बंद छोड़कर आना | समय भी कम था, उसे निर्णय लेना था और विवेक भी शहर में नहीं थे | उसे पूर्णिमा भाभी की याद आ गई, वो होतीं तो ---
शीघ्र निर्णय न लेने से उस वर्ष प्रवेश न मिलता और उसका वह वर्ष खराब हो जाता, वैसे ही उसने जीवन के कितने बहुमूल्य वर्ष व्यर्थ ही कर दिए थे | उसने कठोर होकर निश्चय कर ही लिया कि चँदा बहन के सुझाए मार्ग पर चलना ही उसके लिए बेहतर था|किसी न किसी तरह एक वर्ष निकल ही जाएगा |
थोड़ी मुश्किल होने वाली थी ज़िंदगी लेकिन वह ख़ुश थी और अपने बालपन की सारी कोताही पूरी कर देना चाहती थी |
किसी प्रकार एक वर्ष में अनामिका ने एम.फ़िल पूरी करके एक लंबी साँस ली लेकिन उसे इस बात का अफ़सोस बहुत हुआ कि उसके वर्ष पूरा होने के बाद हॉस्टल में रहने का नियम ख़त्म हो गया था |उस वर्ष प्रिंसिपल साहब की बेटी ने जो एम.फ़िल में दाख़िला लिया था | अनामिका का मन इस अन्याय से बहुत दुखी हुआ | माना, केवल उसके लिए ही यह नियम नहीं बना था किन्तु टूटा तो प्रिंसिपल की बेटी के लिए था न ! बहुत से प्रश्न उसके ज़ेहन में उठते किन्तु वह चुप बनी रही, उसे अपना लक्ष्य पूरा करना था |
यह चुप्पी ही हमें कायर बना देती है, यह आदत में बदलकर हमें चुप्पी ओढ़ना सिखा देती है जिससे कई बार हम वहाँ भी अपनी आदत के अनुसार कुछ नहीं बोल पाते जहाँ वास्तव में बोलने की ज़रूरत होती है | मनुष्य स्वार्थवश न जाने कितनी चुप्पियाँ ओढ़ता-बिछाता रहता है |
अब अनामिका को लगा कि पीएच।डी में प्रवेश के लिए उसे यू.जी.सी की परीक्षा में बैठना चाहिए जिससे उसे छात्रवृत्ति प्राप्त हो सके | वह कमर कसकर तैयारी में जुट पड़ी और उसने जिस दिन उसे क्लीयर कर लिया, उस दिन उसे संतुष्टि मिली |उसके अध्यापकों व माता-पिता को अब उस पर गर्व करने का समय आया था|पूर्णिमा भाभी व उनके पति उपेन्द्र भाई साहब से संबंध बना रहा लेकिन मिलना न के बराबर हो गया था |उसकी शिक्षा के बारे में जानकर भाई साहब बड़े प्रफुल्लित होते और जब भी फ़ोन पर बात होती अक्सर विवेक से कहते ---“बहुत गर्व होता है अनामिका पर ---!”बीच में कभी-कभार परिवार सहित मिलने भी आ जाते थे |
अब तक राजेंद्र के साथ विद्यापीठ के विभिन्न विषयों के कई छात्र जिनमें विशेष रूप से अशोक और मयंक थे, खूब अच्छे मित्र बन गए थे |बाँगड़ू से पीछा छुट गया था | वह तीसरी बार परीक्षा में बैठने पर भी पास नहीं हो सका था और निराश होकर अपने गाँव लौट गया था |
हाँ, भारती को सेकेण्ड क्लास मिली थी और उसने कोशिश करके एम. फ़िल में प्रवेश ले लिया था |
अब सबसे ख़ासी मित्रता हो गई थी अनामिका की | भारती वैसे तो साथ ही रहती किन्तु वहीं हॉस्टल में रहने वाले सामाजिक शास्त्र में एम.फ़िल करने वाले प्रकाश दूबे से उसकी मुहब्बत परवान चढ़ने लगी थी | दोनों के चेहरे पर क़ुदरत ने अपना कहर ढाया था | भारती के चेहरे पर कुछ उभरे हुए फोले से थे तो दूबे के चेहरे पर चेचक के प्रकोप के बहुत बड़े व गहरे चिन्ह थे | कहते हैं, जोड़ियाँ सबकी ऊपर से बनती हैं |ये तो पता नहीं लेकिन उनका हिसाब-किताब फ़िट हो गया था अन्यथा पहली बार दोनों के चेहरे देखकर कुछ अजीब सी घबराहट होती थी !उन दोनों का अधिक समय अब साथ ही गुज़रता | एक कन्नड़ ब्राह्मण थी तो दूसरा बनारस के ब्राह्मण परिवार से !
भारती अब तक अनामिका के घर भी काफ़ी आने-जाने लगी थी, वह विवेक से भी बहुत खुल गई थी |विवेक को जीजाजी कहकर वह घर में अपना प्रभाव जमाती जा रही थी| एक दिन विवेक अपने बैड-रूम में लेटे हुए थे, भारती बेधड़क कमरे में घुस गई और ड्रेसिंग-टेबल से नेलपॉलिश उठाकर विवेक के पैर के नाख़ून पेंट करने लगी | कई बार वह बिना नॉक किए कमरे में चली जाती थी और विवेक असहज हो जाते थे |विवेक का स्वभाव इतना बेतकल्लुफ़ भी नहीं था कि वो इन सब बातों को इतनी सहजता से ले सकते | इस बात से वो बहुत नाराज़ हो गए थे |
"अरे ! मैं तो आपको जीजा मानती हूँ, तो ज़रा सी चुहल करने के मूड में आ गई थी --"विवेक के टोकने पर वह आँखों में आँसू भरकर बोली थी | विवेक बेचारे अजीब से हो आए थे|
"ज़रूरी तो नहीं है कि दूसरा भी तुम्हारे जैसे मूड में हो ---"उन्होंने थोड़े कड़े शब्दों कहा था |
उस दिन भारती चुपचाप हॉस्टल वापिस लौट गई थी लेकिन कमाल यह था कि उसे कुछ ख़ास फ़र्क ही नहीं पड़ा था | उसने अब दूबे को साथ लेकर अनामिका के घर में अपना 'मिलन-स्थल' बना लिया था|वह अक्सर ऐसे समय में आती जब अनामिका व विवेक घर में न होते|बच्चे बेचारे कुछ बोल न पाते और वो दोनों वहाँ रामी से बनवा-खाकर अपना टाइम-पास करते|जैसे आना के घर को धर्मशाला ही समझ लिया गया था | यह बात विवेक को बिलकुल पसंद नहीं आई | किशोरावस्था के बच्चों पर इस सबका प्रभाव क्या व कैसा होगा, उनकी चिंता का विषय था |
अनामिका ने भारती को समझाने की चेष्टा की जिससे भारती का मुँह फूल गया किन्तु विवेक की सोच सही थी | वैसे भी वह परिवार था, कोई किसीका मिलन-स्थल नहीं ! अब भारती अनामिका के साथ तो रहती लेकिन दोनों के बीच एक दूरी आने लगी थी !
वह तो कुछ दिनों में वहाँ से चली ही जाने वाली थी| फिर कौन किसको याद रखता है?
लेकिन अभी कुछ कर्ज़ चुकाना बाकी था |दूबे को पेट की परेशानी हुई और उसे सिविल अस्पताल में भरती करना पड़ा | उस समय विद्यापीठ के सभी मित्रों ने उन दोनों की भरसक सहायता की | अशोक रात को अस्पताल में उसके पास सोता, सुबह भारती के पहुँचने पर वह अपनी दीदी के घर जाता, जहाँ वह रहता था और वहाँ से विद्यापीठ आता फिर शाम को दीदी के घर से खिचड़ी बनवाकर अस्पताल ले जाता |समय मिलने पर विवेक व अनामिका भी चले जाते, कभी खाना भेज देते |अपनी-अपनी सुविधानुसार सभी उन दोनों की भरसक सहायता करते | इस प्रकार लगभग पंद्रह–बीस दिन काफ़ी कठिनाई में निकले|ज़िंदगी को नॉर्मल होने में ख़ासा समय लगा |
एक वर्ष में एम. फ़िल करके भारती और दूबे ने बिना किसीसे कहे विद्यापीठ को 'बाय' कर दिया | बाद में किसी सूत्र से पता चला, दोनों परिणय-सूत्र में बँध गए थे |