यत्र पूज्यन्ते नार्यस्तु - भारत वर्ष - 1 संदीप सिंह (ईशू) द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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यत्र पूज्यन्ते नार्यस्तु - भारत वर्ष - 1

यत्र पूज्यन्ते नार्यस्तु - भारत वर्ष


हम उस गौरवशाली और प्राचीन सभ्यता की अद्भुत मिसाल और सबसे उत्कृष्ट, प्राचीन सांस्कृतिक महत्व वाले देश भारत वर्ष 🇮🇳 की संतति हैं। आज की उन संकीर्ण विचारधारा को पल भर के लिए विमुक्त हो कर किनारे रख दे तो इतिहास साक्षी है कि संपूर्ण विश्व मे सबसे व्यावस्थित सभ्यता के प्रामाणिक स्वरुप हैं हम सभी भारत वासी।

प्रिय प्रेरक साथियों, विगत 19 नवंबर को आपको याद होना चाहिए कि आज राष्ट्र गौरव वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की जयंती भी थी । इसी परिप्रेक्ष्य मे इस लेख को लिखने की इच्छा हुई।


हम उसी पावन धरा की संतति है, जिसे आर्यावर्त, भारतवर्ष, हिंदुस्तान, भरतखंड कहा जाता है। यहां की उत्कृष्ट संस्कृति मे सर्वविदित है कि नारी सम्मान सर्वोपरि है।


नारी का सम्मान करना और उसकी रक्षा करना भारत की प्राचीन संस्कृति है। यहां कन्या को देवी कह कर पूजा जाता है।
भारत के सबसे प्राचीन ग्रन्थ मनुस्मृति में नारी के लिए उल्लेखित है -


“यत्रनार्यस्तु पूज्यते, रभन्ते तत्र देवताः।"
अर्थात - जहां औरतों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते है।


इससे ज्ञात होता है कि प्राचीन समय से भारतीय समाज में नारी का कितना महत्व रहा है। भारतीय समाज में नारी को लक्ष्मी देवी का रूप समझा जाता है।


जिस प्रकार सिक्के के दो पहलू होते है उसी तरह समाज के भी दो पहलू है।प्रथम पहलू यह कि देश में जहां नारी को देवी के रूप में पूजा जाता है, वही दूसरी ओर उन्हें कमज़ोर भी समझा जाता है।


औरतें जन्म से लेकर मृत्यु तक अपने सारे कर्त्तव्य निभाती है। वह एक माँ, पत्नी, बेटी, बहन आदि सभी रिश्तों को पूरे दायित्व और निष्ठा के साथ निभाती है।


प्राचीन काल से ही नर और नारी जीवन के दो पहिये माने जाते है। दोनों का समाज में समान महत्व होता है। प्राचीन भारत के समय नारी स्वतंत्र थी, महिलाओं पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं था ।


महिलाएं यज्ञो और अनुष्ठानो में भाग लेती थी। मध्य युग में धीरे धीरे समय बदलने पर पुरुष ने अपने अहम के लिए नारी को निम्न स्थान दिया।


वैदिक काल में भारतीय महिलाओं की स्थिति समाज में काफी ऊंची थी। उन्हें हर कार्य क्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हुई थी। वैदिक काल में भारतीय महिलाएं कम उम्र से ही शिक्षित थी।
इस समय में भारतीय महिलाएं सभी धार्मिक क्रियाओं में भाग लेती थीं । पुत्र हो या पुत्री उनके पालन पोषण में कोई भेदभाव नहीं किया जाता था।


शिक्षा, धर्म, राजनीति और सम्पत्ति के अधिकार और लगभग सभी मामलों में महिलाओं को समानाधिकार प्राप्त थे। ऐसा कहना बिलकुल गलत नही होगा की वैदिक काल भारतीय नारी के लिए सुवर्णकाल के समान था।


कुछ लोग नाना प्रकार की बाते करेंगे। जैसे सती प्रथा, सती किसे कहते थे यह आप सभी सती (अनुसूइया, सीता आदि) स्वरुप को पढ़ कर समझ सकते है।


जो कुप्रथा कहीं जाती है, वास्तविकता यह है कि अपने समय मे यह मजबूरी थी, किंतु बाद मे समाज ने इसे कुप्रथा के रूप मे आत्मसात कर लिया था।


वास्तविकता यह थी कि मुगल काल मे जब क्षत्रिय राजाओं को पराजित कर लूट पाट करते थे।


उनकी महिलाओं और राज्य की महिलाओं से दुष्कर्म किया जाता था। उन्हें शासकों के हरम (शयनकक्ष) मे भेजा जाता था। इस विषय पर भारतीय इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के मुख मे दही जम जाती है।


इस कारण से पति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी स्वेच्छा से चिता पर जल जाया करती थी।


उस समय काल मे लोगों को अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान बचाने के लिए यही विकल्प सूझा था। बाद मे यही कुप्रथा बन गई।
अब कुछ लोगों का विचार होगा कि अनुचित है यह, वे पुरुष स्वयं क्यों नहीं जल जाते थे।


सत्य भी यही है कि सती प्रथा को उचित नहीं ठहराया जा सकता।


किन्तु उस समय समलैंगिक अथवा गे प्रथा भारतीय सभ्यता में नहीं था, शायद मुग़लों मे भी यह नहीं था। वर्ना पुरुष की भी प्रतिष्ठा पर भी आंच आ जाती।


मुगलो के समय में मीना बाजार लगाए जाते थे और नारी को विलासिता का वस्तु समझा जाता था। उस समय में औरतों को पर्दा प्रथा , सती प्रथा जैसे कुप्रथाओ को मानना पड़ता था। बेहद छोटी उम्र में लड़कियों का विवाह करा दिया जाता था।
नारी इनके अत्याचार और आतंक से खुद को सुरक्षित रखने के लिए स्वतः ही शरीर गोदना से गोद लेती थी।


ये स्थितियां उस समय का विकल्प थी। सम्भवतः आने वाले सदी तक ये कुप्रथाओं के रूप मे प्रचलित हो गई।


पर्दा प्रथा भी पर पुरुष की घृणित दृष्टिपात से बचने के लिए ही प्रचलन मे आई। जो आने वाले भविष्य मे कुप्रथा का रूप धारण कर चुकी थी।


भारत ने मामूली नहीं बल्कि लगभग 300 बर्षों तक मुग़लों के आधीन अत्याचार सहा है। इतने लंबे समय मे तो कोई भी कृत्य प्रथा और कुप्रथा के रूप व्यवहारिक जीवन मे स्थाई हो जाती है।


ताजातरीन उदाहरण दहेज का ही लीजिए। पहले माता पिता इसे स्वैच्छिक दिया करते थे ताकि बेटी नई दुनिया को व्यवस्थित तरीके से बिना किसी असुविधा के जीवन की शुरुआत कर सके।


नए स्थान पर असहजता का सामना ना करें, तब ये वर पक्ष की मांग नहीं होती थी। और आज समाज के लोभियों के द्वारा यह समाज मे एक घृणित कृत्य बन चुका है।


अब बाकायदा माँगा जाता है। मांग पूरी ना होने पर या तो विवाह नहीं करते या वैवाहिक संबंध समाप्त कर दिए जाते है। इतना ही नहीं अपितु दो कदम और बढ़ा दिए दहेज की मांग अधूरी रहे या नित नई माँगों को मुँह फैले और पूर्ति ना हो तो हत्या तक कर दी जाती है बहू की।


गौर करने वालीं बात ये है कि यहां भी नारी ही नारी की दुश्मन है
सास, ननद, भाभी, देवरानी, जेठानी के रूप मे।
आज यह भी एक कुप्रथा के रूप मे विधमान और व्यापक रूप से प्रचलित है।


रचना के साथ बने रहें, अगले भाग मे तुलसी दास जी के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया है मैंने कि - नारी भारतीय संस्कृति मे पूज्यनीय रही है। इसके साथ ही वर्तमान मे नारी स्थिति पर भी चर्चा होगी।


(क्रमशः)

✍🏻संदीप सिंह (ईशू)