ममता की परीक्षा - 81 राज कुमार कांदु द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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ममता की परीक्षा - 81



छपाक की ध्वनि के साथ ही बिरजू के भागते क़दम एक पल को ठिठके थे लेकिन फिर अगले ही पल वह दीवानों की भाँति दौड़ पड़ा था कुएँ की तरफ। उसे बेतहाशा कुएँ की तरफ भागते देख उसके युवा साथी भी उसके पीछे तेजी से दौड़ पड़े और इससे पहले कि भावुकता में आकर वह कोई बेवकूफी करता उसके युवा साथियों ने उसपर काबू पा लिया।
गाँव के सभी बड़े बुजुर्ग भी कुएँ की जगत पर पहुँच गए थे। कुआँ बहुत गहरा था। बिरजू और चौधरी रामलाल को गाँववालों ने अपने घेरे में सुरक्षित कर लिया था, जबकि बाकी गाँववाले आननफानन बसंती को बचाने का जुगाड़ करने लगे।

कुछ लोगों ने कुएँ में झाँककर पानी की हलचल का अंदाजा लिया। उनका ख्याल था कि बसंती अभी पानी की सतह पर ही हाथ पाँव मार रही होगी। सभी को पता था कि वह एक कुशल तैराक थी, लेकिन कुएँ में पसरे गहरे सन्नाटे से सबके हाथ पाँव फूल गए। दो मिनट के अंदर ही सामने के घर से मोटी रस्सी आ गई और उसके सहारे दो युवक कुएँ में उतर गए। काफी प्रयास के बाद कुएँ से बसंती नहीं उसकी लाश ही निकाली जा सकी।" बताते हुए चौधरी रामलाल फूटफूट कर रो पड़े।

बिरजू पहले ही सिसक रहा था। चौधरी का रुदन सुनकर बिरजू की माँ भी कमरे से बाहर आ गई और चौधरी और बिरजू को रोते देखकर उसकी भी रुलाई शुरू हो गई। साड़ी के पल्लू को मुँह में ठूँसकर वह रुदन पर काबू पाने का प्रयास कर रही थी। सामने खटिये पर बैठे अमर ने उठकर अपने हाथों से बिरजू की माँ के आँसुओं को पोंछते हुए उसे ढाढस बँधाया और बोला, "काकी ! बसंती मेरी भी बहन थी और मैं वादा करता हूँ कि मैं बसंती को न्याय अवश्य दिलाऊँगा। बसंती तो अब वापस आने से रही लेकिन अपने ऊपर लगे चरित्रहीनता के दाग को धुलते देखकर स्वर्ग में भी उसकी आत्मा पुलकित हो उठेगी। आज मैं आप सभी के सामने प्रण करता हूँ कि जब तक उसके अपराधियों को उनके अंजाम तक नहीं पहुँचा देता मैं चैन से नहीं बैठुंगा।" कहते हुए अमर का आवेश दुगुना हो गया था और उसकी आवाज में भी तेजी आ गई थी।
अब तक चौधरी रामलाल और बिरजू स्वयं को काफी संयत कर चुके थे।

कुछ पल की खामोशी के बाद अमर ने चौधरी से पूछा, " काका, ये शहरी लड़के वाकई किसी रसूख वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं, ऐसा लग रहा है, लेकिन कोई बात नहीं भगवान के घर देर हो सकती है पर अंधेर नहीं। इन नराधमों तक पहुँचने का कोई न कोई रास्ता भगवान हमें अवश्य सुझाएंगे।"
और फिर अचानक उसे जैसे कुछ याद आया हो, "काका, वो जो दरोगा था अपनी चौकी में उस समय क्या वो अभी भी हैं इसी चौकी में ?"

"ठीक ठीक तो पता नहीं बेटा, लेकिन जैसा भी था वह दरोगा बड़ा भलामानुष लग रहा था। उसने एक दिन बिरजू को अपनी मजबूरी बताते हुए सब समझाया था और कहा था कि व्यर्थ में समय बर्बाद करने से कुछ हासिल नहीं होनेवाला। आरोपी बहुत ताकतवर हैं और वो कुछ भी कर सकते हैं। उनसे लड़ना और जीतना नामुमकिन है।" बताते हुए चौधरी की आवाज में गहरी वेदना और घोर निराशा साफ महसूस किया जा सकता था।

"नहीं काका, मुजरिम चाहे जितना भी पहुँचवाला व रसूखदार क्यों न हो, कानून के लंबे हाथ एक न एक दिन उसके गिरेबान तक जरूर पहुँचते हैं। उस अपराध की कोई न कोई कमजोर कड़ी हमें अवश्य मिलेगी जहाँ से हम उस केस को फिर से खुलवा सकते हैं। ..और यकीन मानिए जिस दिन ये केस फिर से खुल गया अपराधियों के आजादी की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी।"

कहने के बाद कुछ पल रुका अमर और फिर बिरजू से पूछने लगा, "उस दिन जब बसंती की लाश कुएँ से बाहर निकली, उसके बाद क्या हुआ ?"

" क्या हुआ ?.. ये कैसा अजीब सा सवाल पूछ रहे हो भैया ? घर के सामने जवान बहन की लाश पड़ी हो तो उसका और क्या कर सकते थे उसका अंतिम संस्कार करने के अलावा ? सीने पर पत्थर रखकर हमने भी वही जग की रीत ही अपनाई थी, अंतिम संस्कार कर दिया गया था उसका।" बिरजू ने कुछ सवालों के साथ ही जवाब दिया।

"लेकिन कब ? क्या उसी समय ? उसी रात या अगले दिन ? मैं तुम्हारी मनोदशा समझ सकता हूँ बिरजू ! मैं कहीं भी तुमसे अलग नहीं हूँ, लेकिन इन छोटी छोटी बातों से ही बड़ी बात पता चलती है। मैं भी बसंती को इंसाफ ही दिलाना चाहता हूँ। तुम मुझे उसे कुएँ से निकालने के बाद का पूरा हाल, छोटी से छोटी घटना भी पूरा सिलसिलेवार तरीके से बताओ। क्या पता इसीमें कहीं से हमें आगे बढ़ने की राह दिख जाए।" अमर ने प्यार से उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे समझाया।

" ठीक है भैया !" कहकर बिरजू ने आगे का हाल उसे बताना शुरू किया।

'उस दिन बड़ी देर तक पूरे गाँव का माहौल गमगीन रहा। रोना पीटना मचना तो स्वाभाविक ही है। गाँव के बड़े बुजुर्ग भी सभी को सांत्वना देते हुए इसे भगवान की मर्जी मानकर अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए। भैया ! आप जानते ही हैं ऐसे समय सभी गाँववाले एक परिवार के सदस्य समान हो जाते हैं और आगे बढ़कर सभी जिम्मेदारी उठाते हैं। उस दिन भी ऐसा ही हुआ था। अंतिम यात्रा की सारी तैयारी पूरी हो चुकी थी। अर्थी सजाई जा चुकी थी कि तभी वही दरोगा बहुत सारे सिपाहियों के साथ आ धमका। आते ही उसने बसंती का शव अपने कब्जे में ले लिया और कहने लगा इसका पोस्टमार्टम किया जाएगा। उसकी बात सुनकर सभी गाँववाले आक्रोशित हो गए। हम लोगों ने भी उसकी इस बात का पूरा विरोध किया लेकिन उसने किसी की भी एक नहीं सुनी।
एक बुजुर्ग ने तो उसे नसीहत देते हुए कह दिया, "अपराधियों को सजा तो दिला नहीं सके और अब आये हो यहाँ कानून की दुहाई देने ? क्या तुम्हारा अंधा बहरा कानून सिर्फ पैसे वालों की ही सुनता है ? उसे क्या मजबूरों व लाचारों की तड़प दिखाई नहीं देती ? चीख सुनाई नहीं पड़ती ? क्या गरीबों को शांति से मरने का भी हक़ नहीं है ? इज्जत से तो इसे जीने नहीं दिया, अब इस अभागी लड़की के मुर्दा शरीर की भी चीरफाड़ जरूरी है क्या ?"
लेकिन उस दरोगा को किसी की कोई बात नहीं माननी थी सो वह अपनी बात पर अड़ा रहा। सभी गाँववाले भी अपनी जिद पर अड़े रहे लेकिन आखिर मजबूर होकर उसने अपनी पिस्तौल निकालकर एक हवाई फायर किया और सिपाहियों द्वारा बसंती का शव अपने कब्जे में लेकर नुक्कड़ पर खड़ी अपनी जीप की ओर बढ़ गया।' तभी चौधरी रामलाल बोल पड़े, बड़ा भारी तनाव हो गया था उस दिन। अगर उस दिन मैंने सभी गाँववालों को नहीं समझाया होता तो बहुत खूनखराबा हो जाता।"

अमर ने उनकी बात सुनकर फिर बिरजू से मुखातिब होते हुए कहा, "अच्छा ! तो वो लोग बसंती का शव पोस्टमार्टम के लिए ले गए, लेकिन कहाँ ले गए थे ये किसी को मालूम है ?"

क्रमशः