मैं, मैं हूँ, मैं ही रहूँगी Pranava Bharti द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
  • The Mystery of the Blue Eye's - 6

    दरवाजा एक बुजुर्ग आदमी खोलता है और अपने चौखट के सामने नौजवान...

  • पागल - भाग 40

    भाग–४० मिहिर और निशी भी जल्दी राजीव के घर पहुंच गए । सभी राज...

  • जादुई मन - 15

    जैसे जाते हुए किसी व्यक्ति की गर्दन पर नजर जमाकर भावना करना...

  • द्वारावती - 34

    34घर से जब गुल निकली तो रात्रि का अंतिम प्रहर अपने अंतकाल मे...

  • डेविल सीईओ की मोहब्बत - भाग 6

    अब आगे, आराध्या की बात सुन, जानवी के चेहरे पर एक मुस्कान आ ज...

श्रेणी
शेयर करे

मैं, मैं हूँ, मैं ही रहूँगी

कवयित्री बीनू भटनागर

------------------------------

कई बार प्रश्न उठता है कि आखिर कोई कविता क्यों लिखता है ? सच कहूँ तो 12 वर्ष की उम्र से लिखना शुरू करने के बावजूद मेरे मन में कई बार इस प्रकार की संदिग्धता उत्पन्न हुई है कि आखिर मैं लिख क्यों रही हूँ ? देखा जाए तो इस प्रश्न का उत्तर जितना सरल है, उतना ही कठिन भी है | संभवत: जब अपने चारों ओर देखकर एक संवेदनशील मन असह्य वेदना महसूस करने लगता है तब उसकी कलम रुक नहीं पाती | ये संवेदनाएँ केवल कवि की ही नहीं होतीं, ये उससे जुड़े उन तमाम लोगों की होती हैं जिन्हें वह अपने भीतर समेटकर अपने लिए एक ऐसा कमरा तैयार कर लेता है जिसमें बैठकर चिंतन करना उसके लिए ज़रूरी हो जाता है | वह बाध्य हो जाता है माँ शारदे की शरण में जाने के लिए | 

बीनू जी भी क्यों कविताएँ लिखती हैं, वो भी ऐसे विषयों पर जो बहुत ज़रूरी नहीं लगते शायद यह उनकी संवेदना का वह स्तर है जो उन्हें उकसाता रहता है, उन्हें चुप नहीं रहने देता और यही एक कवि का संवेदन उस पर प्रहार करके उससे जबरदस्ती लिखवाता है | बीनू जी ने अपने संग्रह की  पहली रचना ही एक ऐसे शब्द ‘अखबार' से शुरू की है जिसको पढ़कर आज संत्रास के सिवा कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाता, फिर भी यह आज के जीवन के लिए इतना ज़रूरी हो गया है जितना शायद आज सुबह की चाय या कॉफी का प्याला हो चुका है जिसको हाथ में लेकर अखबार की सुर्ख़ियों पर नज़र डाली जाती है | इस रचना में कवयित्री ने इस प्रकार की कई बातों का ज़िक्र किया है जो आज की पीढी की कल्पना में भी नहीं आ सकता | यह रचना नई पीढी की कल्पना को नवीन आयाम देती है, इस रचना में जाने वे एक युग की बात कह जाती हैं | 

नए प्रतीकों व बिंबों से सजाकर कवयित्री ने बहुत से आधुनिक विषयों को कलमबद्ध किया है | बीनू जी सपने की बात कहती हैं तो बलात्कार व कत्ल की संवेदना से भी पीड़ित होती हुई दिखाई देती हैं | उनकी रचनाओं में ज़िंदगी के प्रति आक्रोश है, पीड़ा है, साथ ही है उस पीड़ा को मुखर करके भी उसे शिद्दत से सहने की शक्ति | वे आज की राजनीति से घायल भी हैं तो चिंता से सराबोर भी हैं, राजनीतिक दौड़ का चित्रण उनकी रचना को चिंतनीय बनाता है | वे आज की राजनीति पर व्यंग्य बाण छोड़ने से भी नहीं चूकतीं | 

यह सही भी है कि आज सभी विषयों पर कलमकार अपनी लेखनी चला चुके हैं तो नयापन कहाँ से आए ?मनुष्य भी वही है, उसकी संवेदनाएँ भी वही हैं | वह घायल होता है, व्यथित होता है और कवि-मन कलम उठाए बिना रह भी नहीं पाता किन्तु प्रत्येक रचनाकार का लेखन उसकी अपनी बात कहता है, उसका अपना व्यक्तिगत चिंतन होता है | कवयित्री का मन घायल है इसीलिए तो वे प्रकृति पर हुए अतिक्रमण से व्यथित होती हैं | वे मोबाईल व लैंडलाइन जैसे विषयों पर भी कहने से नहीं चूकतीं जिसे वे ‘अलादीन का चिराग' कहती हैं | वे निजता की बात करती हैं तो कैक्टस की बात करके बोनसाई की पीड़ा को झेलती दिखाई देती हैं | कवयित्री श्रीमती बीनू भटनागर अपनी ‘डायरी के पन्नों से ‘ भी अपने पाठकों के लिए कविता लेकर आई हैं जो संभवत: उनके बिलकुल निजी अनुभवों से रंगे हैं | 

नींद न आना कवियों का एक आम रोग है, यह रोग उन्हें भी कैसे छोड़ सकता है जो उन्हें किसी भी समय लेखन के लिए उकसाता है | धूप का कतरा भी उनसे कुछ कहता सा प्रतीत होता है, वे समझती हैं और इसीलिए कहती भी हैं कि कुछ बातें ज़रूरी नहीं होतीं कि किसीके द्वारा की ही जाएं, वे अपने आप होती रहती हैं, अपने आप रूठने -मनाने की बात भी बहुत सरलता से कह जाती हैं | उन्हें किसीके प्रति कोई शिकायत नहीं, बड़ी शिद्दत से सोचती है कि कहीं वे आत्म मुग्ध तो नहीं हैं ?वे गुलमुहर के फूलों का सौन्दर्य निहारती हैं तो अपने समय के हाट की तुलना आजकल महानगरों में लगने वाले सप्ताह के हाट से करती हैं और शायद बड़ी तसल्ली पाती हैं कि आज भी हाट जिंदा हैं | 

बीनू जी की रचनाओं में कहीं कहीं बेबसीझाँकती तो है किन्तु वे सकारात्मकता की ओर अपनी दृष्टि घुमा लेती हैं और हर बार जीवन को एक नए अंदाज़ से देखने का प्रयत्न करती हैं | यथार्थ को सहन करना सरल नहीं होता किन्तु वे यथार्थ को सहती हैं, कर्म की बात करती हैं और फल के प्रति एक सलोना रुख अपनाती हैं | वे कैलाश सत्यार्थी को पुकारती हैं तो जसोदा बहन को भी पुकारने से स्वयं को रोक नहीं पातीं | धर्म के घिनौने रूप पर भी उनका आक्रोश है तो महानगरों में आसमान न दिख पाने की असंतुष्टि भी उनके स्वरों से झांकती है | 

उनकी एक बात बड़ी विचारणीय है कि आजकल बेटियों पर तो बहुत कुछ लिखा जा रहा है किन्तु बेटों को आखिर क्यों नालायक सिद्ध किया जा रहा है ?यह उपहास की बात ही तो है कि इसके उपरांत भी गर्भवती बेटी-बहू को आशीर्वाद तो ‘पूतों फलो’ का ही दिया जाता है | उनके मस्तिष्क में इस धारणा के प्रति एक आक्रोश दिखाई देता है कि आखिर क्यों बेटे व बेटी से समान व्यवहार नहीं किया जाता ?बेटियों के साथ ही बेटे भी तो उसी रक्त व मॉस-मज्जा से बनकर जन्म लेते हैं | संभवत आज: के वातावरण को देखते हुए उनके मन में ये विचार गहराई से उपजे हैं, जो ठीक भी हैं | 

अछंदास रचनाओं के अतिरिक्त अपनी पुस्तक में कवयित्री ने दोहों को भी स्थान दिया है | दोहे विभिन्न पृष्ठभूमि पर लिखे गए हैं | दो -तीन दोहे उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत कर रही हूँ | 

धर्म सिखाता है हमें केवल अंधी भक्ति, 

कर्म और संकल्प से मिलती सारी शक्ति | 

और

न मेरे न आपके सारे तीज-त्योहार, 

थोड़ी होली आपकी, थोड़ी ईद हमार | 

बीनू जी के इस दोहे से मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ ;

गाँठ जुड़ी सालों हुए, गाँठ पड़ी न एक | 

साथी !हम तुम साथ हैं, अंतर भले अनेक | | 

आमीन !

कवयित्री बीनू भटनागर जी को उनके कविता संग्रह के लिए मैं ह्रदय से बधाई देती हूँ और कामना करती हूँ कि उनका यह संग्रह जन-मानस तक पहुँचकर उनके विचारों से पाठकों के ह्रदय में स्थान प्राप्त करे | माँ शारदा भविष्य में उनके लेखन को और ऊंचाइयों पर पहुँचाएं | 

 

साधुवाद

अनन्य शुभकामनाओं सहित

डॉ .प्रणव भारती