चुप्पी - भाग - 5 Ratna Pandey द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चुप्पी - भाग - 5

अरुण से क्या कहेंगे यह प्रश्न रमिया को भी डरा रहा था। लेकिन वह अपनी बेटी के सपनों का साथ देना चाहती थी। वह सोच रही थी कि जिस राह पर क्रांति चल पड़ी है, वह तो शायद ऊपर वाले ने ही उसके लिए चुनी है। उसके बढ़ते कदमों को रोकना अब सही नहीं होगा। इस तरह कुछ देर सोचने के बाद उसने कहा, "क्रांति बेटा मैं तुम्हारे पापा से यदि यह कहूंगी कि तुम्हें हॉकी खेलने बाहर जाना है तो वह कभी अनुमति नहीं देंगे यह बात तुम भी अच्छी तरह से जानती हो।"

चिंता भरे स्वर में क्रांति ने कहा, "हाँ मम्मा मैं जानती हूँ। लेकिन फिर क्या होगा ...? क्या मेरा सपना ऐसे ही टूट जाएगा? मम्मा ऐसा मौका सब को नहीं मिलता पर मुझे मिला है। आप लोगों को तो खुश होना चाहिए कि आपकी बेटी कुछ अलग, कुछ अच्छा काम कर रही है।"

रमिया ने कहा, "मैं जानती हूँ क्रांति और समझती भी हूँ लेकिन तुम्हारे पापा नहीं समझना चाहते। उन्हें तो केवल पढ़ाई के ऊपर ही विश्वास है।"

"तो मम्मी पढ़ाई तो मैं कर ही रही हूँ ना?"

"हाँ कर तो रही हो पर जैसी करना चाहिए वैसी नहीं हो रही है क्रांति। खैर मैं तुम्हारे पापा से कह दूंगी कि तुम स्कूल से पिकनिक पर जा रही हो। वैसे भी उनका ऑफ तो शुक्रवार को ही रहता है, उन्हें मैं संभाल लूंगी। तू जा कर ले अपनी इच्छा पूरी।"

क्रांति खुश होकर अपने कमरे में चली गई। दूसरे दिन सुबह स्कूल जाकर उसने सर से कहा, "सर मैं चलने के लिए तैयार हूँ।"

"ठीक है क्रांति, तो तुम्हारे पापा मान गये।"

"नहीं सर मम्मी डरती हैं कि यदि पापा ने मना कर दिया तो मैं खेलने नहीं जा पाऊँगी।"

"कोई बात नहीं क्रांति तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि जिस दिन तुम्हारे पापा तुम्हें खेलता हुआ देख लेंगे उस दिन मना करना भूल कर वह ख़ुद भी तुम्हें हॉकी जगत की ऊँचाई पर देखना चाहेंगे।"

अगले रविवार को रौनक और मुकेश सर अपनी टीम को लेकर तय स्थान पर पहुँच गए। वहाँ भी एक से बढ़कर एक टीमें आई थीं। मैच शुरू हो गए, क्रांति की टीम कुछ मैच हारी तो कुछ जीती भी। क्रांति का प्रदर्शन हर बार लाजवाब था, देखने लायक था। यहाँ भी उसे सफलता मिली और अंततः उनकी टीम फाइनल तक पहुँच गई।

फाइनल में उनकी टीम का मैच जिस टीम से था वह लगातार 3 वर्ष से यह टूर्नामेंट जीत कर ट्रॉफी ले जा रही थी। इस वर्ष भी उनकी नज़र ट्रॉफी पर ही थी लेकिन उनकी आंखों में क्रांति खटक रही थी। उनकी टीम का कोच और खिलाड़ी लड़कियाँ जानती थीं कि इस लड़की को संभालना पड़ेगा, यह बड़ी खतरनाक खिलाड़ी है। उससे निपटने के लिए वे कई रणनीतियों के बारे में सोच रहे थे कि कल कैसे उसे नियंत्रण में रखें।

इधर रौनक और मुकेश सर भी जानते थे कि सब की नज़र क्रांति पर ही अटकी है। उन्होंने उसे बहुत समझाया।

रौनक ने कहा, "देखो क्रांति उस टीम की लड़कियाँ तुम्हें खेल के दरमियान परेशान कर सकती हैं। जानबूझकर तुम्हें गिरा सकती हैं, चोटिल भी कर सकती हैं और खेलते समय कुछ कमेंट भी कर सकती हैं। तुम्हें इन सब बातों का ध्यान रखते हुए अपने खेल का श्रेष्ठ प्रदर्शन करना होगा।"

"ठीक है सर, मैं ध्यान रखूंगी," क्रांति ने कहा।

इस खेल के दौरान हुआ भी बिल्कुल वैसा ही जैसा रौनक सर ने उसे बताया था। क्रांति ने सब का मुकाबला करते हुए अपने टीम के लिए तीन गोल किये परंतु उसके बाद उसे किसी लड़की की हॉकी से बहुत ज़ोर की चोट लगी और वह दौड़ते हुए गिर गई। विरोधी टीम तो यही चाहती थी। अभी दोनों टीमों के तीन-तीन गोल थे और चौथा गोल विरोधी टीम ने करके मैच जीत लिया।

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक 
क्रमशः