वेलेंटाइंस डे - 5 Vaidehi Vaishnav द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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वेलेंटाइंस डे - 5

अब तक आपने पढ़ा कि रघुबीर की पोस्टिंग जम्मू में हो जाती है।

अब आगें.....

जनवरी में रघुबीर की पोस्टिंग जम्मू हो गई।
हम दोनों अपनी शादी के दिन गिनते। मैं रघुबीर से कहती अब तो एक महीना ही बचा हैं फिर भी दिन ऐसे जान पड़ते है जैसे दिन न हो आसमान के तारें हो गए ..गिनती खत्म ही नहीं होतीं ।

रघुबीर हंसकर कहते - हाँ क्योंकि तुम हो बेवकूफ लड़की ! तुम्हें गिनती आती भी हैं ..?

मैंने भी मजाकिया अंदाज़ में अपनी एजुकेशन बता दी। अचानक रघबीर गम्भीर हो गए वो कहने लगें - सिया , मेरा पैतृक गाँव हैं , जहाँ दादाजी का ऑफिस हैं। दादाजी स्वतंत्रता सेनानी थे औऱ उनकी इच्छा थीं कि उनके गाँव से हर एक बच्चा भारत माता की सेवा करे। दादाजी की इच्छा थीं कि मैं उस ऑफिस में काम करूँ जो कि मैं करूंगा भी पर....कहकर रघुबीर चुप हो गए।

मैंने पूछा -" पर...??"

रघुबीर ने गहरी सांस लेते हुए कहा - पर यदि मैं नहीं रहा तो तुम मेरा यह काम करोगी।

मैं इस बात पर चिढ़ गई । गुस्से से मैंने कहा - मुझसें इस तरह की फालतू बातें मत किया करों।

रघुबीर ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा - अच्छा बाबा अब माफ़ भी करो , नही करूंगा ऐसी बात।बस मेरी इस बात को याद रखना। इसके बाद रघुबीर जम्मू की जगह के बारे में बताने लगें। हम दोनों अक्सर फोन पर शादी को लेकर बात करतें । दिन बीतते गए औऱ फ़रवरी का महीना भी आ गया। 13 फ़रवरी को रघुबीर का फ़ोन आया। कह रहें थे कि मैं कल आ नहीं पाऊँगा सिया , तुम ही आ जाओ न प्लीज़ !

मैंने भी कोई विरोध नहीं किया औऱ जम्मू जानें के लिए हामी भर दी।

रघुबीर ने कहा - लो जी , पहले ही बता देतीं तो मैं आज से छुट्टी सेंशन नहीं करवाता।

हैरत औऱ ख़ुशी दोनों भाव एक साथ मेरे चेहरे पर आ गए । मैंने रघुबीर से पूछा - तो क्या आप सच में कल आ रहें हैं ..?

रघुबीर ने फिल्मी हीरो की तरह कहा - जी , हम कल आ रहें हैं फिर उन्हीं इश्क़ की गलियों में.. दीदार की आरजू में कट गए दिन इन्तज़ार के...

मैंने फोन रखतें ही यह ख़बर पूरे घर में ऐसे सुनाई जैसे न्यूज चैनल वाले ब्रेकिंग न्यूज़ सुना रहें हों। मैं दौड़कर रघुबीर के घर तक यह महत्वपूर्ण सूचना हाँफते हुए दे आई। रघुबीर के घर वाले मुझें देखकर हँस पड़े। बस इतना ही बोले - पगली !

मैं रघुबीर के आने की ख़ुशी में खुद से ज़्यादा घर को संवार रहीं थीं । उनकी पसन्द के रंग के पर्दे पूरे घर के दरवाजो औऱ खिड़कियों पर सज गए । मार्किट से उनकी पसन्द की फल , सब्जियां , मिठाई सब कुछ मैं खुद लेकर आईं। पूरा घर मैंने ऐसे सजा दिया जैसे दीवाली हो।

मेरी आँखों मे नींद की जगह असंख्य सपने थें। मैंने रात बारह बजे ही रघुबीर को मेसेज कर दिया - हैप्पी वेलेंटाइन्स डे माय लव ,माय वेलेंटाइन ।


क्या रघुबीर का भी रिप्लाई आएगा ?

जानने के लिए कहानी के साथ बनें रहे।