फादर्स डे - 5 Praful Shah द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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फादर्स डे - 5

लेखक: प्रफुल शाह

प्रकरण 5

सोमवार, 29/11/1999

तब ठीक दोपहर के 2 बजकर 3 मिनट हुए थे। फातिमा तो मानो होश ही खो बैठी थी। वह टेलीफोन इंस्ट्रूमेंट को देखती रह गई, समझ ही नहीं पा रही थी आखिर फोन किसने किया था, उसने जो कुछ कहा उसका मतलब क्या था और उसने ऐसा कहा किसलिए। वह हमेशा ही घर के भीतर रहती है, बाहरी दुनिया से उसे अधिक कुछ लेना-देना नहीं होता। उसने स्कूल जाकर औपचारिक पढ़ाई-लिखाई भी नहीं की थी। भाषा को दरकिनार कर भी दें, पर जिन शब्दों और जिस अंदाज से सामने वाला फोन पर बात कर रहा था, कोई आश्चर्य नहीं कि वह स्थिति की गंभीरता का कोई आकलन ठीक से कर भी पाई हो। उसने रिसीवर को क्रेडल पर रख दिया। उसके लिए यह एक बार फिर रूमानी ख्यालों में खोने का समय था!

इस पल उसका भाई इमरान अपनी कक्षा में था, ऊर्जावान जीवन के महत्व पर भाषण सुन रहा था। वह कोई उत्सुक छात्र नहीं था। उसे हमेशा कक्षा के समाप्त होने का इंतजार रहता था ताकि वह घर जाकर चाव से भोजन का आनंद उठा सके।

स्कूल की घंटी बजी....रिसेस टाइम!

इमरान किसी धावक की तरह तेजी से घर की ओर भागा। उसने बड़ी जल्दी अपनी रोटी और अचार खाया। फातिमा ने उसे उस टेलीफोन कॉल के बारे में बताया। वह अपने खाने में इतना मगन था कि उसने उसकी बातों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसने जैसे ही खाना खत्म किया, दोबारा स्कूल की ओर भाग पड़ा। अपनी कक्षा में जाते हुए उसकी मुलाकात प्रतिभा से हुई और उसने बिना कुछ सोचे-समझे उस फोन कॉल का जिक्र उनसे कर दिया।

यह सुनकर प्रतिभा घबराई. ‘संकेत..नहीं, वह नहीं हो सकता, उसे तो शायद उसके पिता ने स्कूल से ले लिया होगा....शायद?’ उसने सोचा कि सूर्यकान्त को फोन करके पूछ लिया जाए। ‘नहीं, उसे क्यों परेशान किया जाए, ठीक यही होगा कि संकेत के स्कूल में जाकर ही पता कर लिया जाए।’ वह इस निष्कर्ष पर पहुंची।

उस समय दोपहर के साढ़े तीन बजे थे जब तीसरी कक्षा की शिक्षिका स्वाति जोशी ने अंजलि वाळिंबे को बुलाया। स्वाति ने इस स्कूल में सात महीने पहले ही काम करना शुरू किया था। अंजलि को इस फोन कॉल के बारे में जानकर आश्चर्य हुआ।

“संकेत घर नहीं पहुंचा है ....”

“हमने उसे किसी के साथ घर के लिए निकलते हुए देखा था। हो सकता है वह किसी दोस्त या रिश्तेदार के घर पर हो। अभिभावकों को ऐसी बातों से चिंता तो होती ही है। वह घर पहुंच जाएगा। तू कशाला टेंशन घेते?”(तुम इस बात से क्यों चिंतित हो रही हो)।

चिंतित प्रतिभा संकेत के स्कूल की ओर भागी, लेकिन उसे देर हो चुकी थी। स्कूल बंद हो चुका था। ज्यादा विचार किए बगैर ही वह अंजलि वाळिंबे के घर पहुंच गई। “संकेत तो घर के लिए बहुत पहले ही निकल चुका था। मैंने उसे किसी के साथ जाते हुए देखा था। मैंने उससे दो-तीन बार पूछा कि क्या वह उस आदमी को पहचानता है, तो उसने हां में जवाब दिया था।”

अधिक पूछपरख करने के बाद प्रतिभा को मालूम हुआ कि संकेत किसी काले-सांवले आदमी के साथ स्कूल से निकला जो उसे स्कूटर पर लेने के लिए आया था।

अब आगे क्या? इस विचार के साथ प्रतिभा वापस अपने स्कूल आ गई। उस समय करीब चार बजे थे। वह अपने काम में मन लगाने की पूरी कोशिश कर रही थी लेकिन उसका दिमाग लगातार इस सवाल का जवाब तलाश रहा था ‘संकेत आखिर किसके साथ घर गया?’

‘ये बच्चे समझते नहीं हैं। अब, मुझे इन्हें स्कूल छोड़ने और लाने के लिए रिक्शे का इंतजाम करना ही होगा। कभी-कभी हमें इस तरह के लापरवाही भरे व्यवहार की भारी कीमत चुकानी पड़ जाती है। लापरवाही के बजाय सावधानीपूर्वक चलना कभी भी बेहतर होता है।’

जब प्रतिभा अपने इन विचारों के साथ उलझी हुई थी. सूर्यकान्त अपनी कंस्ट्रक्शन साइट से वापसी की तैयारी में था। उनसे आज के लिए तय बहुत सारे कामों को निपटा दिया था। ‘अब मुझे सीमेंट के प्रबंध की ओर ध्यान देना होगा, उसके बाद सब कुछ हो जाएगा।’ स्कूटर पर तेज गति से चलते हुए वह अपने आप से ही बात कर रहा था। वह सीमेंट की दुकान पर रुका जिसे उसका दोस्त प्रेमजी भाई पटेल चलाता था।

“काय भाऊ, (क्यों भाई) तुम इतनी जल्दबाजी में क्यों हो? तुम जब सुबह इधर से गुजर रहे थे तो मेरी ओर देखने की भी तुम्हें फुरसत नहीं थी...’’

“प्रेमजी भाई, काय करायचं( क्या किया जा सकता है), मैं जब काम को लेकर परेशान रहता हूं तो मेरा ध्यान कहीं भी नहीं लगता।”

“मैं समझ सकता हूं कि तुम्हें काम का तनाव है, लेकिन क्या इसकी वजह से हमारे संबंधों में फरक पड़ेगा?”

बिना जवाब की प्रतीक्षा किए प्रेमजी भाई ने दो कप चाय का ऑर्डर दे दिया। जब वे सीमेंट की बोरी के दामों के बारे में विचार-विमर्श कर रहे थे तभी प्रतिभा का फोन आया।

“संकेत तुम्हारे साथ ही है न!”

“नहीं, मैं साइट पर था।”

“टीचर कह रही थी उसे कोई ले गया....संकेत कहां है?”

“कोई उसे घर ले गया होगा।”

“वह घर पर नहीं है।”

“तुम फिक्र मत करो...विवेक या फिर गांव का कोई आदमी उसे ले गया होगा...वह अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए रुक गया होगा।”

“मुझे डर लग रहा है...किसी ने लैंडलाइन पर फोन किया था...फातिमा ने बताया कि उसने कहा कि यदि हमें बच्चा वापस चाहिए हो तो एक लाख रुपए दें। मुझे वाकई डर लग रहा है।”

“डरो मत. सारे गांव को पता है कि एक लाख रुपए देने की हमारी ताकत नहीं है। किसी ने मजाक किया होगा...या किसी ने रॉंग नंबर डायल कर दिया होगा...और तुम्हें तो पता ही है फातिम मूर्ख है, वह किसी भी बात को सही तरीके से समझ नहीं पाती। तुम उसके कही बात से इतनी चिंतित क्यों हो?”

प्रतिभा ने कोई जवाब नहीं दिया। सूर्यकान्त उसके रुदन को स्पष्ट रूप से सुन पा रहा था। उसने जेब से रुमाल निकाल लिया अपने चेहरे के पसीने को पोंछने के लिए।

“देखो प्रतिभा, प्लीज़ रोओ मत। संकेत आसपास ही कहीं होगा...हम उसे खोज लेंगे...तुम चिंता मत करो, मैं घर आ रहा हूं।”

चाय टेबल पर ही पड़ी रह गई। सूर्यकान्त ने उसकी ओर देखा तक नहीं और वहां से निकलने के लिए खड़ा हो गया। प्रेमजी भाई ने स्थिति की गंभीरता को समझ लिया, सूर्यकान्त को कंधों के सहारे पकड़कर बैठने के लिए कहा। उसने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया और बिना विलंब 25-30 लोग वहां इकट्ठे हो गए।

सूर्यकान्त उसके दोस्तों के साथ संकेत के स्कूल में गया, उसके बाद उसकी स्कूल टीचर अंजुलि के घर गया। उन्हें कोई सुराग हासिल नहीं हुआ। वही सूचना दोहरा दी गई, “वह स्कूटर पर आए एक काले-सांवले आदमी के साथ घर के लिए निकला था।”

शिरवळ में यह अपनी तरह की पहली घटना थी। मामले को सुलझाने के लिए मदद करने के लिए हर कोई भागदौड़ कर रहा था, लेकिन किसी को इस बात पर विश्वास नहीं हो रहा था कि अपहरण जैसी घटना शिरवळ जैसे छोटे से स्थान में भी हो सकती है। ‘बच्चा आसपास ही कहीं खेल रहा होगा और हम उसे जल्द ही ढूंढ़ लेंगे’ ये विचार उनमें से ज्यादातर के दिमाग में घूम रहा था।

उन्होंने एक के बाद एक, संकेत के सभी दोस्तों के घरों में दस्तक दी; मयूरी गावड़े, अर्पणा मांगाड़े, स्वप्निल वांगाड़े और रोहन मिथारी। संकेत कहीं नहीं मिला। यहां तक कि किसी ने उसे स्कूल से निकलने के बाद देखा तक नहीं था।

संकेत का अपने बड़े भाई सौरभ के साथ बड़ा दोस्ताना संबंध था। सूर्यकान्त की टीम ने संकेत को खोजने के लिए उससे भी जानकारी हासिल करने की कोशिश की। “क्या तुमने अपने छोटे भाई से कुछ कहते हुए सुना था कि वह कहां जाने का विचार कर रहा है? क्या तुमने उसको किसी के साथ देखा था? क्या तुमने उसे कहीं देखा था?”

सवाल कई थे लेकिन जवाब एक ही था ‘नहीं’।

अब इस मामले को सुलझाने का एक ही उपाय दिखाई दे रहा था, वह था पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना। सूर्यकान्त और उसके दोस्त शिरवळ पुलिस स्टेशन की ओर दौड़े।

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लाल चींटियों का एक समूह शवदाहगृह में पड़े मृत परिंदे की देह के अवशेषों को चट करने में जुटा था।

अनुवाद: यामिनी रामपल्लीवार

©प्रफुल शाह

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