एक दुआ - 2 Seema Saxena द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • रिश्तो की कश्मकश - 5

    आलिया,, ने मीत की तरफ देखा,, और मुस्कुरा कर बोली तो करने दीज...

  • ज्ञान

    सरस्वती एक प्रतिभाशाली लड़की है। एक दिन उनके पाठशाला में रास...

  • शून्य से शून्य तक - भाग 5

    5=== पर्वतों की शृंखला से सूर्य की ओजस्वी लालिमा...

  • मेन काम्फ

    किताबे, कालजयी हो सकती हैं.. और टाइम कैप्सूल भी। हर किताब ले...

  • Shyambabu And SeX - 36

    36 इंतज़ार   दरवाजा  एक कामवाली ने खोला, उसने उसे अंदर बिठाया...

श्रेणी
शेयर करे

एक दुआ - 2

2

“कहाँ हो आप मिलन जी ?” जब वहाँ पहुँच कर वे वहां पर नहीं दिखे तो उसने घबरा कर फोन पर पूछा ।

“मैं अभी बैंक में आया हूँ ! आप कहाँ हो ?”

“मैं यहाँ पहुँच गयी हूँ ।”

“अरे आप आ गयी ?”

“जी ! आना ही पड़ा जब आपने इतने हक से कहा ।”

“अभी तो मना कर रही थी ।”

“अब जब आप इतना डांट कर बोलोगे तब कोई भी हो डर ही जाएगा और फिर तो आना ही पडेगा न ।”

”ठीक है तुम रुको, मैं अभी काम निबटा कर एक घंटे में पहुँचता हूँ ।”

“एक घंटा ? तब तक मैं यहाँ पर अकेले क्या करूंगी ?”

“हाँ जी ! बैंक में बहुत जरूरी काम है पूरा एक घंटा लगेगा। आप अंदर कमरे में जाओ वहाँ पर ऑफिस का स्टाफ है ! लड़कियां भी है, आप जाओ और आराम से वहाँ बैठो।”

“नहीं पहले आप आओ तब अंदर जाएँगे, अभी आइये आप ५ मिनट में ।”

“अरे भाई बैंक बड़ी दूर है ! अगर अभी निकला तब भी थोड़ा टाइम तो लगेगा ही और पांच मिनिट में तो हवाई जहाज से भी नहीं पहुंच सकता हूँ।”

“अब जैसे भी हो आप आओ, मुझे कुछ नहीं पता वरना मैं जा रही हूँ और जब आपको यहाँ मिलना ही नहीं था तो बुलाया ही क्यों ? न जाने कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी थी कि एक ही साँस में सब बोल गयी ।

“अच्छा चलो मैं अभी आता हूँ तुम नाराज क्यों हो रही हो ? उधर से मिलन ने ज़ोर से हँसते हुए कहा और सुनो, बाहर मत खड़ी रहो कमरे में जाकर बैठो, बस मैं अभी आया।”

“ठीक है जा रही हूँ ।” इतने दिनों से रोजाना मिलना होता था कभी इस तरह से बात नहीं हुई लेकिन आज यह अचानक से ऐसा क्या हुआ कि वो बिल्कुल अपने से लगने लगे ! यही सब सोचते हुए वो कमरे में आ गयी ! बड़ा सा कमरा था जिसमें एक बेड पड़ा हुआ था, मेज सोफा सेट और कुछ कुर्सियाँ रखी हुई थी । जिस पर सभी लोग बैठे हुए थे । उसकी मैनेजर मैडम भी थी तो वो उनके पास ही जाकर बैठ गयी । बेड पर देश के प्रसिद्ध गीतकार अधलेटे से बैठे हुए थे । आज उनका ही कार्यक्र्म होना था । मिलन जानते थे कि उसे कवितायें लिखने का शौक है इसलिए ही उसे जबरदस्ती इनसे मिलवाने के लिए बुला लिया । उनकी इस परवाह करने के ढंग से उसका मन मुस्कुरा उठा और सिर श्रद्धा से झुक गया। उसने उन गीतकार से हाथ जोड़कर नमस्ते की और उनसे बात की । मैडम और उसने उन वरिष्ठ गीतकार के साथ कुछ फोटो भी खिंचवाए ।

कुछ ही देर में मिलन आ गए और उसके पास वाली कुरसी पर ही बैठ गए ! उसने उनको हाथ जोड़कर नमस्ते की और उसका उनसे कुछ पूछने बात करने का जी चाहा । पर इतने सारे लोगों के बीच कोई बात आखिर कैसे की जाए ! हालाँकि वे बात नहीं कर रहे थे फिर भी उनके मन लगातार आपस में बात कर रहे थे ! उनके मुंह से भले ही कोई शब्द न निकल रहे हो लेकिन उन दोनों के दिल आपस में लगातार बतिया रहे थे ! उन्हें बिल्कुल समझ नहीं आ रहा था कि इतने लोगों के बीच इन दिल की बातों को कैसे लफ्जों का जामा पहनाया जाए ?

वे और लोगों से बात कर रहे थे और विशी हर बात से अपना मन हटाकर बार बार अपने मन को इधर लगा ले रही थी ।

“अच्छा चलो अब मैं जा रही हूँ क्योंकि मुझे यहाँ आये हुए काफी देर हो गयी है ! उनका ध्यान अपनी तरफ खींचने के कारण आखिर उसके मुंह से यह शब्द निकल ही गये ।”

“अरे इतनी जल्दी, अभी तो आयी हो !” वे लगभग चौंकते हुए बोले मानों उसका जाना उन्हें दुख दे रहा हो ।

“नहीं, मुझे यहाँ आए काफी देर हो गयी है ! आप किसी से भी पूछ लो !”

“ चलो ठीक है जब जाना है तो ” और वे उठकर बाहर तक आ गए । उनके प्रेम और स्नेह की तपिश से मन पिघल सा रहा था न जाने यह कैसी आग है कि भीतर ही भीतर जलने लगती है । सच में प्रेम को शब्दों की जरूरत होती ही नहीं यह खुद ही समझ आ जाता है कौन किसे और कितना प्रेम या सम्मान करता है । जैसे ही वो चलने को हुई वे पीछे पीछे आने लगे !

“अभी आप यहाँ रुकिए आप कहाँ जा रहे हैं ?” किसी ने उनको जाते देखकर टोंका ।

“अरे मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ यार ! बस अभी आया।” वहां कई लोग थे और वे सबसे सीनियर सम्मानित व्यक्ति, उनका इस तरह से उठकर आना और बाहर तक छोड़ने जाना कुछ अचरज भरा तो था लेकिन कहते हैं न प्रेम है गर तो सब संभव है और प्रेम पर कोई वश नहीं । प्रेम में कोई छोटा बड़ा या उंच नीच नहीं होता है ।

“हाँ तो क्या कह रही थी फोन पर ? अभी फौरन पाँच मिनिट में आ जाओ ।” बाहर आते हुए वे हल्के से बोले ।

“जी सही तो कहा था ! मुझे बुला लिया और खुद ही चले गए ।”

“लो मैं आ गया, अब कहाँ ले जाओगी मुझे ?” उनके बात करने के ढंग से लग रहा था कि वे बहुत ही संस्कारी परिवार से हैं ।

“वही जहाँ कोई न हो हम दोनों के सिवाय ।” न जाने कैसे यह शब्द उसके मुँह से निकल गए ।

यह बात कहते कहते न जाने कैसे उनके हाथ आपस में टकरा गए और ऐसा लगा कि वे दोनों एक दूसरे के हाथ को पकडे हुए हैं ! मात्र दो सेकिंड में सब घटित हुआ लेकिन अनायास हाथ का हाथ में आना, एक तरह से पूरे शरीर का कम्पित हो जाना ! रोम रोम में अजीब सी सिहरन ! मानों कोई ख़ुशी की लहर बदन में दौड़ रही हो, एक सेकिंड में एक दूसरे का हाथ थामे ही उन दोनों ने कई सदियों को जिया था ! कहते भी हैं न कि पूरी जिंदगी से दो पल का प्यार भरा साथ ही बहुत होता है जीने के लिए ! कितने पुण्यों का उदय हुआ था जो उन्हें दो पल साथ गुजारने को मिले थे ! उनकी सांसें एक होकर एक साथ चली थी और धड़कनें संग संग धड़की थी ! अब उन दोनों ने अपने अपने हाथ अलग कर लिए थे क्योंकि सामने से कोई आ रहा था और ऐसे में वे अपनी शर्म और मर्यादा का आवरण ओढ़ कर चलने लगे थे ! ओह्ह !! यह प्रेम में कैसी मर्यादा ? प्रेम तो ईश्वर का दिया वरदान है जो किसी किसी के नसीब में आता है तो इसमें कैसी शर्म, कैसी हया ? या रब इस दुनिया में प्यार की कोई कदर क्यों नहीं करता ? कोई किसी को हंसता मुस्कुराता क्यों नहीं देख सकता, नहीं अभी हाथ थामे रहो उनके दिलों से यह आवाज आ रही थी ! अभी अलग नहीं होना है ! लेकिन ईश्वर भी बड़ा अन्यायी है जहाँ भी उसे दिखेगा की मोहब्बत बढ़ने वाली है ! वो इंसान को तोडना और दुख देना शुरू कर देता है और हर तरह से रुला देता है तड़पा देता है, सच में प्रेम सच्चे मन का खेल है और इसे सच्चे मन से ही जीता जा सकता है।जहाँ पर चालाकी, स्वार्थ या होशियारी है वहां पर यह चुपके से सरक लेता है ।

“आप क्या सोचने लगी ?”

“कुछ भी तो नहीं ।” उसका दिल अभी भी बहुत तेज धडक रहा था।

“ओके चलो बाय ! सुनो शाम को फंक्शन में जरूर आ जाना और हाँ टाइम से आना वो भी बिना बुलाये यह न हो कि बार बार फोन करके बुलाया जाये ।“

“शाम को आऊं ?”उसने सवाल कर दिया ।

“हाँ बिलकुल,क्या आपका न आने का इरादा है ?”

“अभी तो यहाँ से होकर जा रही हूँ इसलिए शाम को आने का मन नहीं है ।“

“आ जाना प्लीज !” उन्होने हाथ जोड़ते हुए बड़े दया भाव से कहा था, उनकी आँखों में प्रेम छलका पड रहा था ।

ओह्ह इस प्लीज ने यो लगा जैसे जान ही ले ली हो ! अब तो आना ही पड़ेगा ! इतना करुणा भरे मन को कैसे दुखाया जा सकता है ।

“ठीक है मैं आ जाउंगी !” यह कहते ही उनके चेहरे की चमक बढ़ गयी थी ! अलग सी आभा से दमकने लगा उनका चेहरा ! एक हाँ से इतनी ज्यादा ख़ुशी ? शरीर का अंग अंग फड़क रहा था और रोम रोम सिहर रहा था ! ख़ुशी का कोई सागर मन में उमड़ आया था ! इतने बड़े अधिकारी होकर भी उसके सामने इतना दीन होकर बोल रहे थे ।

“सुनो आ जरूर जाना ।“ वे एक बार फिर से बोले ।

“हुंम्म !”

“नहीं ये हुंम्म नहीं चलेगा, आना ही है ।“

अब तो उसने न आने का कोई बहाना सोचा लेकिन उससे पहले ही वे बोल पड़े क्या सोच रही हो आ जरूर जाना, ओह्ह बार बार इस तरह से कह रहे हैं तो जाना तो बनता ही है और जाना भी चाहिए कहाँ किसी को कोई इतना आग्रह से बुलाने वाला मिलता है ! आज के दौर में इतना आग्रह करने वाला कोई कहाँ मिलता है ।

जी ठीक है मैं आने की कोशिश करुँगी, अरे भाई कोशिश नहीं आना ही है, अच्छा भाई ठीक है मैं आ रही हूँ पक्का,, सच में मन में एक हलचल सी मच गयी थी इतना ज्यादा अपनापन ! इतना आग्रह कैसे, क्यों, उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था अभी हम एकाध बार ही तो मिले हैं ! कभी कोई बात भी नहीं की फिर कैसे ये भाव मन में उमड़ पड़े, क्या यह सब प्रकृति रचती है ? क्या सब रब की मर्जी से होता है ? कैसे और क्यों हुआ ? उसे कुछ नहीं पता ? हाँ मन में नई ख्वाहिशे, उम्मीदें जरूर जग गयी थी और मन खिल सा गया ! मानो कोई गुलाब महक रहा हो ! मानो खुश्बूं से सांसे तरबतर हो रही हो !