मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 14 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 14

खामोश गाँव का आखिरी मुसाफिर
समीर एक फ्रीलांस फोटोग्राफर था, जिसे दुनिया के नक्शे से मिट चुके या भुला दिए गए स्थानों की तस्वीरें खींचने का शौक था। इसी शौक के चलते वह हिमालय की तलहटी में बसे एक गुमनाम गाँव 'रुद्रपुर' पहुँचा। इस गाँव के बारे में कहा जाता था कि यहाँ सूरज ढलने के बाद परिंदे भी अपनी आवाज बंद कर लेते हैं।
गाँव के लोग बाहरी दुनिया से कटे हुए थे और उनकी आँखों में एक अजीब सा खौफ हमेशा तैरता रहता था। समीर ने गाँव के बाहरी हिस्से में स्थित एक पुरानी सराय में रुकने का फैसला किया। सराय का मालिक, एक बूढ़ा आदमी जिसके चेहरे पर झुर्रियों का जाल था, उसने समीर को चाबी देते हुए सिर्फ एक बात कही:
"बेटा, रात को कमरे की कुंडी मत खोलना, चाहे तुम्हें अपनी माँ की आवाज ही क्यों न सुनाई दे।"
समीर ने इसे पहाड़ी अंधविश्वास समझकर हँसकर टाल दिया।
रात का सन्नाटा और रहस्यमयी गूँज
रात के करीब 10 बजे होंगे। समीर अपने कमरे में बैठा अपनी तस्वीरों को एडिट कर रहा था। बाहर बर्फबारी शुरू हो चुकी थी और हवा की सांय-सांय खिड़की के कांच से टकराकर एक डरावना संगीत पैदा कर रही थी।
अचानक, सराय के गलियारे में उसे भारी कदमों की आवाज सुनाई दी। 'धप... धप... धप...'। आवाज उसके कमरे के ठीक सामने आकर रुक गई। समीर ने अपनी सांसें रोक लीं। उसे लगा शायद कोई मुसाफिर आया होगा, लेकिन सराय में उसके अलावा और कोई मेहमान नहीं था।
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। बहुत ही धीमी और सलीके से दी गई दस्तक। समीर ने कुछ नहीं कहा। फिर एक आवाज आई, "समीर... दरवाजा खोलो, बहुत ठंड है बाहर।"
समीर के रोंगटे खड़े हो गए। वह आवाज बिल्कुल उसकी छोटी बहन रिया की थी, जिसकी मौत तीन साल पहले एक हादसे में हो चुकी थी। समीर का हाथ दरवाजे की कुंडी तक पहुँच ही गया था, तभी उसे बूढ़े मालिक की बात याद आई। उसने खुद को संभाला और कान बंद कर लिए।
कैमरे की नजर से सच
घबराया हुआ समीर अपने बिस्तर पर दुबक गया। उसे लगा कि शायद उसे मतिभ्रम (hallucination) हो रहा है। उसने अपना कैमरा उठाया और खिड़की के बाहर की कुछ तस्वीरें लेने की सोची ताकि उसका मन भटक सके।
उसने 'नाइट मोड' चालू किया और सराय के आँगन की तरफ लेंस घुमाया। कैमरे की स्क्रीन पर जो दिखा, उसने समीर का खून सुखा दिया।
आँगन में कोई एक इंसान नहीं, बल्कि दर्जनों लोग खड़े थे। वे सब सफेद कफ़न जैसे कपड़ों में थे और उन सबकी गर्दनें एक ही तरफ मुड़ी हुई थीं—ऊपर, सीधे समीर की खिड़की की तरफ। कैमरे के डिजिटल व्यूफाइंडर में उनकी आँखें सफेद चमक रही थीं, जबकि नग्न आँखों से देखने पर बाहर सिर्फ अंधेरा और बर्फ थी।
समीर ने कैमरा नीचे गिरा दिया। वह समझ गया था कि यह गाँव इंसानों का नहीं, बल्कि उन रूहों का ठिकाना है जो कभी यहाँ से जा ही नहीं पाईं।
मंदिर का गुप्त रास्ता
अब समीर का मकसद सिर्फ अपनी जान बचाना था। उसे याद आया कि सराय के पीछे एक पुराना शिव मंदिर था। उसे लगा कि शायद मंदिर की पवित्रता उसे बचा सके। वह पिछले दरवाजे से निकला और अंधेरे में मंदिर की ओर भागा।
रास्ते में उसे महसूस हुआ कि झाड़ियों के पीछे से कोई उसे देख रहा है। पैरों के नीचे सूखी टहनियों के टूटने की आवाजें उसका पीछा कर रही थीं। जैसे ही वह मंदिर की सीढ़ियों पर पहुँचा, एक ठंडी, बर्फीली फुसफुसाहट उसके कान के पास गूँजी:
"यहाँ से कोई वापस नहीं जाता, समीर।"
उसने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ वही बूढ़ा सराय मालिक खड़ा था, लेकिन अब उसका चेहरा बदल चुका था। उसकी त्वचा गलकर लटक रही थी और उसकी जगह काली परछाइयाँ ले रही थीं।
मंदिर के भीतर का सच
समीर मंदिर के गर्भगृह में घुस गया और भारी दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। वहाँ एक पुरानी पांडुलिपि पड़ी थी। उसने अपनी टॉर्च की रोशनी में उसे पढ़ा। उसमें लिखा था कि रुद्रपुर के लोग एक प्राचीन श्राप के शिकार थे। सौ साल पहले एक महामारी में पूरा गाँव खत्म हो गया था, लेकिन उनकी आत्माएँ इस घाटी की भौगोलिक स्थिति के कारण यहीं फंस गईं। वे हर अमावस को एक 'नया शरीर' ढूंढते हैं ताकि उनकी रूह को ठिकाना मिल सके।
उस रात अमावस थी।
तभी मंदिर का दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा। बाहर से सैकड़ों आवाजें एक साथ चिल्लाने लगीं। वे सब समीर का नाम पुकार रहे थे। अचानक, मंदिर की छत से खून की बूंदें टपकने लगीं। समीर ने ऊपर देखा, वहाँ कोई नहीं था, लेकिन छत की दरारों से काली धुंध नीचे उतर रही थी।
सुबह की पहली किरण
समीर ने पूरी रात भगवान की प्रतिमा के पीछे छिपकर, कांपते हुए और मंत्र पढ़ते हुए बिताई। वह काली धुंध उसे छूने की कोशिश करती, लेकिन प्रतिमा के पास आते ही पीछे हट जाती।
जैसे ही सुबह की पहली किरण पहाड़ की चोटी पर पड़ी, बाहर का शोर एकदम शांत हो गया। समीर हिम्मत जुटाकर बाहर निकला। सराय गायब थी, गाँव के घर खंडहर में तब्दील हो चुके थे। वहाँ न कोई बूढ़ा मालिक था, न कोई रौनक।
वह पागलों की तरह दौड़ते हुए मुख्य सड़क तक पहुँचा, जहाँ से उसने बस पकड़ी।
उपसंहार: अधूरा साया
शहर पहुँचने के बाद समीर ने उस रात की तस्वीरें डेवलप कीं। लेकिन वे सारी तस्वीरें काली थीं। सिर्फ एक तस्वीर साफ आई थी—वह तस्वीर जो उसने मंदिर के अंदर अपनी 'सेल्फी' ली थी।
उस फोटो में समीर अकेला नहीं था। उसके पीछे, अंधेरे कोने में, एक धुंधली सी आकृति साफ देखी जा सकती थी, जिसका हाथ समीर के कंधे पर रखा हुआ था। वह हाथ बिल्कुल वैसा ही था जैसा उस सराय के मालिक का था—झुर्रियों वाला और बेजान।