बड़े दिल वाला - भाग - 10 Ratna Pandey द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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बड़े दिल वाला - भाग - 10

अभी तक आपने पढ़ा कि अनन्या और वीर रात भर मोबाइल पर अपने मिलन के सपने बुनते रहे, लेकिन सुबह अनुराग अचानक उसके मायके पहुँच गया। उसने सास-ससुर के सामने प्यार से अनन्या को घर वापस बुलाया और हनीमून की बातें कीं। इससे अनन्या की सारी योजनाएँ बिगड़ गईं और उसके पिता योगेश को उसकी नीयत पर संदेह होने लगा। अब इसके आगे -

अनुराग के बिना बताए इस तरह अचानक आ जाने से अनन्या के तन-बदन में सांप लोट रहे थे। वह आग बबूला हो रही थी पर कर तो कुछ भी नहीं सकती थी।

तभी कड़क स्वर में आवाज़ आकर उसके कानों से टकराई, "मैं तुम्हारी चालबाजी को अच्छी तरह समझता हूँ अनु। तुम वीर के पास जाने का सपना मत देखो। अनुराग तुम्हारा पति है और एक बहुत अच्छा इंसान भी। शाम तक तैयारी कर लो और चुपचाप अपने घर जाओ, समझीं। अगली बार ऐसा सब करने का सोचना भी मत।"

अनु भले ही अपने पापा की लाड़ली हो पर उनसे डरती भी बहुत थी। उसने चुपचाप अपने कपड़े जो अब तक पूरे निकाले भी नहीं थे, वापस बैग में डाल दिए। शाम होते ही अनुराग आ गया और अनन्या को उसके साथ ससुराल वापस लौटना पड़ा। रास्ते में वह गुस्से में बैठी हुई कार से बाहर की तरफ़ देख रही थी।

तब अनुराग ने पूछा, "क्या हुआ अनु, नाराज हो क्या?"

उसने कोई जवाब नहीं दिया।

अनुराग ने कहा, "अनु, यह मत सोचना कि मैं मेरे स्वार्थ के लिए तुम्हें वापस लेने आ गया। मैं चाहता था कि पापा-मम्मी के जाते समय तुम भी घर पर रहो। रहा सवाल हमारा, तो जब तक तुम ख़ुद पहल नहीं करोगी, मैं आगे नहीं बढ़ूंगा, यह मेरा वचन है।"

अनन्या ने अनुराग की यह बातें सुनीं तो उसे नमना ही पड़ा।

उसने कहा, "नहीं-नहीं, मैं गुस्सा बिल्कुल नहीं हूँ। बस दो-चार दिन मम्मी-पापा के साथ रहना चाहती थी।"

अनुराग ने कहा, "कोई बात नहीं अनु, मम्मी-पापा के वापस आने के बाद फिर से आ जाना। अभी तो मम्मी तुम्हें जाने नहीं देगी। वह कहेंगी, 'अरे बेटा, अनुराग के लिए खाना कौन बनाएगा? प्लीज बेटा, अब आ ही गई हो तो हमारे आने के बाद चली जाना।'"

अनन्या ने कहा, "ठीक है, मैं बाद में फिर कभी चली जाऊंगी।"

कुछ ही देर में वे घर पहुँच गए। शाम को अनुराग की मम्मी की किटी पार्टी थी। उस पार्टी में अनन्या ने भी खुश होकर हिस्सा लिया। फिर सुबह अनुराग के पापा-मम्मी घूमने हिल स्टेशन के लिए रवाना होने लगे। 

जाते समय उन्होंने बिल्कुल वही सब कहा जो अनुराग ने पहले से अनन्या को बता दिया था।

उन्होंने कहा, "अनन्या बेटा, अब आ ही गई हो तो हमारे वापस आने के बाद मायके चली जाना। ताकि अनुराग को खाने-पीने की दिक्कत न हो।"

अनन्या ने कहा, "जी मम्मी जी, आप बेफिक्र होकर जाइए, मैं सब संभाल लूंगी।"

अनुराग के माता-पिता घूमने चले गए और अनुराग कुछ समय बाद अपने ऑफिस जाने के लिए तैयार होने लगा।

उसने जाते-जाते अनन्या से कहा, "अनु, कुछ भी ज़रूरत पड़े या कुछ भी लाना हो तो मुझे फ़ोन कर लेना।"

अनन्या ने कहा, "ठीक है।"

अनुराग ने कहा, "अच्छा, तो मैं निकलता हूँ।"

उसे उम्मीद थी कि अनन्या दरवाजे तक उसे छोड़ने ज़रूर आएगी, परंतु ऐसा हुआ नहीं। निराश होकर अनुराग अपने ऑफिस के लिए निकल गया। आज तो अनुराग के मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे।

"क्या अनु की शादी जबरदस्ती उसकी मर्जी के खिलाफ कर दी गई है? उसका व्यवहार तो कुछ ऐसा ही दिख रहा है। क्या उसे अनन्या से बात करना चाहिए? नहीं-नहीं, धर्म पत्नी है वह तेरी, तू ऐसा प्रश्न उससे कैसे पूछ सकता है? अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए हैं हमने। उसके हर दुख में, हर हाल में, वह उसके साथ रहेगा और उसे हर ख़ुशी देने की कोशिश करेगा," यही सब सोचते हुए उसका ऑफिस आ गया।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः