फादर्स डे - 3 Praful Shah द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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फादर्स डे - 3

लेखक: प्रफुल शाह

प्रकरण 3

सोमवार, 29/11/1999

सूर्यकान्त बाथरूम में घुसा, उसने बालों में शैम्पू तो लगाया लेकिन रगड़न भूल गया। उसके विचारों की रेल चल पड़ी थी, ‘अंततः मेरे कठोर परिश्रम के वृक्ष पर फल लगने की बारी आ गई है। संकेत के जन्म के बाद मेरे करियर में जबर्दस्त उछाल आया है। दुःख तो इस बात का है कि मेरी कोई भी उपलब्धि प्रतिभा के मौन को तोड़ने में सफल नहीं रही है। मैं उसके व्यवहार को समझ ही नहीं पा रहा हूं। हमारे विवाह को कई साल बीत गए, हमारे बीच प्रेम का बंधन भी है, बावजूद उसका मौन मुझे चुभता है।’

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परिंदा असमंजस में था, किधर जाना है। इस दुविधा में वह अनायास ही नीरा की ओर मुड़ गया, शुभमंगल किले की ओर, साई विहार की ओर। उसके बाद वह दुर्गामाता के एक छोटे से मंदिर के पास उतर गया। यह वह जगह थी जहां चाय की टपरी का मालिक राघोबा नियमित रूप से आता था और चिड़ियों को दाना डाल जाता था। उसकी आवाज में अजीब सी कशिश थी जो मंदिर के पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करती थी। परिंदे ने देखा कि उसके साथी बड़े मजे से दाना चुगने में मगन हैं। पर उसे कुछ खाने का मन नहीं किया। वह वापस उसी ओर मुड़ गया, जिस ओर से आया था, साई विहार की तरफ...

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विवेक ने संकेत और सौरभ को एमईएस इंग्लिश मीडियम स्कूल में छोड़ा। संकेत जूनियर किंडरगार्टन में था, तो सौरभ तीसरी कक्षा में। दोनों को अपन-अपनी कक्षाओं में जाने की इतनी हड़बड़ी थी कि वे अपने चाचा को गुडबाय कहना भी भूल गए। विवेक उन्हें भागते हुए देख रहा था। उसने अपने पैंट की जेब से रुमाल निकाला और अचानक उभरे पसीने के आवेग को पोंछा। उसने रुमाल को वापस मोड़ा, अपनी जेब में रखने लगा, लेकिन वह अपने गुस्से को रोक पाने में नाकामयाब रहा। वह अपनी बाइक को स्टार्ट कर ही रहा था कि ग्रे रंग की स्कूटर स्कूल के पास आ खड़ी हुई। स्कूटर सवार ने स्कूल की ओर देखा और फिर अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को।

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प्रतिभा रसोई से बाहर भागी। वह अपने आप से बात कर रही थी, ‘दस तो बज ही गए। मुझे स्कूल में देर नहीं होनी चाहिए। मुझे तैयार होना होगा। ’ सूर्यकान्त अपने मोबाइल फोन पर किसी से फोन पर बात करते हुए प्रतिभा की ओर देख कर मुस्कुराया। ‘यह उसकी नियमित दिनचर्या है। वह रसोई में काम करती रहती है, चिंतित भी होती रहती है कि उसे स्कूल के लिए देर हो जाएगी लेकिन हमेशा ही स्कूल समय पर पहुंच ही जाती है।’ वह खुद को बता रहा था।

अचानक उसे याद आया कि शेखर नजर नहीं आ रहा है। उसे स्मरण हुआ कि उसने शेखर को कल से नहीं देखा है। फिर उसने महसूस किया कि व अपने ही काम में इतना उलझा हुआ है कि उसे अपने आसपास क्या हो रहा है, इसका भी भान नहीं रहता।

समय तेजी से भाग रहा था।

प्रतिभा 15 मिनट में तैयार हो गई।

“हमें अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने और घर वापस लाने के लिए रिक्शा लगवा लेना चाहिए,” उसने किसी डर के कारण ऐसा सुझाव दिया।

सूर्यकान्त ने सहमति में सिर हिलाया, पर वह वहां से हटी नहीं। सूर्यकान्त ने उसका इशारा समझ लिया और फोन पर बात कर रहे व्यक्ति से बाद में बात करने की बात कहकर फोन काट दिया।

“शिरवळ छोटी जगह है। हम सभी एकदूसरे को जानते-पहचानते हैं। ट्रैफिक का भी कोई टेंशन नहीं है। बच्चों को या तो विवेक या फिर मैं स्कूल छोड़ ही देते हैं, इसमें परेशानी क्या है?” उसने प्रतिभा से पूछा।

प्रतिभा की भावभंगिमा से ऐसा लगा मानो वह उससे पूरी तरह सहमत नहीं है।

“और उन्हें स्कूल से वापस लाने के बारे में क्या....?” अब उसने पूछा।

सूर्यकान्त ने उसकी चिंता को समझ लिया। उसने प्रतिभा का हाथ अपने हाथों में लिया, उसकी आंखों में आंखें डालीं और उसे दिलासा दिया कि इन छोटी-छोटी बातों को लेकर उसे परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।

“दोनों बच्चे हमेशा एकसाथ वापस आते हैं। वे सुरक्षित हैं। और यदि तुम चाहती ही हो तो मैं किसी रिक्शेवाले से इस बारे में बात कर लूंगा।” उसने कहा।

उसने प्रतिभा को सलाह दी कि उसे स्कूल के लिए निकल जाना चाहिए वरना उसे देर हो जाएगी।

प्रतिभा ने कुछ नहीं कहा। आज तो उसे देर हो ही गई थी। आमतौर पर, वह स्कूल में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक रहती है। वह शिरवळ जिला परिषद प्रायमरी स्कूल में टीचर थी। उसे अपने काम में आनंद आता था।

फातिमा आउट हाउस के अपने कमरे में लगे परदे के पीछे से प्रतिभा को स्कूल जाते हुए पीछे से देख रही थी। वह उसे साई विहार से बाहर जाते हुए देख कर बहुत खुश हो रही थी। उसने टेलीफोन पर अपने हमेशा के अंदाज में फिल्मी गीत गाना शुरू कर दिया।

‘देखा है पहली बार साजन की आंखों में प्यार...’

सूर्यकान्त ने अपना मोबाइल फोन उठा लिया। “मैंने तुम्हें 10 मिनट के बाद फोन करने के लिए कहा था,” वह फोन पर नाराजगी से जवाब दे रहा था। ‘सबसे पहले मुझे चौफाला गांव पहुंचना होगा जो यहां से तीन किलोमीटर दूर है। उसके बाद...’ फोन पर बात करते हुए भी उसके विचारों का प्रवाह बना हुआ था। यह जानकर कि उसे देर हो जाएगी, उसने तैयार होने का विचार किया।

सूर्यकान्त ने अपना स्कूटर ठीक 11 बजे स्टार्ट किया। उसके विचारों का आवागमन स्कूटर की गति से कहीं ज्यादा तेज था। वह रास्ते में पड़ने वाले ट्रैफिक सिग्नल और स्पीड ब्रेकर्स से भी अनभिज्ञ था। वह इस बात से भी अनजान था कि सड़क पर बच्चे खेल रहे हैं, कुत्ते के पिल्ले छोटी-छोटी संकरी नालियों और गड्ढों में भरे पानी में दौड़ रहे हैं। शिरवळ के बाहरी इलाके में उसे एक खुले हुए गटर के पास अपना स्कूटर बलपूर्वक रोकना पड़ा। उसे जान पड़ा कि उसका मोबाइल फोन बज रहा था। उसने मोबाइल को अपने शर्ट की जेब से बाहर निकाला, नंबर देखा और गुस्से से बात की। सामने वाले ने फोन पर जो बात कही थी, वह उसे अच्छी नहीं लगी थी। उसके चेहरे के भाव बदल गए। “आप जिसके लिए राजी हुए थे उसकी डिलवरी यदि नहीं कर सकते हैं तो आगे से जवाबदारी मत लीजिएगा। आपने जितना पैसा मांगा उतना मैंने आपको दिया। इसके अलावा मैंने आपको टूव्हीलर भी दिया, जिसकी की आपने डिमांड की थी। मैं काम पूरा चाहिए। कोई झूठ नहीं, कोई बहाना नहीं। वरना आपको मालूम हैं मैं क्या कर सकता हूं, ” उसने फोन करने वाले को धमकी दी।

पास से गुजर रहे दो गांव वाले इस गुस्से भरी बातचीत को सुन पा रहे थे। उन्होंने अपने चलने की गति बढ़ा दी।

“यह आदमी कितनी असभ्यता से बात करता है। ऐसा लगता कि उसकी जीभ पर नीम चढ़ा हुआ है या उसकी जीभ नहीं कटार है। ” दोनों में से एक ग्रामीण ने कहा।

“लगता है उसकी जीभ मिर्च लिपटी हुई तलवार है।” दूसरे ने उत्तर दिया, “वह ऐसे कठोर शब्दों का उपयोग करके अपने बिजनसे को चला रहा है। यदि उसका सामना उसी की तरह किसी निर्दयी व्यक्ति से हो जाए, तो वह ऐसा कहन भूल जाएगा,” उसने आगे कहा।

सूर्यकान्त ने अपना करियर एक कंस्ट्रक्शन फर्म में सामान्य कर्मचारी की तरह शुरू किया था। उसने सेंटरिंग का प्रायवेट काम लेने से पहले उस फर्म में बहुत मेहनत की थी। बाद में, वह लेबर कॉन्ट्रैक्टर बना और अब मटेरियल और लेबर कॉन्ट्रैक्टर है। थोड़े में कहें तो, वह अपने धंधे में अच्छा काम कर रहा है।

पास से गुजरे दोनों ग्रामीण अब सूर्यकान्त को कुछ दूरी से देख रहे थे। उनके विचार साथ-साथ चल रहे थे, ‘जो लोग तेज गति से सफलता के शिखर पर पहुंचते हैं वे उसी तेजी से मुंह के बल गिरते भी हैं। उनकी गिरावट उन्हें बुरी तरह चोट पहुंचा सकती है।’

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एमईएस स्कूल की घंटी ठीक 12 बजे बजी। बच्चे अपनी-अपनी कक्षाओं से बाहर निकलने लगे। दो युवा शिक्षिकाएं अंजली वाळिंबे और स्वाति जोशी सभी बच्चों के बाहर निकलने का इंतजार कर रही थीं। वे धूप में सभी तरह के विषयों पर बात कर रही थीं, फैशन, महंगाई... अभिभावकों के साथ घर लौट रहे बच्चों पर भी ध्यान दे रही थीं।

आज सौरभ की कक्षा संकेत से ज्यादा समय तक चलने वाली थी। इसलिए संकेत इंतजार कर रहा था कि कोई उसे लेने आए। शिक्षिकाओं ने देखा कि सभी बच्चे अपने-अपने घर चले गए हैं, संकेत अकेला रह गया है। उसी समय एक व्यक्ति स्कूटर पर आया और उसने संकेत को देखकर हाथ हिलाया। संकेत को देखकर वह मुस्कुराया, बदले में संकेत भी मुस्कुरा दिया। इसके पहले कि शिक्षिकाएं संकेत से पूछ पातीं कि क्या वह स्कूटर वाले को जानता है, बच्चा तेजी से उसकी ओर दौड़ पड़ा।

उन नन्हें कदमों को शायद ही पता था कि वे बच्चे को एक डरावनी नियति की ओर ले जा रहे हैं..

अनुवाद: यामिनी रामपल्लीवार

©प्रफुल शाह