पुराना हैंडपंप (भाग-३) - अंतिम भाग Vaidehi Vaishnav द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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पुराना हैंडपंप (भाग-३) - अंतिम भाग

बिहारी की गाड़ी तेज़ी से पेड़ से टकराई जिसके कारण तेज आवाज से आसपास के घरों के लोग जाग गए । बिखरुं जिसका मकान पेड़ के पास ही था , हड़बड़ी में घर से बाहर निकलकर आया। यहाँ -वहाँ नजर दौड़ाने पर बिहारी की कार पेड़ के पास दिखीं । वह अपने बेटों को आवाज लगाता हुआ दौड़ कर पेड़ के पास पहुँचा ।

हरिया ....लाला.... जल्दी आओ ...
डॉक्टर बाबू की गाड़ी पेड़ से जा भिड़ी हैं ...जल्दी आओ...

शोरगुल से बाक़ी घरों के भी किवाड़ खुलने लगे औऱ चंद मिनटों में ही गाँव वालों का हुजूम इकट्ठा हो गया।

बिखरुं के दोनों बेटे हरिया औऱ लाला ने अपनी सूझबूझ से कार का दरवाजा खोला और मूर्छित बिहारी को बाहर निकाला।

अचेतावस्था में ही बिहारी को बिखरुं के घर ले जाया गया। बिखरुं की बिटिया चंपा ने तुरन्त खटिया बिछा दी और टेबल फैन लगा दिया ।
बिहारी को सावधानीपूर्वक खटिया पर लेटा कर हरिया औऱ लाला भीड़ से मुखातिब हो सारा घटनाक्रम सुनाने लगें ।

शांता ताई - " हों न हो इसके पीछे पुराना हैंडपंप ही हैं "

सत्तू काका भी आ गए थे ।
शांता ताई की बात का समर्थन करते हुए बोले - ठीक कहा आपने । मैंने तो पचासों बार इसे उस हैंडपंप पर जाने से रोका पर आज की युवा पीढ़ी किसी की सुनती ही कहाँ हैं ...

भीड़ में उपस्थित सबसे वयोवृद्ध राजहुजुर सिंह बोले - घटना के पीछे की वजह तो डॉक्टर साब के होश में आने पर ही पता चलेंगी अभी व्यर्थ की चर्चा करने से क्या लाभ...?

सभी ने उनकी बात का सम्मान करते हुए हामी भर दी । पर सबके मन में वजह सिर्फ और सिर्फ पुराना हैंडपंप ही था। सब अपने-अपने घर को लौट गए ।

पक्षियों के मधुर कलरव औऱ शिव मंदिर की प्रातः आरती की घण्टा ध्वनि से बिहारी की नींद खुली ।
स्वयं को नई जगह पाकर वह चौंककर उठ बैठा ।

चंपा हाथ में जल का पात्र लिए मुस्कुराती हुई बिहारी की औऱ आई और कहने लगीं - खम्मा घणी सा
बिहारी (सकुचाते हुए) - जी नमस्ते ! मैं यहाँ कैसे...?
चंपा - कल आपकी गाड़ी पेड़ से टकरा गई थीं । बेहोशी की हालत में आपको यहाँ लाये थे । आप तो खुद ही डॉक्टर हैं , फिर भी माँ ने कल आपका उपचार कर दिया था।

तभी चंपा की माँ चाय लेकर वहाँ आई । बिहारी से हालचाल पूछने लगीं ।

अब कैसे हो बेटा ? ( चाय का प्याला बिहारी को देते हुए )

बिहारी - जी अब ठीक हुँ , शुक्रिया आप सबने मेरी बहुत खातिरदारी की, मेरा ख्याल रखा । मुझें बहुत जरूरी काम से जयपुर जाना हैं , मैं चलता हुँ ..
चाय के घूँट समाप्त कर बिहारी अपने घर की औऱ चल दिया । बिहारी को रात की घटना परेशान कर रहीं थीं । अब तक जिसे वो एक मिथक मान रहा था , वह आईने की तरह साफ हो चुका था ।
जल्द ही बिहारी पुराना हैंडपंप से जुड़ी सभी बातों को जानना चाहता था।

गाँव वाले भी कल हुई घटना की वजह जानने के लिए बिहारी का इंतजार कर रहे थें । बिहारी सबसे बचता हुआ अपने घर आ गया। तुरन्त तैयार होकर जयपुर के लिए रवाना हो गया ।

बिहारी कार ड्राइव कर रहा था । उसे अब भी यहीं डर था कि कही पीछे मुड़कर देखने पर उसी महिला से फिर से मुलाक़ात न हो जाए । शिवजी को याद करता हुआ बिहारी जयपुर पहुँच गया , विक्रम को कॉल करके उसका पता पूछा । विक्रम ने लोकेशन व्हाट्सएप कर दी।

बिहारी ने कार वैशाली नगर की औऱ मोड़ दी । कुछ ही देर में बिहारी विक्रम के घर पहुंच गया।

विक्रम पार्किंग लॉट में ही खड़ा था । बिहारी को गले लगाते हुए बोला - क्या बात हैं भाई बहुत जल्दी मेहमाननवाजी का मौका दे दिया ।

बिहारी - कुछ परेशान सा था , अपने भाव को छुपाता हुआ हल्का सा मुस्कुरा दिया।
विक्रम उसे घर के अंदर ले आया। उसने बिहारी का परिचय परिवार के सभी सदस्यों से करवाया ।

बिहारी ने हाथ जोड़कर सबका अभिवादन किया।
कुछ देर इधर- उधर की बातचीत करने के बाद विक्रम बिहारी को अपने रूम में ले गया ।

विक्रम - भाई तेरी शक़्ल बता रहीं हैं कि कल कुछ कांड हुआ हैं , अब जल्दी बता क्या हुआ कल ?

बिहारी ने सारा घटनाक्रम विक्रम को बताया।

बिहारी - बस अब तू मेरी इतनी सी मदद कर दे कि मुझे पुराना हैंडपंप का सारा इतिहास बता ।

विक्रम - वो तो तू नानी की ज़ुबानी सुन ले वो मुझसे ज़्यादा जानती हैं । वो यहीं हमारे साथ रहती हैं ।

विक्रम औऱ बिहारी नानी के रूम की औऱ चल दिए । नानी पीठ को दीवार से टिकाएं अपने बिस्तर पर बैठि हुई थीं ।
बिहारी उनके पैर छूकर बोला - नानी मुझें पुराना हैंडपंप की कहानी सुनना हैं ।

नानी को कहानी - किस्से सुनाने का शौंक था , उत्साहित होकर वे शुरू से पुराना हैंडपंप का इतिहास बताने लगीं ।

बात उन दिनों की हैं बेटा जब अंग्रेजों का शासन हुआ करता था । अंग्रेजों ने भारत में अनेकों नई - नई तकनीक का विकास किया उन्हीं में से एक हैंडपंप भी थीं । चिताणुकलां आमेर का ही गाँव हैं औऱ उस समय तो राजे रजवाड़े ही होते थे ।आमेर रियासत में चिताणुकलां के उधमसिंह सिपहसालार हुआ करते थे । उनकी ही देन थीं वह पुराना हैंडपंप । उस समय जाति-पाती का भेदभाव भी बहुत हुआ करता था । पुराना हैंडपंप सिर्फ संभ्रात वर्ग के लिए ही हुआ करता था , बाकी के लोग जल संकट के समय दूर गाँव जाया करते थे। ऐसे ही एक बार झलकारी जो कि एक निर्धन परिवार की महिला थीं उस पुराना हैंडपंप पर आई , उसने बहुत मिन्नतें की, एक घड़ा जल भरने दो मेरा बच्चा प्यास से व्याकुल हो रहा हैं । लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी ।
उल्टा यह कह दिया - अपने कुँए से पानी लो ।
सूख गया हैं तो तुम्हारी समस्या हैं ।

वह बेचारी घड़ा लेकर पास के गाँव की औऱ दौड़ी । जब तक वह पानी लेकर आई उसके बेटे के प्राण पखेरू उड़ चूंके थे । यह सदमा वह बर्दाश्त न कर सकी औऱ घड़े सहित धड़ाम से गिर गई । माँ की ममता ही थीं कि गिरते ही झलकारी के प्राण निकल गए । उसके बाद से ही झलकारी पुराना हैंडपंप पर दिखाई देने लगीं । धीरे - धीरे लोगों ने वहाँ से पानी भरना छोड़ दिया ।

बिहारी - नानी ,, झलकारी बाई हमेशा ऐसे ही रहेंगी ?

नानी - नहीं बेटा , अगर कोई हिम्मतवाला उससे उस समय पानी मांगें जब वो हैंडपंप पर पानी भर रहीं हो औऱ याचना पर वह निर्विरोध प्यासे की प्यास बुझा दे तो उसकी मुक्ति हो जाएगी ।

बिहारी - धन्यवाद नानी । अब आप सबसे आज्ञा चाहूंगा , जल्द ही फिर आऊंगा कह कर बिहारी ने विदा ली ।

सूर्यास्त होने में कुछ ही समय बाक़ी था । बिहारी चिताणुकलां की औऱ तेज गति से गाड़ी चलाता हुआ जा रहा था । उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे।

संध्या का समय था शिव मंदिर पर आरती की तैयारी चल रही थीं । बिहारी ने कार मंदिर के सामने रोक दी । आरती समाप्ति के बाद बिहारी ने संकल्प लिया कि - हे शिव अगर मेरे भाव सच्चे हैं तो मुझें मेरे कार्य में सफलता मिले । मैं अब तब ही जल ग्रहण करूंगा जब झलकारी बाई मुझें पानी पिलायेंगी ।

कठोर संकल्प लिए बिहारी अपने घर आ गया ।
उसने कमरे में आते ही दरवाजे की कुंडी लगा दी ।
फिलहाल वह किसी से भी बात कर पाने की स्थिति में नहीं था।

बिहारी का कंठ सूखने लगा , अब बिना पानी के रहना मुश्किल हो रहा था। रात के 11 बज रहे थें । बिहारी को झलकारी का बेसब्री से इंतजार था।

रात करीब 12:30 बजे बिहारी घर से निकला औऱ पुराना हैंडपंप की औऱ चल दिया । बिहारी का चेहरा मुरझा गया था । अब तो उसके चलने की गति भी धीमी हो गई थीं । हैंडपंप पर कोई नहीं था । बिहारी सारी रात वहीं इंतज़ार करता रहा ।

गाँव में बिहारी के जल त्याग की बात जंगल की आग की तरह फैल गई। बिहारी को लोग समझाने लगे क्यों अपनी जान जोखिम में डाल रहे हो ?

जब बिहारी किसी से भी नहीं माना तो सत्तू काका ने उसे अंगूर औऱ संतरे देते हुए कहा - जल त्यागा हैं फल नहीं । ये खाते रहो प्यास बुझेगी औऱ एनर्जी बनी रहेंगी ।

रात करीब 1 बजे बिहारी हैंडपंप की औऱ गया । हैंडपंप चलने की आवाज ने बिहारी के शरीर में स्फूर्ति पैदा कर दी , वह तेज गति से हैंडपंप पहुँच गया। वहाँ घूँघट ओढ़े वहीं महिला घड़ा भर रहीं थीं ।

बिहारी महिला के पास जाकर धीरे से बोला - मैं आज अपनी बोतल लाना भूल गया , आप मुझें घड़े से पानी पिला देंगी ?

महिला कुछ नहीं बोली - लगातार हैंडपंप चलाती रहीं । गाँव वाले भी अपने घरों से ये दृश्य देख रहे थें ।

महिला घड़ा लेकर जाने लगीं ।
बिहारी समझ गया की उसका संकल्प पूरा नहीं हो पाएगा । उम्मीद टूटने के साथ ही उसकी शक्ति ने भी जवाब दे दिया ।

माँ - माँ चिल्लाता हुआ वह जमीन पर गिर पड़ा , प्यास से तड़पता हुआ बिहारी अचेत होने लगा।

तभी उसे महसूस हुआ कि किसी ने उसका सिर उठाकर गोद में रख लिया । अधखुली आँखों से बिहारी को धुँधली छबि दिखाई दी । वहीं घूँघट वाली महिला थीं , जो बिहारी के सिर को सहला रहीं थीं , बिहारी के मुहँ को अपने आँचल से पोछ रहीं थीं । उसने अपने घड़े से पानी लेकर अपने हाथ की अंजुली में भरकर बिहारी को पानी पिलाया । बिहारी गटागट पानी पीने लगा । जब वह तृप्त हो गया और उसकी प्यास बुझ गई तो वह हैंडपंप के चारो औऱ बनी मेड़ का सहारा लेकर बैठ गया । उसने देखा पानी का घड़ा तेज आवाज के साथ टूट गया औऱ झलकारी की आकृति विलुप्त हो गई ।।

अब पुराना हैंडपंप बिहारी की तरह सबके लिए सुलभ हो गया था ।

लेखक - वैदेही वैष्णव " वाटिका "
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