समीक्षा : जनता स्टोर लेखक नवीन चौधरी Vishwas Panday द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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समीक्षा : जनता स्टोर लेखक नवीन चौधरी

समीक्षा :  जनता स्टोर लेखक नवीन चौधरी 

लेखक नवीन चौधरी जी का उपन्यास जनता स्टोर में भारतीय छात्र राजनीति में होने वाले सभी राजनीतिक दांव पेचों को बखूबी इतनी बारीकियों से बताता है के लगता नही के आप कोई उपन्यास पढ़के रहे इसकी पढ़ प्रतीत होता है जैसे आप किसी सत्य घटना पर आधारित रिपोर्ट को पढ़ रहे , नवीन चौधरी जी का लेखन बहुत उम्दा है ये आप को कहानी में ऐसा बांध देता है के आप ना चाहते हुए भी आप इसको पढ़ना रोक नहीं पाते ...

इस उपन्यास में दोस्ती, प्रेम, धोखा, राजनीतिक दाँव-पेंच का बखूबी सुंदर वर्णन कहानी को बहुत ही रोमांचक बनाता है। बड़े स्तर की राजनेताओं द्वारा छात्र नेताओं का दुरुपयोग, छात्रों के अपने जातिगत अहंकारों की लड़ाई, प्रेम त्रिकोण, छात्र-चुनाव, साज़‍िशें, हत्याएँ, बलात्कार जैसे इन सभी घटनाएं उपन्यास में है और उसे इतने प्रामाणिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है  ....

छात्र राजनीति में होने वाले आंदोलनों के तरीके और जोश को बखूबी पेश किया है और छात्रों के साथ होने वाली राजनीति को बहुत अच्छे तौर पर दिखाया गया उसके साथ इस उपन्यास के किरदारों को मानो आपके सामने जीवित कर दिया है .... चाहे वो उपन्यास के नायक मयूर भारद्वाज हो या खलनायक के तौर पर पेश किया हुआ किरदार राघवेंद्र शर्मा का अब ये आपको तय करना है नायक कौन है या खलनायक कौन उसी तरह बहुत सारे किरदार है जैसे मयूर के दोस्त दुष्यन्त या शक्ति बन्ना उसके अलावा भी बहुत सारे राजनैतिक किरदार हैं जो हमारे देश के जातिवाद और सामंतवाद  को प्रदर्शित करते है जैसे उसमें कई चीजों का उल्लेख है जैसे
राजस्थान का बनिया जवानी में जो भी खाता-पीता हो, बिजनेस में लगने के बाद सात्त्विक और धार्मिक हो जाता है। उसे डर होता है कि कहीं लक्ष्मी माता उसके खाने-पीने से नाराज न हो।” 

या फिर ये 

राजाओं को ख़त्म हुए ज़माने हो गए, पर राजस्थान में पूर्व महाराजाओं के शो ऑफ़ अभी भी बदस्तूर चालू हैं। शहर के आम नागरिकों में हो न हो, पर राजपूतों में अभी भी पूर्व राजघरानों के लिए सम्मान है। राजा लोग अभी भी अपने आप को हुक्म बुलवाने के लिए कई मौक़ों पर अपने महलों/हवेलियों पर दरबार सज़ाते हैं, जहाँ उनके ठिकानेदार राजपूती वेशभूषा में तलवारें बाँधकर इकट्ठे होते हैं और राजा साहब के सामने सिर झुकाकर उसको इक्कीसवीं सदी में भी सन् 1880 का अहसास कराते हैं। ठिकानेदार वह लोग होते हैं, जिन्हें रियासत की तरफ़ से जागीर (ठिकाना) मिली हो। इन ठिकानेदारों में बहुत सों का यूँ तो अब कोई ठिकाना न रहा, पर ऐसे दरबार लगने पर सज-धज के यह आज भी बड़ा गर्व महसूस करते हैं”

इस उपन्यास में दर्शाए गए सभी किरदार फिर चाहे वो मंत्री बेनीवाल , मुख्यमंत्री रत्नेश सिंह या दारू व्यापारी दुर्गाराम जाट या ब्राह्मण नेता श्याम जोशी सभी किरदारों को सामाजिक दृष्टिकोण से राजनीति से प्रेरक स्वरूप में दर्शाया है ... 

यह उपन्यास छात्र राजनीति पर बात करती है पर उसी के साथ वह राज्य स्तरीय राजनीति को भी दिखाती हुए चलती है। इस तरह एक पूरे राजनीतिक माहौल का निर्माण होता है।

आधुनिक भारत में हम बाहर से भले ही जातिवाद को स्वयं से दूर रखना चाहें पर वह हमारे सामाजिक व्यवस्था में जोंक की भाती चिपक गई है। जिनको पढ़ने में आपको सच में ऐसा लगेगा के आप राजस्थान की राजनीति को देख और समझ रहे है 

कुल मिलाकर जब आप ये उपन्यास पढ़ेंगे तो आपको ऐसा प्रतीत होगा के कहानी को कितने अच्छे से प्रस्तुत किया है और उपन्यास ना पढ़ के किसी मूवी या वेबसीरीज की कहानी पढ़ रहे है ....!