वेलेंटाइंस डे - 3 Vaidehi Vaishnav द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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वेलेंटाइंस डे - 3

अब तक आपने पढ़ा सिया रघुबीर के साथ वेलेंटाइन डे मनाने के लिए जाती है।

अब आगें .....

रघुबीर ने मजाकियां अंदाज़ में कहा - जहाँ मेरे दिल की मलिका जाना चाहें , वैसे हमने तो आज गुज़री महल जानें का सोचा हैं।

मैंने ख़ुश होकर कहा - वाह , प्रेम की निशानी !

प्रेम की एक निशानी लाल गुलाब भी होता हैं , वो तो तुम्हें देना नहीं हैं - हँसकर रघुबीर ने मुझें देखते हुए कहा औऱ कार स्टार्ट कर दी।

कार सुंदर रास्तों से होतीं हुई तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ रहीं थीं। रघुबीर अलग ही अंदाज़ में लग रहें थे। बातचीत में उन्होंने भविष्य की कई योजनाएं बताई। बातों ही बातों में मैंने भी अपनी जम्मू जानें कि इच्छा जाहिर कर दी। रघुबीर ने कहा - अगले साल का वेलेंटाइन्स डे हम वहीं मनाएंगे।

हम लोग गुज़री महल कब पहुँच गए पता ही नहीं चला । क़िले के रास्ते ढ़लान के किनारे एक फूल वाला सुर्ख लाल गुलाबों का गुलदस्ता लिए हुए बैठा था । लाल गुलाब पर पानी की बूंदे सूर्य की धूप से हीरे की तरह चमक रहीं थीं। रघुबीर ने वहाँ से एक गुलाब लिया औऱ फिर बड़े ही अदब से मुझें देतें हुए कहा - " मुझसें शादी करोगी ..?"

हमारे आसपास से गुज़रते हुए लोग ठहर गए । मुझें भी महसूस हुआ जैसे वक़्त ठहर गया हों। अचानक से जैसे मौसम बदल गया , सूरज मद्धम लगने लगा , आसमान सतरँगी हो गया औऱ चारों औऱ ख़ुशनुमा सा नज़ारा...लगा जैसे रघुबीर ने कोई जादुई झड़ी घुमा दी हो। हवाओं में रघुबीर का प्यार घुलने लगा। मन में सैकड़ो वाद्ययंत्र बज उठें।

मेरे चेहरे पर मुस्कान थी औऱ आँखों में नमी । आँखों से आँसू की बूंदे कुछ इस तरह ढुलकी मानो सिप से मोती । मैंने गुलाब लिया और रघुबीर को गले से लगा लिया। रघुबीर जैसा जीवनसाथी नसीब से ही मिलता हैं।

पूरा दिन मैं रघुबीर के साथ रहीं , वेलेन्टाइन्स डे का यह दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत औऱ यादगार दिन था। हर एक लम्हा खुशियों से भरा , प्यार से सराबोर , शहद सा मीठा ।

आज रघुबीर एक नए अवतार में दिखे। लेफ्टिनेंट रघुबीर भार्गव का जो रूप मैं देख रहीं थीं वो शायद किसी औऱ ने कभी न देखा होगा। हमेशा धीर- गम्भीर , अनुशाषित से रहने वाले रघुबीर आज बिल्कुल मजनू से लग रहें थे , जिन्हें प्यार के सिवा कुछ आता ही न हों।

रघुबीर का पहला प्यार माँ भारती हैं । सेना में भर्ती के लिए उनका जुनून किसी सिरफिरे आशिक़ की तरह था। रघुबीर का परिवार चाहता था कि वो इंजीनियरिंग करें पर रघुबीर का लक्ष्य अपनी भारत माता की सेवा करना था औऱ उन्होंने वहीं रास्ता चुना जिसकी मंजिल भारत माता हैं।

रघुबीर की छुट्टियां ऐसे ख़त्म हो गई जैसे गर्मी से पिघलती बर्फ़। विदा लेते रघुबीर की आँखों में पहली बार चमक की जगह सूनापन महसूस किया था मैंने। मैं भी अपनी आँखों को बार-बार झपका रहीं थीं , आँसुओं को छुपाना चाह रहीं थीं। रघुबीर सबसे मिल रहें थे। सभी बहुत भावुक हो गए थे। रघुबीर ने माहौल को हल्का करने के लिए हँसते हुए कहा - अरे ! आप सब तो ऐसे चेहरे बनाये हुए हो जैसे मुझें नहीं अपनी बेटी को विदा कर रहें हो ,मैं जल्दी लौटूंगा।

शेष अगलें भाग में.....

क्या रघुबीर जल्दी ही लौट आएगा ? जानने के लिए कहानी के साथ बनें रहें।