पुराना हैंडपंप (भाग -२) Vaidehi Vaishnav द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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पुराना हैंडपंप (भाग -२)

सत्यप्रकाश अपनी आप-बीती को मित्र के साथ साझा करने में सकुचा रहें थे । उन्हें पूरा भरोसा था कि उनकी बात पर सब उनका मख़ौल उड़ायेंगे । मन ही मन उन्होंने यह तय किया - नाहक ही हास्य का पात्र बनने से अच्छा हैं अन्य किसी उपाय के माध्यम से इस पुराने हैंडपंप के गाँव से पिंड छुड़ाना होगा।

अचानक तेजी से एक गेंद सत्तू काका के पास से गुजरी औऱ उनके विचारों की तंद्रा टूटी । वे अतीत की गहरी खाइयों से वर्तमान के धरातल पर आ पहुँचे । सूर्या हाथ में बल्ला लिए उनकी तरफ़ दौड़ता हुआ आ रहा था । उनके नजदीक पहुँचकर तुतलाई बोली में कहने लगा - ताताजी आपतो लदी तो नहीं ?
आप बॉल से डरे तो नहीं ?
देथा आपने मैंने तैसा चौता मारा ।

सत्तू ने उसकी औऱ प्यारभरी निगाह से देखा और हँसते हुए कहा - नहीं बेटे , इस गाँव में ठहर गये ये क्या कम सबूत हैं बहादुरी का की इस मामूली गेंद की चोट से डर जाऊं ।

सत्तू काका अपने घर की औऱ चल दिए ।

संध्या का समय था , गाँव के शिव मंदिर में आरती हो रहीं थीं । घण्टा ध्वनि से वातावरण गुंजायमान हो रहा था । हॉस्पिटल में बैठे शिव भक्त बिहारी यानी बाँके बिहारी मालवीय को दूर से सुनाई देती घण्टा ध्वनि भाव विभोर कर रहीं थीं । एक अद्भुत , सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव करते हुए बिहारी ने मन ही मन संकल्प लिया - हे भोलेनाथ ! कभी तो मुझें अवकाश दिलवाओ ताकि मैं भी आरती में उपस्थित हो सकूँ ।

तभी वार्ड बॉय ने कमरे में प्रवेश किया और बिहारी से कहा - sir एक इमरजेंसी हैं आपको तुरन्त जाना होगा ।

स्टेथोस्कोप को उठाते हुए बिहारी ने कहा - शंकर जल्दी से मेरे जाने का इंतजाम करो ।

डिलीवरी केस था , बिहारी ने तत्काल पहुँच कर मरीज को जयपुर रेफर करने की बात कही ।

हरदयाल मजदूरी करके आजीविका चलाता था । उसके लिए तुरन्त जयपुर जाना सहज नहीं था । बिहारी ने हरदयाल की परिस्थिति को भांप लिया।

हरदयाल के कंधे पर हाथ रखते हुए ,,,,,
बिहारी बोला - चिंता न करो जयपुर तक ले जाने का जिम्मा मेरा।
जरूरी सामान औऱ मेडिकल रिकॉर्ड रख लो ,
मैं गाड़ी लेकर आता हूँ ।

हरदयाल हाथ जोड़कर निःशब्द खड़ा रहा ।
बिहारी उसके दोनों हाथों पर अपनी हथेली रखकर अपनापन जताते हुए वहाँ से तेजी से आगे बढ़ गया ।

कुछ ही समय में बिहारी की गाड़ी जयपुर के सवाई मानसिंह अस्पताल के मुख्य द्वार पर जाकर रुक गई । हरदयाल अपनी पत्नी को सहारा देकर चलता हुआ अस्पताल में दाख़िल हुआ। उसके पीछे ही बिहारी था जो फोन को कंधे औऱ कान के बीच लगाए हुए किसी से बात कर रहा था और एक हाथ में फ़ाइल लिए उसमें से जानकारी दे रहा था।
हॉस्पिटल की सारी फॉर्मेलिटी को पूरा करके बिहारी ने हरदयाल को फ़ाइल सौपते हुए कहा -
अब चिंता की कोई बात नहीं हैं , यहाँ इलाज अच्छे से हो जाएगा । अब मैं चलता हूँ ।

हरदयाल - मैं आजीवन आपका आभारी रहूँगा कहते हुए बिहारी के पैर छूने के लिए झुका ही था कि बिहारी ने उसे पकड़ते हुए कहा - ये आप क्या कर रहें हैं ? यह तो मेरा फर्ज था। आपको कभी भी मेरी जरूरत महसूस हो तो मुझें फोन लगा लीजिएगा ।

हरदयाल दूर जाते हुए बिहारी को नम आँखों से देखता रहा ।

व्यस्तता के लंबे अंतराल के बाद आज शहर में आकर बिहारी को थोड़ी राहत महसूस हुई ।
बिहारी ने हॉस्पिटल से सीधे सरस पॉइंट की औऱ रूख़ किया। कार पार्क करके तुंरत स्टॉल की औऱ कदम बढ़ा दिए , भीड़ को चीरता हुआ बिहारी स्टॉल पर पहुँच गया उसने अपने पसंदीदा पनीर पकोड़े औऱ लस्सी ऑर्डर की ।

पनीर पकौड़े का लुफ़्त लेते हुए बिहारी को उसका पुराना दोस्त मिल गया जो जयपुर में ही रहता हैं ।

हेलो बिहारी...हाऊ डु यु डु !

बिहारी - वैरी वेल, व्हाट अबॉट यू ??
दोस्त - सैम हियर । यार तू तो छुपा रुस्तम निकला
नाराज हुँ तुझसे । जयपुर में हैं और बताया भी नहीं।

बिहारी - जयपुर में होता तो जरूर बताता ।
मेरी पोस्टिंग जयपुर के पास चिताणुकलां गाँव में हुई हैं , आज भी काम के सिलसिले में जयपुर आया था। छुट्टी ही नहीं मिल रहीं वरना तुझसे मिलने कब का ही आ गया होता।

चिताणुकलां का नाम सुनकर विक्रम के होश उड़ गए। तू वहाँ रह कैसे रहा हैं भाई ?

बिहारी हँसते हुए बोला- " जैसे सब रहते हैं "
विक्रम - अबे वो भूतिया गाँव हैं ।
बिहारी - ओह ! तो तू भी दकियानूसी अफवाहों को मानता हैं ।
विक्रम - भाई कसम से ये कोई अफवाह नहीं हैं ।
चिताणुकलां मेरा ननिहाल हैं , बचपन से कई किस्से सुनते आया हुँ ।
बिहारी - क़िस्से ही तो अफवाहों की जननी हैं। किसी ने कोई कहानी बनाई , फिर सदियों तक किसी ने फैलाई । कोई तथ्यात्मक सबूत हैं ?
विक्रम - (हिचकिचाते हुए) नहीं बस बड़े - बुजुर्गों व कुछ दोस्तों से सुना हैं ।
बिहारी - यहीं तो , जब तक खुद आँखों से देख न लो , जांच न लो तब तक सच मत मानो ।
समझे विक्रम द वारियर...

विक्रम - समझ गया बिहारी द साइंटिस्ट...
दोनों मित्र आपस में हँसी ठिठोली करते रहें ।

बिहारी ने घड़ी देखते हुए कहा - ओह नो ,, वक़्त का पता ही नहीं चला 12 बज गए । चल मिलते हैं फिर कभी। अभी के लिए गुड बाय ।

विक्रम - आज रात मेरे घर ठहर जा , सुबह जल्दी चले जाना ।
वैसे भी रात को कभी भूत दिख गया तो आज ही तेरा सच से सामना हो जाएगा - चुटकी लेते हुए विक्रम ने कहा।

बिहारी - अरे नहीं यार , नई पोस्टिंग हैं फिर सरकारी नौकरी । पेशा भी ऐसा हैं की जरा सी चूक औऱ भारी नुकसान।

नजाकत को समझते हुए विक्रम ने कहा - ठीक हैं , पहुँचकर फोन करना।

विक्रम से अलविदा लेकर बिहारी अपने गाँव की औऱ चल पड़ा । सुनसान सड़क , चारों औऱ घने जंगल डरावने लग रहे थें । बिहारी ने म्यूजिक ऑन कर लिया। संगीत लहरियों से वातावरण बदल सा गया।
" मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गयाssss हर फिक्र को धुँए में उड़ाता चला गया "
बिहारी गाने के साथ खुद भी गुनगुनाता हुआ मस्ती में कार ड्राइव कर रहा था। वह कब चिताणुकलां की सीमा में प्रवेश कर गया उसे पता ही नहीं चला । गाँव में प्रवेश पाते ही उसने साउंड सिस्टम ऑफ कर दिया । वह जानता था कि गाँव में सभी जल्दी सो जाते हैं और म्यूजिक नींद में बाधा पहुँचाएगा ।

बिहारी को हैंडपंप चलने की आवाज आई। उसे याद आया कि आज तो पीने का पानी भरा ही नहीं , वह कार को हैंडपंप की औऱ ले गया । उसने हैंडपंप के ठीक सामने कार रोक दी और बॉटल लेकर कार से बाहर आया तो देखा हैंडपंप को एक महिला चला रहीं थीं । बिहारी चुपचाप महिला से थोड़ा दूर उसके ठीक पीछे खड़ा होकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा ।

लगभग 20 मिनट बाद भी जब महिला का घड़ा नहीं भर पाया तो बिहारी हैंडपंप की औऱ आ गया

महिला घूँघट ओढ़े थी इसलिए उम्र का अंदाजा कर पाना मुश्किल था , जिसके कारण सम्बोधित करने में भी समस्या थीं और बिहारी यू भी ब्रह्मचारी स्वभाव का था , वह महिला से बातचीत करने में कतराता था। बिहारी उधेड़बुन में था तभी उसकी नजर घड़े पर पड़ी । आकार के हिसाब से तो घड़े को 5 मिनट में ही भर जाना चाहिए था ।
ये कौन सा साइंस हैं ? यह बिहारी की समझ नहीं आया । तभी उसके दिमाग ने काम किया - अरे इनका घड़ा मिट्टी का हैं और इसमें छेद होगा तभी ये भर रहीं हैं पर ये पूरा नहीं हो पा रहा।

बिहारी महिला से बोला - लगता हैं आपके घड़े में दरार पड़ गई हैं , तभी यह भरता ही नहीं हैं। आप थक जाएगी हैंडपंप चलाते हुए ।

महिला ने बिहारी की बात सुनकर हैंडपंप चलाना बंद कर दिया और घड़ा उठाकर जाने लगीं ।
बिहारी हैरत से देखने लगा - उँगली को होंठ पर रखता हुआ सोचने लगा अगर घड़े में छेद होता तो घड़े से पानी निकलता हुआ दिखता।
खैर जो भी हो पानी लेकर जल्दी से घर पहुँचकर सो जाऊँगा । बॉटल भरकर बिहारी कार में बैठ गया। उसने कार स्टार्ट कर दी।

बिहारी अब भी हैंडपंप पर हुए वाक़िये पर विचार कर रहा था। उसके सभी तर्क विफल हो रहें थे ।
बिहारी वैज्ञानिक ढंग से स्वयं को उदाहरण देकर हर वस्तु की क्रियाविधि के बारे में समझा रहा था।
न्यूटन का ये नियम ऐसे लागू होता हैं , अब जैसे कार को ही देखो इसके शीशे भी सजावट के लिए थोड़े ही हैं इसके पीछे भी विज्ञान हैं । कहते हुए जैसे ही बिहारी ने कार के शीशे में देखा तो पाया कि पीछे की सीट पर वहीं हैंडपंप वाली महिला बैठी हैं ।

बिहारी का ध्यान भटका औऱ उसका संतुलन बिगड़ गया । गाड़ी दाएं - बाएं चलती हुई एक पेड़ से जा टकराई । बिहारी बेहोश हो गया ।

( शेष कहानी अगले भाग में )