त्रिशा... - 20 vrinda द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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त्रिशा... - 20

"अरे वाह!!!! तुम्हारे जन्मदिन की तैयारी तुम्हारे शादी के पहले‌ फंक्शन में काम आ गई।।।" महक ने हंसते हुए त्रिशा के कान में धीरे से कहा। 

त्रिशा ने कोई जवाब ना दिया बस हल्का सा मुसका दी। "चलो बेटा।।।" कल्पना ने त्रिशा को आगे बढ़ने का इशारा करते हुए कहा। 

अपने मां के बताए अनुसार आगे स्टेज की ओर बढ़ गई। उसकी मामी ने लकड़ी का पटरा सा आगे करके कहा," इस  पर बैठ जाओ।" 

त्रिशा वहां बैठ गई और उसके बाद राजन की मम्मी, नानी और मामी(यानी मेरी बुआ) और भी कुछ औरतें उसके आस पास आकर खड़ी हो गई। और पहले त्रिशा को शगुन की लाल ओढ़नी उड़ा कर उन लोगों ने रस्म की शुरुआत की। त्रिशा को अपनी साड़ी का पल्लू आगे करके बैठा दिया गया और एक एक करके वो सभी औरते उसे शगुन का सामान देते गए। 

त्रिशा ने यह सब पहली बार देखा था इसलिए  चहरे पर मुस्कान लिए  जैसा उसे बताया जा रहा था वो बस वैसे वैसे कर रही थी। जहां एक ओर वर पक्ष की महिलाएं इस रस्म को कर रही थी वहीं त्रिशा के पापा ने भी राजन को तिलक कर उसके हाथ में शगुन का नारियल और चांदी का सिक्का रख कर इस रिश्ते को पक्का कर दिया। जब सब कुछ हो गया और सारी रस्में पूरी हो गई तो सभी के लिए खाने का इंतजाम किया गया। 

आज घर पर वैसे ही शाम की दावत की तैयारी के लिए कल्पेश ने हलवाईयों को काम पर लगा रखा था और उन्हीं लोगों से बोल कर उन्होनें फटाफट मेहमानों के लिए खाना बनवाया और फिर बाकी लोगों कि मदद से बीस लोगों के लिए दो टेबलों और कुर्सियों का इंतजाम कर दिया गया। 

खाने के समय जहां एक टेबल पर कुछ अन्य लोग थे वहीं दूसरी टेबल पर राजन, उसकी मां, उसकी नानी और उसके मामा-मामी यानी त्रिशा के बुआ फूफा बैठे थे और उन्हीं के साथ बैठी थी त्रिशा और महक। उस गोल टेबल के चारों तरफ सभी लोग इ, तरह से बैठे थे कि राजन और त्रिशा एक दूसरे के साथ वाली कुर्सियों पर ही थे। 

कुछ समय बाद खाना आया और टेबल पर सजाया गया। सभी लोगों ने खाना शुरु किया। सभी खाते खाते बातों में लगे थे बस त्रिशा और राजन ही चुपचाप बैठे थे। जब कोई उनसे कुछ कहता तो राजन तो फिर भी जवाब देता लेकिन त्रिशा तो बस मुसका के गर्दन हिला देती। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे और कैसे रिएक्ट करें। उसे क्या कहना चाहिए, किससे क्या बोलना चाहिए कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे और ऊपर से सिर पर रखा पल्ला उसे परेशान करे जा रहा था बार बार नीचे सरक के। 

जितनी बार भी त्रिशा का पल्लू सिर से नीचे होता उसे अपनी मां की बात याद आ जाती कि चाहे जो भी हो पल्लू सिर से नीचे नहीं होना चाहिए और इसी कारण वह फिर बार बार उसे ऊपर करने लगती। उसे यूं परेशान होता देखकर राजन की मां मालती ने कहा," अरे बेटा तुम क्यों परेशान हो रही हो। रहने दो उसे नीचे ही रहने दो। तुम खाना खाओ आराम से।।।" 

"जी।।।" त्रिशा ने जवाब दिया और मन ही मन राहत की सांस भी ली कि चलो कम से कम एक परेशानी तो खत्म हुई। "पता नहीं मोनिका भाभी कैसे पूरे दिन इस पल्लू की संभालती है और घूंघट करके रहती है‌।"  मन ही मन त्रिशा ने कहा। 

खैर अब त्रिशा ने चैन से खाना शुरु किया। वह खाना खाने में व्यस्त थी कि तभी उसने महसूस किया कि कोई उसे एकटक देख रहा है त्रिशा ने उस दिशा ने देखा तो पाया कि राजन ही उसकी ओर एकटक देखे जा रहा है‌। 

राजन को अपनी ओर यूं निहारते देख त्रिशा को कुछ समझ ना आया और वह खाना बंद करके एकदम सीधे होकर बैठ गई। उसे यूं एकदम सतर्क और सावधान मुद्रा में बैठ देख राजन अपनी हंसी रोक ना पाया। और उसके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। 

उसे यूं हंसता देख त्रिशा और भी असमंजस में पड़ गई। एक तो पहले ही वो समझ नहीं पा रही थी कि राजन उसे क्यों देख रहा था और अब उसकी हंसी का कारण, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

"तुम्हारी झुमकियां तुम पर बहुत जच रही है। काफी सुंदर लग रही है यह तुम पर।"   राजन ने धीमी आवाज में कहा और फिर फोन पर किसी से बात करता हुआ उठ कर खड़ा हो गया। वह अपनी मां की ओर मुड़ा और बोला," मां एक जरुरी फोन है मैं आया।" इतना कहकर वह उस जगह से  दूर चला गया‌। 

त्रिशा जो अभी कुछ समय पहले तक राजन के व्यवहार का कारण सोच रही थी, राजन के मुंह से अपनी तारीफ सुनकर स्तब्ध हो गई  क्योंकि उसे उम्मीद ना थी राजन ऐसा कुछ कहेगा। त्रिशा कुछ समय तक यूं ही बैठी रही और फिर राजन की बात याद करके वह भी मुस्काने लगी। इस समय उसके चेहरा लाज से भर गया और वह शर्माती हुई मंद मंद मुस्कान लिए चुप चाप मुंह नीचे को झुकाए खाना खाने लगी।