अधुरी खिताब - 46 kajal jha द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अधुरी खिताब - 46



---


🌌 एपिसोड 45 — “जब कलम ने वक़्त को लिखना शुरू किया”


(सीरीज़: अधूरी किताब)



---


1. समय की परत — जब हवा रुक गई


दिल्ली की रात हमेशा की तरह थी,

पर उस रात हवा में एक ठहराव था —

ऐसा जैसे घड़ी की सुइयाँ चुपचाप किसी अनदेखी दीवार से टकरा गई हों।


नेहा अपनी खिड़की पर बैठी थी।

टेबल पर “रूह की कलम” चमक रही थी,

और उसके चारों ओर नीली लहरें ऐसे घूम रही थीं

जैसे वो किसी नए अध्याय का द्वार खोल रही हों।


अचानक, कमरे की घड़ी रुक गई।

टिक-टिक का आख़िरी टिक कमरे में गूँजता रह गया।


नेहा ने काँपती आवाज़ में पूछा —

“आज… तू क्या लिखने वाली है?”


कलम ने खुद उठकर हवा में लकीरें बनाईं।

नीली स्याही ने शब्दों का रूप लिया —


> “आज वक़्त अपने पन्ने खोलेगा।”




नेहा ने फुसफुसाया —

“वक़्त भी लिख सकता है?”


कलम ने जवाब दिया —


> “अगर रूहें लिख सकती हैं, तो वक़्त क्यों नहीं?”




और उसी पल, कमरे की दीवारें धुंधली होने लगीं।

फर्श जैसे पिघलने लगा।

सब कुछ घुलकर एक नीली सुरंग में बदल गया —

जहाँ न अतीत था, न वर्तमान, न भविष्य।

बस एक अनंत समय-लहर।



---


2. समय का दरवाज़ा — नेहा का पहला कदम


नेहा खुद को एक बड़े गोल हॉल में पाई।

हॉल की छत से नीली रोशनी बरस रही थी।

चारों तरफ़ घड़ियाँ थीं —

कुछ चल रही थीं,

कुछ टूटी थीं,

कुछ हवा में तैर रही थीं।


और बीच में, एक विशाल किताब खुली पड़ी थी।

उसके पन्ने खुद पलट रहे थे।


पहला पन्ना चमका —

और लिखा आया —


> “यहाँ वो सब लिखा है जो कभी होना था…

और वो भी जो नहीं होना था।”




नेहा ने किताब के पन्नों को छूने की कोशिश की,

पर उसके हाथ पन्ने से आर-पार हो गए।


कलम हवा में तैरती हुई उसके पास आई और बोली —


> “ये सिर्फ़ समय के लिए दिखने वाली किताब है…

इंसान सिर्फ़ उन पन्नों को छू सकता है

जिन पर उसकी रूह का हक हो।”




नेहा ने पूछा —

“और मेरे हिस्से का पन्ना कौन-सा है?”


कलम ने किताब का एक पन्ना पलटा।

उस पर नेहा की धुंधली तस्वीर उभरने लगी —

लेकिन तस्वीर अधूरी थी।

चेहरा गायब था,

जैसे वक़्त अभी उसे लिखने वाला हो।


नेहा सिहर गई —

“मेरी तस्वीर पूरी क्यों नहीं?”


कलम की आवाज़ गंभीर हुई —


> “क्योंकि तेरा भविष्य अभी लिखा नहीं गया…

वो आज लिखा जाएगा।”





---


3. आरव की परछाईं — समय की रेत में


नेहा जैसे ही आगे बढ़ी,

हॉल की नीली रोशनी घनी हो गई।

सामने समय के धुएँ में एक आकृति बनी —

धीरे-धीरे स्पष्ट होती हुई।


वो आरव था।


वही आरव जो किताब की दुकान से

नीली धुंध में गायब हुआ था।


लेकिन अब उसकी आँखें पूरी तरह नीली थीं —

जैसे स्याही उसके भीतर खून बनकर बह रही हो।


नेहा ने अविश्वास में फुसफुसाया —

“आरव…?”


आरव मुस्कुराया।

उसकी आवाज़ दूर से आती प्रतिध्वनि जैसी थी —


“नेहा… वक़्त ने हमें चुना है।

हम दोनों अब कहानी नहीं लिख रहे…

हम कहानी जी रहे हैं।”


नेहा ने उसकी ओर कदम बढ़ाया —

“क्या तू जीवित है… या—”


आरव ने आँखें झुका लीं।

“मैं वक़्त में अटका हुआ हूँ…

न पूरी तरह जीवित,

न पूरी तरह रूह।”


उसने नेहा के हाथ को छूना चाहा,

पर उसकी उँगलियाँ भी धुएँ में बदलकर बिखर गईं।


नेहा के भीतर दर्द की एक लकीर दौड़ गई।

“मैं तुझे वापस लाऊँगी।”


आरव मुस्कुराया —

“तू नहीं… वक़्त तय करेगा।”



---


4. वक़्त का अध्याय — जो लिखा नहीं जाना चाहिए था


विशाल किताब का एक नया पन्ना खुला।

इस बार उस पर कुछ लिखा नहीं था —

बस एक नीली चमक थी।


अचानक शब्द उभरने लगे —


> “Chapter 0 — वो जो अभी हुआ ही नहीं है।”




नेहा घबरा गई।

“ये… भविष्य का अध्याय है?”


कलम ने कहा —


> “हाँ।

और यही सबसे ख़तरनाक है।

भविष्य लिखा नहीं जाना चाहिए…

पर आज वक़्त ने खुद अपने पन्ने खोल दिए हैं।”




अगला वाक्य उभरा —


> “नेहा शर्मा — 12 दिसंबर, रात 2:11 — गायब हो जाएगी।”




नेहा का दिल जोर से धड़कने लगा।

“ये… झूठ है। मैं कहीं नहीं जा रही।”


आरव चुप रहा।

उसने नज़रें फेर लीं —

मानो वो पहले से जानता हो।


नेहा चिल्लाई —

“ये पन्ना बदलना होगा!”


कलम धीरे से बोली —


> “भविष्य बदला जा सकता है…

पर उसकी कीमत बहुत भारी होती है।”





---


5. समय की कीमत — एक सौदा


अचानक कमरे में भारी वायु उठी।

घड़ियाँ एक साथ चिल्लाने लगीं।

नीला हॉल काला होने लगा।


समय की मूर्ति जैसी एक आकृति उभरी —

जिसका चेहरा धुँधला था,

आँखें रेत जैसी झर रही थीं।


उसने गहरी आवाज़ में कहा —


“जिसने भविष्य को देखने की कोशिश की,

उसे भविष्य को बदलने की अनुमति भी चाहिए।”


नेहा काँप गई —

“मैं अनुमति माँगती हूँ… ताकि मैं गायब न होऊँ।”


आकृति ने कहा —


> “कीमत है —

तू अपनी कहानी का एक हिस्सा मुझे दे दे।”




नेहा चौंकी —

“मतलब?”


> “तेरी एक स्मृति…

जो तू कभी वापस नहीं पाएगी।”




नेहा ने पलकें झपकाईं।

“कौन-सी स्मृति?”


समय की आकृति ने कहा —


> “ये तू नहीं चुनेगी।

मैं चुनूँगा।”




नेहा का मन डोल गया।

“और अगर मैं इनकार कर दूँ?”


आकृति ने किताब का पन्ना पलटा —

जहाँ लिखा था —


> “12 दिसंबर — नेहा गायब।”




वक़्त ने कहा —

“तो ये शब्द सच हो जाएँगे।”


नेहा ने गहरी साँस ली।

उसने महसूस किया —

उसके पास कोई और रास्ता नहीं था।


“ठीक है… मैं सौदा स्वीकार करती हूँ।”



---


6. जो स्मृति छीन ली गई


समय की आकृति आगे बढ़ी।

उसने नेहा के माथे पर हाथ रखा।


एक पल में नेहा चीख उठी।

उसकी आँखों के सामने नीली चिंगारियाँ फूटीं।

दिमाग में घूमते दृश्य कटने लगे —

जैसे कोई फिल्म को खुरच रहा हो।


कुछ पल बाद सब शांत हो गया।


आकृति बोली —


> “एक स्मृति मैंने ले ली।

कौन-सी — ये तू कभी नहीं जान पाएगी।”




नेहा घुटनों पर गिर गई।

उसका दिल भारी था —

जैसे कोई बहुत अपना उससे छीन लिया गया हो,

पर वो याद ही नहीं कर पा रही थी कि क्या।


आरव उसके पास दौड़ा।

“नेहा! तू ठीक है?”


नेहा की आँखों में खालीपन था।

“कुछ… खो गया है मेरे भीतर…

पर पता नहीं क्या।”


आरव ने उसकी उँगलियाँ थामीं (इस बार उसका स्पर्श ठोस था)।

“यही समय की कीमत है, नेहा।”



---


7. भविष्य का पन्ना — फिर बदल गया


किताब का वही पन्ना फिर चमका।

नेहा ने काँपते हाथों से देखा —


जहाँ पहले लिखा था:


> “12 दिसंबर — नेहा गायब।”




अब शब्द बदलकर लिखे थे:


> “12 दिसंबर — नेहा समय की किताब में प्रवेश करेगी।”




नेहा हाँफ गई।

“मतलब… मैं जियूँगी?”


कलम ने कहा —


> “हाँ।

लेकिन अब तू सिर्फ़ अपनी दुनिया की नहीं रही…

अब तू समय की कहानी का हिस्सा भी बन चुकी है।”




आरव ने उसकी ओर देखते हुए कहा —

“अब हम दोनों… इसी कहानी में बंध चुके हैं।”


नेहा ने उसकी आँखों में देखा —

इस बार पहला स्पर्श वास्तविक था।

उँगलियाँ नहीं टूटीं।

धुआँ नहीं उठा।


वक़्त ने दोनों को स्वीकार कर लिया था।



---


8. अंतिम दृश्य — समय की कलम


वक़्त की आकृति धीरे-धीरे हवा में घुल गई।

घड़ियाँ रुक गईं।

हॉल की नीली रोशनी बुझने लगी।


कलम किताब के ऊपर आकर रुक गई और बोली —


> “अब कहानी सिर्फ़ आत्माओं की नहीं…

अब ये वक़्त की किताब है।”




नेहा ने पूछा —

“क्या हम वापस अपनी दुनिया में जा पाएँगे?”


कलम ने कहा —


> “हाँ…

पर हर बार जब तू लिखेगी,

एक पन्ना वक़्त खुद लेगा।”




नेहा ने गहरी साँस ली।

“और आरव?”


आरव मुस्कुराया —

“मैं भी तेरे साथ चलूँगा।

क्योंकि अब मेरा भविष्य भी तेरे शब्दों से जुड़ा है।”


नीली रोशनी दो धाराओं में बंटी —

नेहा और आरव को ढँकते हुए।


दुनिया घूमी…

समय की हवा हिली…

और दोनों एक झटके में

अपनी-अपनी ज़िंदगी में लौट आए।


पर अब…


नेहा की मेज़ पर

रखी “रूह की कलम”

अपनी मर्जी से पन्ना पलट रही थी।


और पन्ने पर पहला वाक्य उभरा —


> “अब मैं वक़्त को लिखूँगी…

क्योंकि कलम रूह नहीं — वक़्त बन चुकी है।”





---


🌙 एपिसोड 45 समाप्त


✨ अगला एपिसोड 46 — “वक़्त की कलम और अधूरी रूह”

जहाँ नेहा को पता चलेगा कि

वक़्त ने जो स्मृति उससे छीनी है…

वो उसके संसार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी थी—


और वो कड़ी अब किसी और कहानी में

रूह बनकर घूम रही है।