अधुरी खिताब - 56 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अधुरी खिताब - 56

⭐ एपिसोड 57 — "सच का चीरता तूफ़ान"

कहानी — अधूरी किताब 

हवेली की दीवारों पर रात अब पहले से भी ज्यादा भारी हो चुकी थी। निहारिका उस कमरे के ठीक बाहर खड़ी थी जहाँ अभिराज को बंद किया गया था—उसकी साँसें तेज़ थीं, जैसे किसी अनदेखे डर ने उसे भीतर से झकड़ लिया हो।

पर आज… आज वह केवल डर नहीं थी।
आज उसके भीतर कोई और ही तूफ़ान जाग रहा था।

अंदर से अभिराज की थपथपाहट की आवाज़ आई—

“निहारिका… दरवाज़ा मत खोलना। जो भी हो… पीछे मत देखना।”

पर निहारिका ने दरवाज़े पर हाथ रख दिया।

“अगर मैं तुम्हें छोड़ दूँ तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी।”

उसने कुंडी खोली।
दरवाज़ा कर्र की आवाज़ के साथ खुला।

और जैसे ही खुला—
एक ठंडी हवा का झोंका कमरे से बाहर निकला, जैसे किसी ने बरसों तक कैद की हुई सांसें आज़ाद कर दी हों।

अभिराज दीवार से बँधा था, उसके हाथों की रस्सियाँ कसकर खून खींच रही थीं। मगर उसकी आँखें—
वो आँखें मानो किसी और ही दुनिया का गहरापन समेटे थीं।

निहारिका उसकी ओर दौड़ी।

“तुम ठीक हो? किसने—”

अभिराज ने उससे पहले ही फुसफुसाकर कहा—

“पीछे… मत देखना।”

लेकिन इंसान वही देखता है जिसे देखने से रोका जाए।
निहारिका धीरे-धीरे मुड़ी।

और उसने जो देखा…
उससे उसकी आँखे जम गईं।

दीवार पर वही पुरानी अधूरी किताब का चिन्ह उभर आया था—
रात की अँधियारी में चमकता हुआ,
जैसे कोई अदृश्य हाथ उसे खून से लिख रहा हो।

“ये… फिर से?”

निहारिका पीछे हटी, उसकी आवाज़ काँप रही थी।

अभिराज ने रस्सियों को जोर से खींचा, कुछ रेशे टूटे भी, पर वह आज़ाद नहीं हुआ।

“निहारिका, सुनो! यह चिह्न तभी दिखाई देता है जब हवेली में कोई सच सामने आने वाला हो।”

वह डरते हुए पूछती है—

“कौन-सा सच?”

अभिराज ने उसकी आँखों में गहराई से देखा—

“वो… जो तुम्हें कभी पता नहीं चलना चाहिए था।”


---

🌑 दूसरी ओर — हवेली के नीचे वाले तहखाने में

सिया और आर्यन पुराने रिकॉर्ड्स ढूँढ रहे थे।
एक धूल से भरी डायरी सिया के हाथ लगी।
उसने पहला पन्ना खोला—

“हवेली की वारिस—निहारिका सिंह… जन्म रहस्य।”

सिया की साँसें रुक गईं।

“आर्यन… इसका मतलब क्या है? निहारिका का जन्म रहस्य? but her family never mentioned anything…”

आर्यन ने डायरी उसके हाथों से ले ली, उसकी आँखों में चिंता तैर गई।

“मतलब हवेली में कई बातें ऐसे ही नहीं हो रहीं। किसी का सच छुपाया गया है—और वो निहारिका से जुड़ा है।”

सिया ने डायरी के पन्नों को तेजी से पलटा।

एक पन्ने पर किसी ने दो लाइनें बड़े, डरावने अक्षरों में लिखी थीं—

“जब वारिस सच से टकराएगा,
किताब फिर खुल जाएगी।”

सिया ठिठक गई।

“वारिस? क्या निहारिका ही इस हवेली की असली वारिस है?”

आर्यन तुरंत बोला—

“और अगर ऐसा है…
तो वह खतरे में है।”

वह एक सेकंड भी गँवाए बिना ऊपर की ओर भागा, सिया उसके पीछे।


---

🌪 फिर— हवेली का मुख्य कमरा

निहारिका दीवार पर बने खून जैसे लाल निशान को छूने ही वाली थी कि अभिराज चिल्ला उठा—

“नहीं!! उसे मत छूना!”

लेकिन देर हो चुकी थी।

जैसे ही उंगलियों ने निशान को छुआ—
पूरा कमरा हिल गया।
दीवारें थरथरा उठीं।
दीपक बुझ गए।
ठंडी हवाएँ शोर मचाने लगीं।

और दीवार पर एक और लाइन उभर आई—

“जिस सच्चाई से तुम भाग रही हो—
वही तुम्हें लौटकर मिलेगी।”

निहारिका पीछे हट गई।

“अभिराज… ये सब क्या है?” उसकी आँखें भींगने लगीं।

अभिराज ने एक लंबी साँस ली।

“सच… तुम्हारे परिवार ने छुपाया था।
और अब यह किताब—तुम्हें उस सच तक ले जा रही है।”

निहारिका की आवाज़ फूट गई—

“मुझे बताओ! आखिर मैं कौन हूँ?”

अभिराज चुप रहा।
उस चुप्पी में इतने जवाब थे… कि निहारिका का दिल काँप उठा।

तभी दरवाज़ा जोर से खुला।
आर्यन और सिया तेज़ी से अंदर आए।

“निहारिका!” – सिया ने चिल्लाकर कहा।

आर्यन ने अभिराज के हाथ खोलने शुरू किए।

निहारिका अभी भी काँप रही थी।
“तुम लोग… जानते थे? कुछ छुपा रहे थे मुझसे?”

सिया ने सिर हिलाया।
“हमें अभी-अभी पता चला। तुमसे कुछ नहीं छुपाते… पर ये डायरी देखो।”

उसने डायरी निहारिका के हाथ में दी।

पहला शब्द—

“जन्म रहस्य”

निहारिका का पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

“इसका मतलब… मैं…?”

आर्यन ने धीरे से कहा—

“तुम इस हवेली की असली वारिस हो।”

निहारिका की सांस अटक गई।

पर असली झटका अभी बाकी था।

अभिराज ने नजरें झुका लीं।

सिया बोली—

“और एक और बात…”

निहारिका ने काँपती आवाज़ में पूछा—

“क्या?”

आर्यन ने धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा—

“तुम्हारे जन्म के वक्त… तुम्हें किसी और से बदल दिया गया था।”

निहारिका का दिल बैठ गया।

उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे।

“मतलब… मैं जिस परिवार की बेटी हूँ… वो मेरा परिवार… है ही नहीं?”

कमरे में खामोशी भर गई।
इतनी भारी… कि हर किसी का दिल चीर दे।

अभिराज धीमे से उसके पास आया।

“निहारिका… जो भी हो… तुम अकेली नहीं हो।”

पर निहारिका पीछे हट गई।

उसकी आँखों में तूफ़ान था।

उसकी आवाज़ टूटी हुई, मगर सख़्त—

“अगर मेरी पहचान झूठ है… तो मेरा हर रिश्ता भी झूठ है।”

सबके चेहरे गिर गए।

अभिराज ने हाथ बढ़ाया—

“मेरे साथ ऐसा कभी मत कहना…”

निहारिका आँसू पोंछते हुए बोली—

“अभी मुझे किसी के साथ नहीं…
सिर्फ अपने सच के साथ रहना है।”

वह दरवाज़े की ओर बढ़ी।

सिया ने आवाज लगाई—

“निहारिका, रुको—”

पर वह रुकने वाली नहीं थी।

वह हवेली के अँधेरे गलियारे में अकेली चली गई…

और उसी पल अधूरी किताब का पन्ना अपने-आप पलटा।

अगला शब्द उभर आया—

“वारिस के जागने से— खून का हिसाब शुरू होगा।”

कमरे में सभी की सांसें ठहर गईं।

कहानी अब एक नए मोड़ पर जा चुकी थी…

अब शुरुआत होगी—
सच, खून और पुराने पापों की।