यातना - भाग 2 Bindu द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • एक ईच्छा

    एक ईच्छा लेखक: विजय शर्मा एरी  ---प्रस्तावनाजीवन की सबसे बड़...

  • ​मेरा प्यार - 1

    ​एपिसोड 1: दरिया, परिंदे और वो अजनबी​अज़ीम …. वह ज़ोया को जा...

  • डबल गेम: मर्यादा वर्सेस मक्कारी - 2

    सुबह की सुनहरी धूप अब तीखी होने लगी थी। भूपेंद्र के ऑफिस जान...

  • Vulture - 2

    शीर्षक: वल्चर – अँधेरे की उड़ानभाग 2 (बैकस्टोरी): “रक्तपंख क...

  • लाल दाग़ - 4

    मैडम ने अपने बैग में देखा कि अगर उनके पास पैड हो तो वे सुधा...

श्रेणी
शेयर करे

यातना - भाग 2

रंभा कभी-कभी जब दिनेश नहीं होता था तो मान्या के घर जाती थी और उसे अपनी ह्रदय की करुणा की बातें बताती थी मान्या भी कभी-कभी तो रो पड़ती थी रंभा की बात को सुनकर वह रंभा के प्रति सहानुभूति जताती थी और रंभा को कभी-कभी कहती थी कि तुम कमजोर मत पड़ना सब कुछ ठीक हो जाएगा लेकिन रंभा कहती थी मैं भी दिन में यही सोचती हूं कि आज रात को कुछ नहीं होगा लेकिन रात होते ही जैसे दिनेश एक हैवान बन जाता है कई कई बार तो में बेहोश हो जाती हूं पर वह मुझे छोड़ता ही नहीं


सबको दिनेश इतना अच्छा होनहार लगता है ना रात दिन गाड़ी चलाता रहता है और कमाता है और अपने पिता और छोटे भाई का ख्याल रखता है लेकिन मैं ही जानती हूं मान्या कि वह दरिंदा है ऐसा दरिंदा जो मुझे रोज नोच नोच कर खा जाता है पर क्या करूं मैं अपने छोटे से बच्चे के लिए इस सब को भूल जाती हूं मैं उसको देखती हूं ना तो यह सारे दुख दर्द भूल जाती हूं मुझे नहीं पता मान्या कि मैं कैसे जिंदा रहती हूं शायद मेरी मां तो नहीं थी मेरे बच्चे को भगवान ने अच्छे से परवरिश के लिए या शायद इसलिए मुझे जिंदा रखा होगा मान्या मैं छोटी थी ना तभी मेरी मां तो गुजर गई थी और मेरे बाबूजी नहीं मां को ब्याह के लाए थे और जब उसकी बच्ची हुई तो मेरी मां ने तो जैसे मुझे नौकरानी बना के रख दिया था घर का खेत का सारा काम मुझसे करवा ती थी और उसको मैं पसंद ही नहीं हूं और वैसे भी मेरा रंग भी श्याम इसीलिए वह मुझे नापसंद करती थी और इसी दौरान दिनेश की मां का भी निधन हो गया और उसे पता चला और उसने दिनेश के साथ ही मेरी शादी पक्की कर दी मुझे क्या पता था कि मैं कहां जा रही हूं जहां जा रही हूं वह कैसा होगा क्या होगा कई बार में रूठ के अपने मायके भी गई लेकिन मेरी नई मां मुझे इतने ताने सुनाती थी और मुझे कभी-कभी तो मारती थी इसलिए उससे बचकर मैं यहां आ जाती थी यहां दिनेश दोपहर को शाम को दिन को तो दिनेश लगता ही नहीं ऐसे लगता है जैसे कोई और ही है रात को मैं जब दिनेश को देखती हूं ना तो मुझे बहुत डर लगता है कभी-कभी मुझे डर लगता है कि मेरे प्राण न चले जाए अगर मेरे प्राण चले गए तो मेरे बच्चे का क्या होगा यह सोचकर मेरे रूह कांप उठती है मैं तुम्हें कैसे बताऊं कितनी यातना में सहन करती हूं... कभी-कभी तो सुबह मुझसे उठा भी नहीं जाता दर्द के मारे सारा शरीर जिसे लकवा ग्रस्त हो गया हो ऐसा लगता है पर पता नहीं फिर कैसे सब कुछ संभाल लेती हूं और कैसे सब ठीक हो जाता है मुझे पता है कि यह सारा समाज कभी नहीं मानेगा कि दिनेश हैवान है क्योंकि मेरी मां और बाबा भी मेरी बात नहीं सुनते ही समाज का क्या कहना इसीलिए मैं सब चुपचाप सहन कर लेती हैं और मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मुझे मेरे बच्चे के लिए बचाना मेरा बच्चा कहीं मां के प्रेम से वंचित ना रहे जैसे में रही...