समीक्षा : उपन्यास जिगरी by पी अशोक कुमार Vishwas Panday द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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समीक्षा : उपन्यास जिगरी by पी अशोक कुमार

समीक्षा : उपन्यास जिगरी by पी अशोक कुमार 

जिगरी एक मदारी इमाम और उसके पालतू भालू सादुल की कहानी है , ये कहानी आज के समय में इंसान के दोहरे चरित्र को दर्शाता है , कैसे एक जानवर को आप अपनी सहूलियत और खुद के स्वार्थ के लिए पालते है और जब वो बूढ़ा हो जाता हैं और आपके काम का नहीं रहता तब आप उससे कैसे पीछा छुड़ाना चाहते है या ये कहे के नए किसी लालच के लिए अपने पाले हुए जीव को उसके हालातों पर छोड़ देना ! 
कहानी बहुत मार्मिक है एक बेजुबान जानवर की जिसे आप अपने लालच के लिए उसकी मां और प्रकृति से चुरा लाते है उसको अपने हिसाब से उसकी जीवनशैली को बदल देते है ,फिर एक समय बाद उसको छोड़ने की सोचते है के वो वापस अपनी उसी दुनिया में लौट जाए और आपका पीछा छुटे ! 
ये कहानी बाप और बेटे की विचारधारा में जो बदलाव होता उस पर आधारित है , जिसमें बेटा अपने साथ पले बढ़े हुए अपने भाई के जैसे भालू को 2 बीघा जमीन के बदले मार देना चाहता है और पिता अपने बेटे जैसे पाले हुए भालू को बचाने की जद्दोजहद में उलझा रहता है और एक मां की जो उस जानवर को अपना दूध पिला कर बड़ा करती है मन्नत मांगती है और उसको अपने बेटे से ज्यादा तवज्जो देती है , फिर एक दिन उसको अपने जन्म दिए बेटे और पाले हुए बेटे में से एक को चुनना होता है ....!
इस कहानी में कई किस्से है जिसमें भालू ने मदारी इमाम के प्रति अपने बेटे होने का हक अदा किया है जैसे पहलवान के साथ कुश्ती के पहले जब पहलवान मदारी को मारता है तो वो उस पहलवान पर हमला के इमाम को बचाता वैसे जब उसका बेटा मदारी को मरने आगे बढ़ता है तो उसको बचाने के लिए उसपर हमला करता है पर जान से नहीं मारता बस डरता है  और खुद मार खाता है ... 
कुल मिला कर यदि आप पशु प्रेमी है तो ये कहानी आपके दिल को छू जाएगी और आप सोचेंगे के कैसे कोई ऐसा कर सकता है के अपने लालच के लिए इस हद तक चला जाए के किसी जीव के प्राण लेने पर ललायित हो जाए .... और कैसे उस परिवार के सदस्यों में उस भालू के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आता है कैसे वो भालू जिसे कभी घर के इकलौते बेटे से ज्यादा दुलार मिलता है वो एक समय के बाद कैसे महज एक जंगली बूढ़ा जानवर रह जाता है....
अतः ये लघु उपन्यास इंसान के लालच और स्वार्थ को दर्शाता है कहानी के माध्यम से लेखक ने एक बेजुबान की व्यथा को शब्दों में पिरोने का भरसक प्रयास किया है और काफी हद तक सफल भी हुए है कैसे एक जंगली जानवर जिसे आप उठा कर लेट है और उसका जीने का तरीका बदल देते है अपने हिसाब से अपनी सहूलियत के अनुसार उसकी परवरिश कर उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते है फिर जब उसको आपके सहारे की जरूरत होती है तो उससे उसके हाल पर छोड़ने की ज़हत में उसकी जान लेने पर भी उतारू हो जाते है ......