नमो अरिहंता - भाग 3 अशोक असफल द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नमो अरिहंता - भाग 3

(3)

प्रेरणा

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एक औसत लंबाई के पुरुष की अपेक्षा मामाजी जरा नाटे कद के श्यामवर्णी व्यक्ति थे। वे उत्सवधर्मी और धार्मिक प्रवृत्ति के भी खूब थे। संतान के रूप में उनकी मात्र दो बेटियाँ थीं, जिनके विवाहोपरांत अब वे सपत्नीक निश्चिंत जीवन जी रहे थे। कि अब कोई जिम्मेवारी, कोई खास दारोमदार न था उन पर।

पुरोहिताई नहीं करते थे, फिर भी नगर की सभी जातियाँ ‘पालागन’ करती थीं उन्हें। कि कनागत (पितृपक्ष) में पूरी पंद्रहिया चूल्हा नहीं जलता उनके यहाँ! और एक खास बात और कि मामाजी चाहे पितृपक्ष में न्योता जीमने जायें या तेरहवीं-ब्याह भोज अथवा भागवत-भंडारे में, हमेशा एक नई और धरौवल पोशाक पहन कर जाया करते थे। उसे रोजमर्रा में कभी इस्तेमाल न करते वे! कहने को पियून थे पर झक्क सफेद कुर्ता-पायजामा और कभी-कभी श्वेत ही पेंट-शर्ट पहनते, जो कि उनकी वर्दी भी बन जाती। रोब ज़माने के लिए वे सामाजिक उत्सव, विवाह आदि में खर्च के मामले में कभी पीछे नहीं हटते। उनकी बैठकिया में भगवान् के कितनी ही मुद्राओं-वेशभूषाओं और लीलाओं वाले पोस्टर लगे होते। और बैठक यूं लगती मानो किसी सिनेमा हॉल का वेटिंग रूम हो, गोया कोई धार्मिक फिल्म लगने वाली हो।

स्वभावतः सात्विक वृत्ति की मामीजी, पूर्णतः अनुसूया आदि की औतार, मामाजी की आज्ञा में सदैव तत्पर रहतीं। जबकि खाना साँझ के साँझ बनता उनके यहाँ!

तब भी वे दिन भर नाचती ही रहतीं। मसलन, गर्मियों के बाद उन्होंने जो सिंवइयाँ बँटी थीं वे एक दिन धूप में चादरे पर सूखते वक्त बेमौसम बरसात में भीग गईं। फिर अक्सर उसके बाद यह हो कि दो-चार दिन में जैसे-तैसे सिंवइयाँ सूख पातीं, और बादल की चौकसी करते-करते दुपहर में उनकी आँख लग जाती तो बूँदाबाँदी हो उठती और दौड़ते-दौड़ते सिंवइयाँ भीग जातीं। और फिर जैसे-तैसे वे उन्हें फिर सुखा पातीं आठ-दस रोज में, कभी पंखे के नीचे, कभी बरसाती धूप में कि अचानक आँख लग जाने पर देर से बिल्ली की तरह ताकती बदली झपट्टा मारकर फिर उन सिंवइयों को भिगा जाती! फलतः अंततः परिणाम बहुत भयंकर सिद्ध हुआ, सिंवइयों में फपूँदी लग गई।...

और सिंवइयाँ ही क्या उनके यहाँ अक्सर यही होता कि मामाजी किफायत के चक्कर में थोक के भाव विपुल मात्र में सब्जी और नींबू, टमाटर, हरी मिर्च, अदरक वगैरह ले आते। वह लाख जतन (गीले कपड़े में लपेट कर रखने, खुले में ठंडी आलमारी में रखने आदि) के बावजूद सड़ जातीं। गुड़ इतना भर लेते कि दो साल तक चले! परिणामस्वरूप वह भी बरसात के दिनों में घड़ों में रखा-रखा हलुआ हो जाता।

नवरात्र पर दोनों प्राणी पूरे नौ दिन का व्रत रखते थे। और फलाहार के लिये मामाजी नवरात्र से दो-चार दिन पूर्व ही मंडी की बोली से एक डलिया कच्चे केले चुका लेते। वे आठ-दस दिन में लगभग एक साथ पक जाते! सो पंचमी, छठवीं तक अधपके -कच्चे के लों का फलाहार करने के उपरांत अष्टमी, नौमी को उन्हें बहुधा सड़े हुए केलों का फलाहार नसीब होता।

मूल बात यह कि इसी जीवनचर्या के चलते आनंद बिहारी सप्ताह में तीन व्रत करना सीख गये थे। सोमवार, गुरुवार और शनिवार! क्योंकि खाना तो रोज ही शाम को मिलता था! बासी रोटी वे भले सुबह नाश्ते में खा जाते, जिसके वे बचपन से आदी रहे आये थे। अब सप्ताह में तीन व्रत रखने में कौन-सा हर्ज था! एक टाइम वैसे भी मिलता एक टाइम व्रत में भी अनाज खाया जाता। जरा नमक-मिर्च का परहेज कर लेते। दूध-दही या शक्कर जैसी वस्तुओं के साथ सप्ताह में तीन दिन पराँठे खाने को मिल जाते ऊपर से एक सप्ताह में तीन-तीन देवता सध रहे थे।

मामाजी जन्माष्टमी खूब धूम-धाम से मनाया करते थे उन दिनों। मामी ठाकुरजी के सिंहासन और मूर्तियों को हफ्तों पूर्व से चमकाना शुरू कर देतीं। दर्जी से कोरे कपड़े का कतरन माँग कर भाँति-भाँति के रंगों ओर डिजाइनों की पोशाकें सिल लेतीं। गत्तों-पन्नियों और रुई आदि से विभिन्न तीर्थों, अवतारों और लीला आदि की झाँकियाँ बना लेतीं। इस काम में मामाजी तो भरपूर साथ देते ही थे, कि वे रात-रात भर बैठकर, रच-रचकर झाँकियाँ सजाया करते इस बार आनंद के हाथ भी इस पवित्र कार्य से कृतकृत्य हो सके थे।

उन्होंने अपनी कल्पना और दृश्यानुभव के आधार पर कई एक सुंदर-आकर्षक भावपूर्ण मंडप बनाये। जन्माष्टमी के रोज शाम से इन झाँकियों को लंबे आँगन में दोनों तरफ सजा दिया गया। बीच में एक कृत्रिम वन-वीथी बना दी गई थी, भीतर के कमरे के दरवाजे में कन्हैयाजू का पलना डाल दिया गया था।...

मामी सुबह से ही रसोई में जुटी थीं। आज पाँच-पचास आदमियों का खाना जो था! और कम-से-कम सौ हाथ तो प्रसाद के लिये पसर ही जाने थे। इसलिये ढेर सारी पंजीरी, ढेर सारा पंचामृत बनाना पड़ा-सो अलग! फिर जन्म के बाद रात भर जागरण कीर्तन चलेगा ही। फुरसत नहीं थी किसी को न आनंद को, मामाजी को, न मामीजी को।

नौकरी का एक रूटीन बन गया था। मुनीमी-मुड़िया सीखने में भी उन्हें कोई ज्यादा वक्त न लगा। उसके बाद वह कोई पर्वतारोहण अभियान न था जो रोज नये-नये मंजर पेश आते। या कि ठेके पर मिला काम भी न था, और न कोई सरकारी महकमा जो अतिरिक्त श्रम, अतिरिक्त आमदनी, यानी जितना करलो, उतना भरलो का सिद्धांत लागू होता।... अगर उसकी जगह गोली-बिस्किट की भी एक दुकान होती तो कहीं ज्यादा खींचती! इसलिये आनंद का मन इस पोंगापंथी प्रदर्शन में उसी तरह रमने लगा था, जैसे पढ़ाई के दिनों में संघ की गतिविधियों में रमा रहता।

वैसे, ये धार्मिक आयोजन इस नगर में कुछ अधिक ही होते। और हिंदू और जैनियों के मध्य इनके प्रदर्शनों की होड़ मची रहती। कि अगर आपने डोल ग्यारस एक कान फोड़कर मनाया तो हम क्षमावाणी दोनों कान फोड़कर मनायेंगे। और इसी प्रतिस्पर्धा में इधर गणेशोत्सव की तैयारियाँ चलतीं, उधर पर्यूषण पर्व की धूम मच उठती।

जैनागम में यों तो पर्यूषण पर्व वर्ष में तीन बार मनाये जाने का विधान है। किंतु समाज द्वारा आमतौर पर धूम-धाम के साथ एक बार ही भाद्रपद में शुक्ल पक्ष पंचमी से अनंत चतुदर्शी तक मनाया जाता है।...

आनंद के लिये कौतुक की बात यह थी कि उनके लिये इस बार नया-नया था सब कुछ! पर्यूषण के आरंभ होते ही प्रातःकाल से ही जिनालय में पीला दुपट्टा ओढ़े नर-नारियों का ताँता लग उठा था। सौभाग्य से आनंद का जाना-आना था ही उधर।

सो लाउडस्पीकर से गीत की तरह गूँजता मंत्र ‘णमो अरहंताणम्’ उन्हें कंठस्थ होने लगा था।

स्वभावतः वे श्रद्धालु और भक्तिभाव से परिपूर्ण हृदय वाले एक परम् जिज्ञासु युवा थे। किसी भी बाह्य क्रिया की उनके अंतर्मन पर तीव्र प्रतिक्रिया होती और वे उसे अपने हृदय में न छुपा पाते। सो, एक दिन सेठानीजी से उन्होंने कहा, ‘आजकल मंदिर में बहुत अच्छा लगता है।’

उस वक्त अपनी सरौतिया से सुपारी कतरती हुई सेठानी का हाथ यकायक थम गया गोकि यह प्रशंसा उन्हें अच्छी लगी थी! पर गुमानपूर्वक बोलीं, ‘यहाँ क्या अच्छा लगेगा! सिहोनिया जाकर देखो, जहाँ चातुर्मास चल रहा है।’

‘चातुर्मास!’ आनंद उलझ गये।

‘जब साधु लोग वर्षा काल में आधे आषाढ़ से आधे कार्तिक तक विहार-भ्रमण नहीं करते जहाँ पहुँच जाते हैं, वहीं पूरे चार महीने गुजार देते हैं। उस स्थान के भाग जाग जाते हैं चातुर्मास में।’ सेठानी ने कहा।

‘फिर इस बार गोहद क्यों नहीं आये वे लोग?’ आनंद ने पूछा।

‘आते थोड़ी हैं’ सुधा हँसी। वह दोनों बहनों से छोटी और सेठ दंपत्ति की अंतिम संतान होने के नाते कुछ ज्यादा ही लड़ैती है। उसने आनंद का जरा-सा मजाक उड़ा दिया, ‘अरे-आप तो कुच्छ भी नहीं जानते पंडितजी!’

‘चऽल! उन्हें क्या पता?’ सेठानी ने झिड़का! फिर आनंद से मुखातिब हुईं, ‘विहार करते-करते साधु वर्षा ऋतु से पूर्व जिस स्थान पर पहुँच जाते हैं, वहाँ से चार महीने नहीं हटते। चाहे वह घनघोर जंगल हो, चाहे समुद्र-नदी का किनारा।’

आनंद आश्चर्यचकित रह गये, ‘इतनी अनिश्चित यात्रा करते हैं जैन मुनि! पड़ाव तक सुनिश्चित नहीं होता। कि जहाँ’

‘हाँ!’ सेठानी ने प्रमाण दिया, ‘एक बार यहीं रतवा की डांग (काली सिंध का चट्टानी बीहड़ जहाँ पर रतनगढ़ की माता और कुँवर महाराज का थान है।... और आल्ह खंड में वर्णित देवगढ़ का किला मौजूद है, जहाँ महाभारतकालीन पात्र अश्वत्थामा आज भी विचरण करते पाये जाते हैं, गोया वे अमर हैं और उनकी भौंहें धरती को झाड़ती हुई चलती हैं!) में एक मुनि महाराज ने अपना आसन जमा लिया। एक दिन, दो दिन, चार दिन। आखिर आसपास के लोगों को खबर मिली कि एक साधु डांग में रुके हैं। उन्होंने जाकर प्रार्थना की कि महाराज हम जैन तो नहीं हैं, फिर भी आप हमारे गाँव चलिये, जो सेवा धरम बनेगा, करेंगे। मुनि महाराज ने कहा, जैन-अजैन का सवाल नहीं है भाई, वर्षा ऋतु लग गई है अपना नेम तोड़कर अब तो हम यहाँ से कहीं न जायेंगे।

लोगों ने कहा, इस इलाके में घंसू बाबा का बड़ा आतंक है। पास में ही रतनगढ़ की माता हैं। वह मंदिर पर आता रहता है। पुलिस-भय से मुक्त है ये ऐरिया घंसू बाबा की शरण-स्थली है।

पर मुनि महाराज नहीं माने। वे बोले, डाकू साधू से क्या लेगा! और लेगा तो उसका कल्याण हो जायेगा, क्योंकि साधु के पास देने के लिये ज्ञान के सिवा और कुछ नहीं होता।.....

लोगों ने कहा, आपकी बात नहीं है महाराज! आपके दर्शन को, सेवा को जो जनता आयेगी, वो लुटपिट जायेगी।

इस पर मुनि महाराज बोले, जो सच्चे मन से आयेगा उसका बाल भी बाँका न होगा। काल भी लौट जायेगा उसके द्वार से।’

सेठानी थम गईं।

‘फिर?’ आनंद विस्मित थे।

‘फिर क्या’ सेठानी का चेहरा दंभ से चमक उठा, ‘वो डाकू भी महाराज की शरण में आके बैठ गया। प्रवचन सुनने लगा। वहाँ डांग में चमन बरस उठा था उस चातुर्मास में। लश्कर-ग्वालियर-मुरार, सेंवढ़ा, दतिया तक के सेठियों ने बड़े-बड़े इंतजाम कराये, खाने-पीने, ठहरने के । मौ से बिजली तक डलवादी डांग में! डाकू ने जिम्मा लिया सबकी सुरक्षा का।’

‘और पुलिस को पता चल गया, तो भी एनकाउंटर नहीं हुआ!’ आनंद को पिता की वर्दी याद हो आयी।

‘क्यों होता!’ सेठानी तपाक् से बोलीं, ‘जहाँ मुनि महाराज वास करते हैं, वहाँ तो सिंह-हाथी, बिल्ली-चूहा, मेंढक-सर्प जैसे घोर जाति विरोधी जीव भी बैर मुक्त हो जाते हैं।’

आनंद सुखद-आश्चर्य से भर उठे। उन्होंने मान लिया कि पिताजी की दस्युदल से मुठभेड़ उस चातुर्मास में न हुई होगी! उन्हें अच्छा लग रहा था सब कुछ।...

जिनालय के गुंबद को बिजली की झालरों से सजा दिया गया था। मंदिर में अनेक कार्यक्रम-प्रतियोगिताएँ आदि चलाये जा रहे थे। तब ‘एक मिनट’ (भाषण माला प्रतियोगिता) में आनंद को जज बना दिया गया था। इसमें कई छात्र-छात्रओं ने भाग लेकर अत्यंत ओजस्वी वक्तव्य दिए।

पर प्रीति के भी मुकाबले में आनंद को अरुण युगबोध नामक एक चौदह वर्षीय बालक का वक्तव्य बहुत पसंद आया। कि जिसने बिना हिचके , बिना अटके ओजपूर्ण वाणी में अत्यंत सार्थक यह वक्तव्य दिया-

‘आदरणीय गुरुजन, उपस्थित महानुभाव एवं मेरे प्रिय साथियो!

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध आदि विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के प्रणेताओं व महापुरुषों ने हिंसा, क्रूरता, असत्य, क्रोध, द्वेष व अन्य जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा पहुँचाने को गुनाह बताया है व अहिंसा, दया, क्षमा, सत्य, करुणा आदि को धर्म बताया है। उन महापुरुषों ने न केवल मांसाहार तथा मादक द्रव्यों के सेवन की निंदा की, बल्कि सब जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों के बीच दया व करुणा-पूर्ण व्यवहार की शिक्षा दी।...

किंतु हमने उसे भुला दिया और आज ऐसे विनाशकाल में प्रवेश करते जा रहे हैं जिसमें पृथ्वी के रक्षाकवच ओजोन के क्षय, जंगलों की सफाई, जीव-जंतुओं की हानि आदि से भयानक पर्यावरण असंतुलन पैदा होकर पृथ्वी के सुरक्षित जीवन पर ही बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया है। अतः मनुष्य मात्र की भलाई इसी में है कि हम उन दिव्यात्माओं के वचनों को एक बार फिर अपने मन में धारण करें और परस्पर रक्षा के मार्ग का अनुसरण करें।’

इसके बाद खूब तालियाँ बजीं और थोड़ी देर रिजश्ल्ट शीट पर लिखा-पढ़ी करने के बाद आनंद ने अरुण युगबोध को ‘एक मिनट’ का अव्वल प्रतियोगी करार दे दिया! प्रीति आनंद के इस निर्णय से असहमत हो गई। उसने कहा, ‘मुझे अपने हारने का गम नहीं है, पर तुम्हारी नीर-क्षीर-विवेक बुद्धि पर तरस आता है।

कि तुम यह भी न जान सके कि अरुण किस तरह रटा-रटाया भाषण बोल रहा था कि अरुण ने कई वक्ताओं की उत्तम शैली का अभ्यास कर-करके , दर्पण के सामने खड़े हो-होकर इस भाषण को तैयार किया था।’

‘इससे क्या,’ आनंद मुस्कराये, ‘तुम्हारे अहं को चोट लगी, न!’

‘क्या, तुम यही चाहते थे?’ उसने दुःखी स्वर में पूछा।

आनंद चुप रह गये और सोचने लगे कि वे क्या चाहते हैं? आगे से उन्होंने किसी भी प्रतियोगिता का ‘जज’ होना स्वीकार न किया। कुढ़कर प्रीति ने भी मेंहदी रचाओ प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया। किंतु अगले दिन जैनोदय सेवा संगठन द्वारा आयोजित फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता में वह सम्मिलित हुई और अव्वल स्थान पा गई।

ईनाम लेकर मंच से उतरने के बाद वह सीधी आनंद बिहारी की कुर्सी के पास जा पहुँची। उन्होंने अपनी खुशी जाहिर की, ‘कांग्रेच्युलेशंस ऑन योर सक्सैस!’

‘थैंक्यु!’ प्रीति आँखें नचाकर मुस्कराई, ‘कैसी लगती हूँ!’ उसे तसल्ली न हुई थी।

‘बहुत खूब’ आनंद ने निश्छल मन से कहा।

इस घटना से उन लोगों में लगभग सुलह हो गई। जिसके परिणामस्वरूप नसियाजी पर होने वाले नाटक में आनंद को देर रात तक बैठना पड़ा।

इसमें प्रीति ने एक ऐसी आर्यिका का रोल किया था, जो बचपन में ही अपने केशलोंच कर जैन धर्म की दीक्षा लेकर साध्वी बन गई थी। किंतु अथातो ज्ञान जिज्ञासु होने के कारण आश्रम के तीव्र विरोध के बावजूद पढ़ती रही। कि उसने दर्शनशास्त्र में एम.ए. ही नहीं किया ‘आचांग सूत्र में नीतिशास्त्र’ टॉपिक पर पीएच.डी. भी की और उसके बावजूद सांसारिक पद-प्रतिष्ठा के लोभ से कोसों दूर रहकर, अप्रचारित रहकर जैन धर्म की अनुकरणीय सेवा की तथा आजन्म आत्मसाधना में रत् रहते हुए खड़गासन से मुक्ति प्राप्त की।

प्रीति के इस रोल से आनंद के मन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। एक ही वस्त्र (श्वेत साड़ी) में लिपटा उसका दिव्य मुख वे भुला नहीं पाये। कि यह चरित्र उनके मन में पल रहे अध्यात्म के बीज को कालांतर में वृक्ष में बदलने का एक बहुत बड़ा हेतु सिद्ध हुआ। वे खोये-खोये से रहने लगे। प्रतिदिन सूर्योदय पूर्व शैया पर पद्मासन लगाकर विचारते, कोऽहं को मम धर्म (मैं कौन हूँ, मेरा धर्म क्या है?), कि अनादिकाल से भ्रमण करते-करते यह धर्म मुझे मिला मनुष्य योनि में अवतरित होने से अतः प्रमाद छोड़कर बड़ी सजगता से, बड़ी सावधानी से इस दुर्लभ धर्म का पालन करना होगा। सांसारिक विषय-वस्तुओं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध) से दूर पंच महाभूतों (काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह) को जीतना होगा। कि इस स्थूल शरीर से श्रेष्ठ इंद्रियाँ और इन अत्यंत बलवान इंद्रियों से श्रेष्ठ जो महाबली और अत्यंत चंचल मन है कि जिसकी गति का कोई माप नहीं, से श्रेष्ठ बुद्धि और इससे भी श्रेष्ठतम अत्यंत सूक्ष्म जो आत्मा है- उसे पाने के लिये मैं बुद्धि द्वारा मन को वश में करके इस कामरूप दुर्जेय शत्रु को मार डालँगा।

पर्यूषण का समापन अनंत चतुर्दशी पर हुआ था। सेठजी वैसे तो किसी धार्मिक प्रदर्शन के झमेले में नहीं पड़ते थे, किंतु इस बार लॉटरी सिस्टम द्वारा उनका नाम ‘इंद्र’ बनने के लिये निकल आया था। फलतः उन्हें दुपट्टा ओढ़कर और सिर पर मुकुट बाँधकर प्रतिमाओं को लेकर हाथी पर बैठना पड़ा था। हाथी के इस होदे पर उनके साथ उनका परिवार भी चढ़ा दिया गया था। हाथी के पीछे नर-नारियों का झुंड तथा आगे बैंड तथा सबसे आगे आयोजन समिति का बैनर था।

यह रथ यात्रा गोहद के मुख्य बाजारों से होती हुई जब नसियाजी पर आई तो एक विशाल सभा में बदल गई। मंदिर के प्रांगण में एक विशाल पंडाल बना हुआ था। मंच पर आनंद सहित प्रमुख गणमान्य अथिति और जैन समाज के मुखिया विराजमान थे। माइक थामे आयोजन समिति के अध्यक्ष बैंड-बाजों के शोर-शराबे के बीच महावीर स्वामी आदि तीर्थंकरों की जय-जयकार करवा रहे थे। हर्षातिरेक में झूमते नर-नारी पंडाल के फर्श पर अपना-अपना स्थान बनाते जा रहे थे। अधिकांश जैन धर्मावलंबियों ने उस दिन अनंत चतुर्दशी का व्रत धारण किया हुआ था। उनके ज्योतिपुंज मुख यों चमक रहे थे मानो सैकड़ों सूर्य एक साथ उदित हो रहे हों, या कि अगणित पूर्ण चंद्र एक साथ नीलाकाश में अपनी छटा बिखेर उठे हों! मंच के आगे स्थित एक ऊँची मेज पर एक चौकी धर दी गई। सेठजी हाथी से उतर कर इसी मेज के पीछे बिछी कुर्सी पर आ विराजे। मंदिर का युवा पुजारी, जिसने उघारे बदन पर पीला दुपट्टा ओढ़ रखा था, मंत्र जाप करता हुआ भगवान् को चाँदी के थाल में कंधे पर लेकर मेज के समीप आ गया। तब एक पुरोहित ने वह थाल थाम लिया और पुजारी ने वह लगभग चार किलोग्राम पीतल की अनंत नाथ भगवान् की मूर्ति बड़े श्रद्धा भाव से चौकी पर प्रतिष्ठित कर दी। फिर सेठजी, उनकी बेटियाँ और सेठानी ने अष्ट द्रव्य, चौदह प्रकार के धान्य, चौदह प्रकार के पुष्प और चौदह प्रकार के फलों से भगवान् की पूजा की। पुरोहित ने इस बीच ‘ऊँ नमः अर्हते भगवते त्रौलोक्यनाथाय शेषकल्मषाय दिव्यते जोमूर्तये अनंततीर्थंकरायअनंतसुखप्रदाय नमः’ आदि मंत्र पढ़े।

फिर सेठजी ने 14 प्रकार के सूत से निर्मित, 14 गाँठों वाले, चंदन, के सर और कपूर से रंगे जनेऊ का मंत्रेच्चार के मध्य पूजन कर उसे अपने गले में धारण कर लिया। राखी कान में बाँध ली। और ‘ॐ ह्रीं अर्हं नमः सर्व कर्मबंधनविनिर्मुक्ताय अनंततीर्थंकराय अनंतसुखप्रदाय स्वाहा’ मंत्र जाप के साथ पुराना जनेऊ उतार दिया।

तत्पश्चात् कई वयोवृद्ध एवं युवा मुखियों ने 14 जलधारा, 14 तिलक, 14 मुट्ठी चावल, 14 पुष्प, 14 सुपारी, 14 पान और धूप आदि से भगवान् की पूजा की।

सेठजी ने देवशास्त्र और गुरु की पूजा कर 14 सौभाग्यवती स्त्रियों को 14 प्रकार के फल भेंट किये। फिर सेठजी जो कि इंद्र थे ने अपने अदृश्य 108 गणधरों को आदेश दिया कि भगवान् के जलाभिषेक हेतु पवित्र नदियों, सरोवरों, और समुद्र से 14 प्रकार के जल भर लायें, ऐसा सुनकर मंदिर का पुजारी एक बड़ा कलश अपने कंधे पर रख लाया, जो उसने चौकी के समक्ष मेज पर रख दिया। तब सेठजी और अन्य प्रमुखों ने पुरोहित द्वारा किये गये गगन भेदी मंत्रेच्चार के साथ भगवान् का मस्तकाभिषेक सम्पन्न किया। इस अवसर पर समस्त नर-नारी उठकर खड़े हो गये थे। आनंद सहित मंचस्थ सभी महानुभाव मंच से उतरकर नीचे आ गये थे। एक विकट रोमांच था, कि उपस्थित जनसमुदाय कलयुग को लांघकर सुखमा-दुखमा नामक काल में प्रवेश कर गया था।

आनंद के मस्तिष्क में जैसे बिजली कौंध रही थी या कि भयंकर बादलों की गड़गड़ाहट मची थी। सुधबुध-हीन हुए जा रहे थे वे, कि जैसे काल का लोप हो गया था! जबकि इधर श्री जी (भगवान् अनंतनाथ) की वापसी के लिये बोली लगाई जा रही थी।

‘1001 एक हजारएक! 1001 देखो भई ऽऽ!’ संयोजक माइक पर चीख रहा था, ‘श्री जी को यथास्थान तो पहुँचाओ अब! पहली बोली एक हजार एक है! सिर्फ तीन तक बोलेंगे।’

सेठजी को कोई रुचि नहीं थी कि फिर से बैठें हाथी पर और पुराने मंदिर पर पहुँचाकर आयें प्रतिमाओं को! उन्हें प्रदर्शन से बड़ी चिढ़ थी। देना है तो एक-दो हजार यों ही दे देंगे। पर सेठानी उन्हें प्रेरित कर रहीं थी कि ‘अब पीछे क्यों हटें जी जब लेकर आये हैं भगवान् को तो वापिस भी हमीं पहुँचायेंगे!

संयोजक बोल रहा था, ‘हाँ भई! महिला समुदाय में से कोई बोली लगाना चाहे तो बेहिचक किसी बच्चे से कहलवादें! भगवान् सब में हैं- हाँ भई, एक हजार’

और सेठानी को लगा कि रेल छूटी जा रही है! वे खुद ही खड़ी हो गयीं, ‘दो हजार!’

सब खुशी से चौंक गये। अब और कोई ऐसा कहाँ था समाज में कि इतनी ऊँची रकम पर पहुँचता या उनकी तौहीन करने की सोचता! सो बोली-दो हजार एक, दो तीन! कर समाप्त कर दी गई।

और सेठजी एक बार फिर किंतु इस बार बेमन हाथी के होदे पर सवार हो गये। उनके आगे सिंहासन पर ‘श्री जी’ और पीछे सेठानी और तीनों पुत्रियाँ विराजमान थीं।

आनंद को सेठानीजी का यह गुरूर अच्छा नहीं लगा। अगले दिन उन्हें मिल के ऑफिस पर प्रीति का फोन मिला।

हेडमुनीम उस वक्त गोदाम वाले ऑफिस में था।

प्रीति ने पूछा, ‘आनंद! तुम्हें कल कैसा लगा?’

‘अच्छा ही लगा।’ उनके स्वर में कुछ अन्यमनस्कता-सी घुली थी।

‘फिर आप वहाँ क्यों नहीं आये?’

‘कहाँ?’ आनंद को ध्यान नहीं रहा।

प्रीति ने याद दिलाया, ‘जब हम ‘श्री जी’ को वापस पहुँचाने पुराने मंदिर गये।’

‘दुबारा क्या करता!’ वे निरुत्साहित-से बोले।

‘क्यों? क्यों नहीं करते! हम तो आपके लिये कहीं भी पहुँच जायें!’

आनंद चुप!

‘हेल्लो ऽऽ!’

‘जी सुन रहा हूँ।’

‘फिर बोले क्यों नहीं?’

‘’........”

‘गुस्सा हो क्या?’

‘नही।’

‘तो? आये क्यों नहीं?’

‘’....”

‘बोलो!’

‘यों ही।’

‘तबियत खराब थी?’

प्रश्नावली से आनंद घबरा गये, ‘नहीं-नहीं’

‘तो फिर?’ प्रश्नावली थमी नहीं।

वे चुप्प!

‘तुम्हें शोभायात्रा जँची नहीं?’

‘नईं भई, वो बात नहीं है,’ कुछ रूखे हो गये, ‘आप लोगों का दुबारा हाथी पर बैठना अच्छा नहीं लगा मुझे।’

‘अच्छा?’ प्रीति को जैसे कुछ समझ न आया, बोली, ‘तुम यहाँ आ जाओ।’

‘यहाँ मुनीमजी नहीं हैं।’ आनंद ने बताया।

‘तो फिर ठीक है, मैं वहीं आ जाती हूँ’

और लाइन कटने पर आनंद ने भी चोंगा रख दिया।

उनके यहाँ एक मोपेड थी। इसी को तीनों बहनें समय-समय पर इस्तेमाल कर लेती थीं। घर से मिल कोई दो-ढाई किलोमीटर की दूरी पर था। आनंद ने अपनी कलाई घड़ी देखी, वही पुरानी हेनरी सेन्डोज, जो स्वर्गीय पिताजी पर हुआ करती थी। अब यह घड़ी उन्होंने प्रीति के इंतजार की बेचैनी में देखी या हेडमुनीम के आजाने की आशंका में यह उन्होंने अपने मन से नहीं पूछा, गोकि घड़ी न देखते रहते तब भी प्रीति आती ही और देखते रहे, तब भी वह आ ही गई थी, ठीक छठवें मिनट पर।

उसने मोपेड स्टेंड की ओर गेट पर ही चहकी, ‘देखी, मेरी ड्राइविंग! कितना फास्ट चलाती हूँ।’

फिर कमरे में आकर गद्दे पर बैठती हुई बोली, ‘आनंद तुम कुछ सीरियस हो?’

‘कौन-मैं? नहींऽतो!’ आनंद जैसे चौंके ।

‘बाहर कितना बढ़िया मौसम है डैम से फुहारें उड़ रही थीं।’

‘वो तो प्रत्येक जल-प्रपात पर उड़ती हैं पानी ऊँचाई से गिरता रहता है, न! वहाँ झाग भी तो उठता रहता है ढेर सारा’

‘अच्छा, ये तो बताओ, तुम कल से उखड़े-उखड़े क्यों हो?’ प्रीति फिर उसी विषय पर आ गई।

आनंद ने गौर किया-वह पिंक कलर का सूट पहने थी। गद्दे पर बायीं ओर झुककर बैठने से उसकी चुन्नी साड़ी के पल्लू की तरह जमीन तक लहरा रही थी। खुली हवा में चले आने के कारण अब कमरे में तेज पंखा चलने के बावजूद उसके नासापुटों और माथे पर पसीने की बूँदें झिलमिला रही थीं।

‘नहीं बोलोगे?’ गुमसुम आनंद से उसने फिर कहा।

‘आपकी मम्मी का बोली बोलना मुझे अच्छा नहीं लगा था’ स्पष्टवादी आनंद से रहा न गया अंततः।

प्रीति ने कुछ सोचा, फिर बोली, ‘मम्मी बहुत वो हैं हम लोगों को भी अच्छा नहीं लगा। पापा ने घर जाकर कहा, तुम तो यों ही कोरी सेखी दिखाती रहती हो’

‘नहीं, आप धनाढ्य हैं, मान लिया, पर औरों को भी मौका मिलना चाहिये।’ आनंद खुल रहे थे, ‘धर्म पर, संस्थाओं पर भी अगर एकाधिकार हुआ तो फिर मजा ही क्या रहेगा। फिर सबकी भागीदारी का क्या मतलब! पैसे वाले हो तो’

और उनकी बात कट गई, प्रीति बोली, ‘आप सनाड्य हो ना!’

‘हाँ!’

‘सनाड्य तो बड़े धनाढ्य हुआ करते हैं।’

‘नहींऽ’ आनंद ने समझाया, ‘ब्राह्मणों में जो थोड़े धनवान थे, वे ही सनाड्य कहलाने लगे थे, क्योंकि ब्राह्मण एक वृत्तिक वर्ग था। और पहले तो इनकी खूब चली वैदिक युग, उत्तर वैदिककाल तक. किंतु ईसा पूर्व तीसरी-चौथी शताब्दी से इनका पतन आरंभ हुआ, जबकि कर्मकांड लद गया समाज पर। यज्ञ साधारण जन की पहुँच से दूर चला गया। यज्ञादि में पशु बलि के क्रूर तांडव ने मानव मात्र की आत्मा को झकझोर डाला। तब बुद्ध और महावीर का आविर्भाव हुआ और इन महान् आत्माओं ने ब्राह्मण के एकाधिकार से मुक्ति दिलाई धर्म को, कि धर्म आकाश से झरती ओस, चाँदनी और धूप की तरह सबको सहज सुलभ हुआ। दिशाओं से बहती बयार की तरह जन-जन के हृदय में प्रतिष्ठित हुआ फिर कालांतर में शक-हूण, कुषाणों, मुगलों आदि के आक्रमण ने रही-सही कमर तोड़ दी। ब्राह्मण पुरोहिताई छोड़ माँगने-खाने पर उतर आये। कृषि-व्यापार आदि में प्रवृत्त हुए। जो धनाढ्य थे वे भाषायी अपभ्रंश स्वरूप सनाड्य हो गये।’

आनंद चुप हो गये फिर हँसते हुए से बोले-‘धन जब था नहीं तो धनाढ्य कहलाने में लाज लगती होगी। इसलिये सनाड्य कहलाने लगे!’

प्रीति भी मुस्कराने लगी। उसने पहलू बदला और चिहुँक गई, ‘बाप रे! मुनीमजी की साइकिल रखी है, बाहर!’

झेंपते और सकपकाते हुए से आनंद उठकर बाहर आये। हेडमुनीम गोदाम से आकर शायद मिल पर निकल गया था! उन्होंने प्रीति से पूछा, ‘तुमने फोन अपने यहाँ से किया कि सहेली के फोन से?’

‘अपने फोन-ऊपर वाले से!’

आनंद ने आँखें सिकोड़ कर जीभ काटी, ‘बिल्कुल-बिल्कुल, मुनीमजी नीचे होंगे, एक्सटेंशन से सुन लिया उन्होंने!’

‘पक्का!’ उन्होंने एक लंबी साँस ली।

प्रीति बोली, ‘सो, हमें नहीं डर पड़ा किसी का’ किंतु खौफजदा-सी मोपेड उठाकर चली गई।

फिर उस दिन आनंद आँखें चुराते रहे थे और मुनीम उन्हें घूरता रहा था।

और यों तो एक-दो दिन प्रीति भी झेंपी-झेंपी सी रही, पर उसके बाद शीघ्र ही सहज स्वाभाविकता अख्तियार कर ली थी उसने। बचपन से ही पारंपरिक क्षमावाणी पर्व के लिये विभिन्न डिजाइनों के हस्तलिखित कार्ड तैयार करना उसकी विशेष हॉबी रही थी। इस हेतु वह ड्राइंग के कलर ले आती। ड्राइंग शीट्स को स्केल से नापकर कार्ड्स के आकार देती। प्रत्येक कार्ड पर शांत प्रकृति के किसी-न-किसी पक्षी का चित्र बनाती। और कुछ समझ न आता तो अधिकांश कार्डों पर एक छोटा-सा हाथी बना देती। या तीर्थंकरों के रेखाचित्र, जिनके नीचे आमतौर पर ये कैप्शन-‘क्षमावीरां का आभूषण है/ क्षमा प्राणिमात्र का श्रेष्ठ धर्म है/ क्षमा हमारे अंतर्विरोधों को नष्ट कर देता है/ मन में क्षमा रूपी धर्म-दंड धारण करने के बाद हमें बाह्य अस्त्र-शस्त्रादि की आवश्यकता नहीं होती/ क्षमा सर्व गुणों की खान है/ क्षमा से मन की भाव-भूमि शुद्ध होती है/ क्षमा से विकास व क्रोध से विनाश की भूमिका बनती है’ इत्यादि लिखकर कार्ड की पलट पर लिखती-‘यदि अकिंचन से जाने-अनजाने में कोई भूल हुई हो तो हे उदारमना! आप मुझे क्षमा करें। मैं शुद्ध हृदय से इस क्षमावाणी पर्व पर अपनी सब प्रकार की त्रुटियों के लिये आपसे क्षमा-प्रार्थी हूँ।...’

-प्रीति जैन।

अमूमन ये उपर्युक्त कार्ड वह नगर भर के जैनसमुदाय को ही नहीं, नगर से बाहर के अपने रिश्तेदारों को भी डाक द्वारा पहुँचा दिया करती थी। स्कूल के दिनों में अपनी सहेलियों और अध्यापक-अध्यापिकाओं में वह क्षमावाणी लेखिका और चित्रकार के नाम से जानी जाती थी।...

सेठ और सेठानीजी उसके इस शौक के मुक्त कंठ से प्रशंसक थे। और बहनों से भी यूँ साल भर भले न पटती हो उसकी, पर इन दिनों में वे भी प्रीति के प्रायः निकट आ जाया करती थीं। कि क्षमा माँगते हुए उसे अनूठा गर्व महसूस होता, गहरा संतोष मिलता। एक अव्यक्त आत्मसुख से उसका चेहरा दिपदिपाता रहता।

मगर इस बार की क्षमावाणी में आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा पर जो कार्ड उसने आनंद बिहारी को दिया उसमें उसने आनंद का ही केरिकेचर बना दिया था। कि जिसमें वे अत्यंत क्रोधातुर मुद्रा में लंबी नाक वाले एक ऐसे कार्टून बन गये थे, जिसे देखकर कोई भी दाँत फाड़े बिना न रहता। और इसके नीचे प्रीति ने लिख दिया था ‘क्षमा बड़ों को चाहिये! है, ना?’

तब यह कार्ड पाकर आनंद खुद भी मुस्कराये बिना न रह पाये थे।.....

प्रीति की यही चुहलबाजियाँ उन्हें अकेले में भी गुदगुदा जातीं। और उनकी स्मृति पर वह लगातार छायी रहती।

(क्रमशः)