लाल दाग़ - 5 - (अंतिम भाग) ARTI MEENA द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

लाल दाग़ - 5 - (अंतिम भाग)

सुबह हुई और रोज़ की तरह माया स्कूल गई — जैसे वह हर दिन जाती थी।
लेकिन आज उसके मन में एक अलग सोच थी।
उसे लग रहा था कि अब सच में कुछ बदलाव लाना होगा।
बच्चे पढ़ने आए।
माया ने रोज़ की तरह सभी की क्लास ली।
तभी उसने ध्यान दिया कि सुधा आज स्कूल नहीं आई थी।
माया ने उसकी सहेलियों से पूछा।
उन्होंने धीरे से बताया,
“मैडम… इस समय कोई स्कूल नहीं आता।”
माया यह सुनकर कुछ पल के लिए चुप रह गई।
उसने मन ही मन सोचा —
“अभी भी इतना सब हो रहा है…”
फिर उसने बाकी लड़कियों से पूछा,
“क्या तुम सब भी ऐसे ही छुट्टी कर लेती हो इस समय?”
सभी लड़कियों ने धीरे से हाँ में सिर हिला दिया।
तभी एक लड़की ने हिम्मत करके धीमी आवाज़ में कहा,
“मैडम… अगर हम छुट्टी नहीं करेंगे तो हमारे कपड़े गंदे हो जाते हैं…
और हम हर बार उस शर्म से नहीं गुजरना चाहते।”
कक्षा में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
माया को महसूस हुआ —
यह सिर्फ छुट्टी नहीं… यह मजबूरी है।
और इस मजबूरी को बदलना ही होगा।तीन–चार दिन बाद सुधा फिर से स्कूल आने लगी।
अब उसे सब कुछ रोज़ जैसा लगने लगा था —
क्योंकि गाँव की लगभग हर लड़की के साथ यह होता था।
धीरे-धीरे यह उसके लिए सामान्य बनता जा रहा था।
लेकिन माया — जो शहर में पली-बढ़ी थी —
उसके लिए यह सब पहली बार था।
इतना सब देखने के बाद उसके मन में एक बात बार-बार उठ रही थी —
अगर कोई पढ़ा-लिखा और समझदार इंसान भी आँखें बंद कर ले,
तो फिर उसकी शिक्षा का क्या मतलब?
हमारे आस-पास —
चाहे हमारे घर में हमारी पत्नी हो, बेटी हो, बहन हो या माँ —
अगर वे इन परिस्थितियों से गुजर रही हों,
और हम जानते हुए भी अनदेखा कर दें,
तो हम शिक्षित होकर भी उन लाखों अनपढ़ लोगों के समान हैं
जिन्हें कभी इसके बारे में बताया ही नहीं गया।
माया को लग रहा था —
सिर्फ पढ़ाई ही शिक्षा नहीं होती,
सही समय पर सही बात समझना और साथ खड़ा होना ही असली शिक्षा है।हम खुलकर क्यों नहीं कह पाते —
“हाँ, आज मेरा पीरियड शुरू हुआ है… मुझे पैड का पैकेट ला दीजिए।”
क्योंकि समाज ने इसे बहुत बड़ा बना दिया है —
जबकि यह एक बिल्कुल सामान्य प्रक्रिया है,
जो हर लड़की के साथ होती है।
जब से इस धरती पर औरत का जन्म हुआ है,
तब से यह होता आ रहा है।
फिर भी इसे अशुद्ध क्यों माना जाता है?
हम अक्सर अपने आप की तुलना विकसित देशों से करते हैं —
वहाँ के रहन-सहन से, वहाँ की बोलने की आज़ादी से।
तो फिर एक लड़की अपने ही घर में खुलकर यह बात क्यों नहीं कह पाती?
शायद शहर बदल रहे हैं।
शायद शहरों के 70–80% लोगों की सोच इस बारे में बदल चुकी है।
लेकिन गाँवों तक यह बदलाव पहुँचने में अभी भी समय लगेगा।
आज सरकार स्कूलों में पैड बाँटने की योजनाएँ चला रही है,
पंचायत स्तर पर भी महिलाओं तक पैड पहुँचाने की कोशिश हो रही है।
लेकिन कई बार बजट पास हो जाता है —
फिर भी पैड हर घर तक नहीं पहुँच पाते।
शायद कमी सिर्फ सुविधाओं की नहीं है —
शायद सोच बदलने की ज़रूरत सबसे ज़्यादा है।
क्योंकि जब तक लोग इसे सामान्य बात नहीं मानेंगे,
तब तक असली बदलाव अधूरा ही रहेगा।आज भी सच यह है कि जानकारी की कमी सबसे बड़ी समस्या है।
UNICEF जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के कई हिस्सों में लड़कियाँ पीरियड के कारण स्कूल मिस करती हैं। कुछ जगहों पर हर 10 में से 1 लड़की पीरियड के दौरान स्कूल नहीं जा पाती, और कई बार वह महीने में 4–5 दिन तक पढ़ाई से दूर रह जाती है। 
UNICEF
अगर अपने देश की बात करें, तो हालात पूरी तरह खराब भी नहीं हैं, लेकिन पूरी तरह अच्छे भी नहीं हैं। भारत में शहरों में लगभग 89% महिलाओं को सुरक्षित पीरियड प्रोडक्ट मिल जाते हैं, लेकिन गाँवों में यह संख्या लगभग 72% के आसपास है — यानी अभी भी बड़ा अंतर मौजूद है। 
Factchecker
सोचने वाली बात यह है कि जब यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, तो फिर आज भी इतनी लड़कियाँ डर, शर्म और जानकारी की कमी के कारण खुद को अकेला क्यों महसूस करती हैं।क्या कभी कोई गाँवों में जाकर उन महिलाओं… उन दादियों को बताएगा,
कि जिस चीज़ को लेकर वे अपनी पूरी ज़िंदगी शर्मिंदगी महसूस करती रहीं —
वह तो एक बिल्कुल सामान्य प्रक्रिया थी?
उन्हें कौन समझाएगा कि
जिसे समाज ने बहुत बड़ा बनाकर, डर और पाप जैसा बताकर पेश किया,
वह दरअसल जीवन का एक स्वाभाविक हिस्सा था।
शायद अगर उन्हें सही समय पर सही जानकारी मिली होती,
तो उनकी ज़िंदगी इतनी मुश्किल नहीं होती।
शायद वे डर, अलगाव और चुप्पी के साथ नहीं जीतीं।
यह सोचकर मन दुखी हो जाता है —
कि कई ज़िंदगियाँ सिर्फ इसलिए मुश्किल बन गईं,
क्योंकि सच को कभी सामान्य तरीके से बताया ही नहीं गया।मैं इस उपन्यास में बहुत कुछ लिख सकती हूँ।
लेकिन शायद शब्द कम पड़ जाएँगे…
क्योंकि कहानियाँ खत्म नहीं होंगी —
हर घर, हर गाँव, हर पीढ़ी में ऐसी अनगिनत कहानियाँ छुपी हैं।
अब बारी आपकी है —
कि आप यह समझ पाएँ।
जहाँ तक पुरुष इस उपन्यास को पढ़ें,
कम से कम अपनी माँ, पत्नी, बेटी या बहन के लिए इतनी सहजता और भरोसा ज़रूर रखें
कि वे बिना डर, बिना शर्म आपसे यह कह सकें —
“एक पैड का पैकेट ला दीजिए।”
क्योंकि बदलाव हमेशा बड़े भाषणों से नहीं आता —
कभी-कभी बदलाव घर के अंदर, छोटी-सी समझ से शुरू होता है।शायद बदलाव एक दिन में नहीं आएगा।
शायद अभी भी कई घरों में चुप्पी रहेगी…
कई लड़कियाँ डरेंगी…
कई महिलाएँ बिना बोले सब सहती रहेंगी।
लेकिन हर बदलाव की शुरुआत कहीं न कहीं से होती है।
अगर आज एक माँ अपनी बेटी को सच बता दे,
अगर एक भाई बिना झिझक मेडिकल स्टोर से पैड ले आए,
अगर एक पिता अपनी बेटी को यह महसूस करा दे कि यह शर्म नहीं — सामान्य बात है,
तो शायद आने वाली पीढ़ी थोड़ा कम डरेगी।
लाल दाग़…
शर्म का नहीं,
कमज़ोरी का नहीं,
बल्कि जीवन, बदलाव और स्त्री शक्ति का प्रतीक है।
जिस दिन समाज इसे छुपाने की चीज़ नहीं,
समझने की चीज़ मान लेगा —
उस दिन सच में बदलाव आएगा।
और शायद उस दिन —
कोई लड़की पहली बार डरकर नहीं रोएगी,
बल्कि समझकर मुस्कुराएगी।
कहानी यहाँ खत्म नहीं होती —
क्योंकि बदलाव की कहानी कभी खत्म नहीं होती।
वह हर घर में, हर पीढ़ी में,
नई शुरुआत के साथ चलती रहती है।एंड