चुप्पी - भाग - 7 Ratna Pandey द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चुप्पी - भाग - 7

क्रांति का उदास चेहरा और बहते आंसू देखकर मुकेश सर तुरंत ही उसके पास आये और कहा, "क्रांति जीत हार तो इस खेल का हिस्सा है। अरे एक टीम हारती है तभी तो दूसरी जीतती है ना। उदास मत हो इस बार ना सही, अगली बार हम जीतेंगे। मुझे तो इंतज़ार है कि बस अब कुछ ही देर में चयनित छात्राओं में सबसे पहले तुम्हारा नाम पुकारा जाएगा और वही हमारी सबसे बड़ी जीत होगी। अब तुम हमारे राज्य की तरफ़ से खेलोगी और उसके बाद नेशनल लेवल पर भी खेलोगी। क्रांति  फिर हमारे देश के लिए खेल की ट्रॉफी भी लाओगी। मैं जानता हूँ बचपन से तुम्हारा यही सपना है और अब उसके पूरा होने का समय धीरे-धीरे नज़दीक आ रहा है," इतना कहकर मुकेश सर उनकी कुर्सी पर जाकर बैठ गए।

क्रांति सोच रही थी, "नहीं सर, मैं जानती हूँ, मेरा नाम नहीं पुकारा जाएगा।"

धीरे-धीरे वह समय भी आ गया जब नाम पुकारे जाने थे। अमर ने खड़े होकर माइक हाथ में लेते हुए कहा, "यहाँ जितनी भी टीम आई हैं उनमें कई छात्राओं का प्रदर्शन लाजवाब था पर हम सभी को तो सिलेक्ट नहीं कर सकते। जिन्हें इस साल मौका नहीं मिला वह दुखी ना हों क्योंकि अभी तो आप लोगों की शुरुआत ही हुई है। अभी, तो बहुत अवसर मिलेंगे तो दिल थाम कर बैठिए," कहते हुए अमर ने तीन नाम पुकार लिए परंतु उन तीन नामों में क्रांति का नाम नहीं था।

उसकी टीम और दोनों सर हैरान थे कि क्रांति का नाम कैसे नहीं आया। उसके सर उसकी तरफ़ देख रहे थे और वह चयनित की गई लड़कियों के लिए ताली बजा रही थी। वह उसकी आंखों से लुढ़क कर बहते आंसुओं को पोछने की कोशिश बिल्कुल नहीं कर रही थी। वह उन्हें बह जाने दे रही थी, मानो सारा दर्द बहाकर हल्का महसूस करना चाहती हो।

इस समय कोई उसे कुछ नहीं बोला क्योंकि सब जानते थे कि उसके साथ अन्याय हुआ है। उनकी टीम में इस समय सन्नाटा पसरा था।

कुछ देर में अमर सर जानबूझकर सबके बीच में उसके पास आए और बोले, "अरे क्रांति तुम भी बहुत अच्छा खेलीं पर उन तीन लड़कियों को ज़्यादा मार्क्स मिले थे; पर कोई बात नहीं अभी तो बहुत समय है तुम्हारे पास। तुम और मेहनत करो, हो सकता है अगली बार तुम्हारा चयन हो जाए।" यह सुनकर सब ताली बजाने लगे और अमर वहाँ से जाने लगा।

उसने जाते-जाते क्रांति की तरफ़ देखकर धीरे से कहा, "सोच लेना" और फिर वह चला गया।

क्रांति घर लौट आई। यह बात वह किसी को भी नहीं बता सकती थी, ना अपनी मम्मी को, ना सर को और पापा को बताने का तो सवाल ही नहीं था।

उसकी मम्मी ने उसे उदास देखा तो उसे समझाते हुए कहा, "क्रांति उदास क्यों है बेटा? तुम लोग फाइनल तक पहुँचे यह कितनी बड़ी और कितनी ख़ुशी की बात है। तुम लोग फाइनल ना जीत पाए तो क्या? यह कोई आखिरी मौका थोड़ी था, अभी तो यह शुरुआत है बेटा।"

क्रांति की आंखों में आंसू थे। उसका मौन, दर्द उसकी माँ को यह आभास करा गया कि बात कुछ और भी है। उन्होंने उसके सर पर प्यार से हाथ फिराते हुए पूछा, "क्रांति क्या बात है? तुम्हारे आंसू हार के साथ कुछ और दर्द भी बयाँ कर रहे हैं। क्या बात है बेटा मुझे बताओ?"

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः