हमसफ़र : हमदर्द Reshu Sachan द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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हमसफ़र : हमदर्द

वो रात कुछ यूँही सोते जागते गुजरी थी, आकर्ष और महक की। आकर्ष को दोपहर की फ़्लाइट से दिल्ली जाना था , जहां वह एक मल्टीनैशनल कम्पनी में नौकरी करता था । महक , उसकी पत्नी बनारस में एक शिक्षिका के पद पर नौकरी करती थी । आकर्ष महक से ही मिलने लगभग महीने में एक बार आ पाता था । इस बार तो उनको मिले हुए दो महीने से ज़्यादा का वक्त हो गया था । दिन तो बातों में गुज़र जाता था एक दूसरे के साथ , शाम होते ही कल की चिंता सताने लगती थी दोनो पति- पत्नी को कि पता नही अगले कितने दिनों तक फिर से यह विरह वेदना का दर्द सहना होगा।
आकर्ष और महक की दोस्ती उनके कॉलेज के दिनों से ही मशहूर होने लगी थी और कब दोनो ने एक दूसरे को मन ही मन पति पत्नी स्वीकार कर लिया उन्हें खुद भी नही पता लगा। बहुत प्यार करते थे दोनों एक दूसरे से। उनका रिश्ता दुनियाँ में सबसे ज़्यादा अलग महसूस कराता था उनको। दोनों अलग अलग शहरों में रहने के बावजूद पूरी तरह समर्पित थे एक दूसरे में । किसी की क्या मजाल कि कोई एक सुई की नोंक भर भी आ पाए उनके बीच । शादी से पहले दोनों के ही बहुत दोस्त थे पर शादी के बाद किसी और से दोस्ती भी रास ना आती थी दोनों को । अच्छा बुरा , जो कुछ भी था दोनों मिलके सामना करते थे और एक दूसरे पर बहुत भरोसा करते थे । आकर्ष में लोगों को पढ़ने की उन्हें समझने की बहुत ही अच्छा गुण था , शायद इसी वजह से वह महक के दिल को पढ़ पाया था।
महक एक अंतर्मुख प्रकार की लड़की थी , उसे लोगों की समझ कम पर रिश्ते निभाने में वो ईमानदार थी। वह लोगों की इमोशनल बातों में बहुत जल्दी आ जाती थी , यह आकर्ष के लिए बहुत बड़ी चिंता का विषय था । एक तो दोनों का अलग अलग शहरों में रहना फिर उसमें से महक का किसी पर भी बहुत जल्दी विश्वास करना। आकर्ष को उसकी पिछली ज़िंदगी के बारे में बहुत कुछ नही मालूम था, और उसने ज़रूरत भी नही समझी थी जानने की क्यूँकि उसे महक का इनोसेंट होना ही भा गया था उनके मिलने के पहले ही दिन से । पर कई बार उसे महक का व्यवहार बहुत ज़्यादा अजीब लगता था , जैसे कुछ है जो महक को अंदर ही अंदर खाता जा रहा हो । कुछ तो ऐसा है जो वो छिपा रही जैसे एक मुखौटे के साथ जी रही हो । समय के साथ प्यार बढ़ने के साथ ही आकर्ष को महक की और ज़्यादा फ़िकर होने लगी थी।
जब भी आकर्ष कुछ पूँछता था वह यह कहकर टाल देती कभी लिखकर बताऊँगी, मेरा पास्ट बहुत ही गंदा है , में तुम्हारे लायक़ नही हूँ वग़ैरह वग़ैरह। आकर्ष भी उसपे कोई टिप्पणी ना करना उचित समझता था और सोंचता था चलो ठीक है जब वह खुद से सहज महसूस करेगी या जब मुझसे पूरी तरह से भरोसा कर पाएगी बताएगी। और इसी तरह उनकी शादी को एक वर्ष बीत गया । इस बार महक ने एकदम हद पार कर दी थी उसने आकर्ष के साथ किसी बात का बुरा मान लेने पर अपनी जान देने की कोशिश की थी , यह बात आकर्ष को बहुत आहत की और वो मानो टूट गया हो पूरी तरह, उसका प्यार मानों बिखर गया हो। उसकी समझ में नही आ रहा था कि मेरे इतने प्यार के बावजूद वो इतनी कमजोर कैसे हो सकती थी कि ख़ुदकुशी की कोशिश ।
महक की इतनी बचकानी हरकत देखके आकर्ष को आनन फ़ानन में बनारस आना पड़ा था इस बार । मिलने के बाद से ही दोनों जैसे मौन ही रहे हों , बस माफ़ी माँगने का दौर शुरू था एक साथ न दे पाने की माफ़ी और दूसरा अपने ग़लत किए की माफ़ी । पूरी रात इसी में गुज़र गयी थी , पर आकर्ष का मन शांत नही हो पा रहा था उसे वजह जाननी थी कि आख़िर महक ने ऐसा किया क्यूँ , इतनी तो कोई बात नही थी वो तो उसे बहुत स्ट्रोंग बनाना चाहता था । नाश्ता करने के बाद आकर्ष ने महक को अपने सीने से लगाके अपने पास लिटाया और बोला देखो तुमने जो किया ग़लत किया तुम्हें भी मालूम है पर मैं तुम्हारी गलती नही मानता वजह तो कुछ और ही है शायद। तुम्हें मालूम है इस दुनियाँ में कितने ऐसे बच्चे हैं जो चाइल्ड अब्यूस का शिकार होते हैं , मुझे तुम्हारे बारे में नही पता । इतना आकर्ष का कहना था महक को ऐसे लगा मानो आकर्ष वो बात कैसे समझ सकता है जो उसने २५-२६ साल पूरी दुनिया से और खुद से भी छिपायी हो। यह कोई ईश्वरीय शक्ति थी शायद आकर्ष के प्यार में जिसमें उसने महक को इतना प्यार किया कि उसके दिल में उसकी ज़िंदगी में इस कदर समा पाया था वो।
महक ज़ोर से आकर्ष को जकड़ ली अपनी बाहों में और बहुत हिम्मत जुटाकर बोली कि मुझे आपसे कुछ बताना है इस बारे में , पहले मैं सोंचती थी कि लिखके बताऊँगी पर अब और बाद में नही। मुझे नही मालूम कि तुम कैसे मेरे दिल में इस कदर शामिल हुए हो जो मेरे बिन बोले यह बात तक समझ गए हो । तुम सच में मेरे सच्चे हमसफ़र हो जिसे मैं आज अपना हमदर्द कह सकती हूँ । मैं लगभग ७ या ८ साल की रही होऊँगी तब मेरे ही मोहल्ले के एक आदमी ने मेरा रेप किया था, मैं यह बात अपनी माँ को भी नही बता पायी आज तक क्यूँकि उस समय वो अपने इलाज के लिए दूसरे शहर में थीं । इतना कहना था महक का कि आकर्ष ने उसे अपने सीने से लगाके उसके सिर में हाँथ फेरते हुए बोला , मैं समझ सकता हूँ तुम्हारी पीड़ा , तुम तो अपनी माँ के सीने से लगके रो भी नही पाए उस दौर से गुजरके, तुम बहुत स्ट्रोंग बच्चे हो मेरे , मैं हूँ ना हमेशा तुम्हारा ख़याल रखूँगा , फूलों से भी ज़्यादा सहेजके , तुम्हें इतना प्यार दूँगा कि तुम वो २५-२६ साल का सारा दर्द जो अकेले सही हो सब भूल जाओगी। मुझे तुमसे और कुछ नही जानना है , तुम्हारी मनोस्थिति मैं समझ सकता हूँ।
आकर्ष की इन सारी बातों का अहसास करके महक को मानो सब कुछ मिल गया हो उसे । सच है किसी को भी अगर हमसफ़र और हमदर्द दोनों एक ही इंसान में मिल जाए उसके जीवन में कोई भी कमी महसूस ना हो कभी । इस बार आकर्ष भी अपने मन में उठ रहे सारे सवालों के जवाब पाकर बहुत सुकून में जा सका और महक को भी लगा मानो वह आकर्ष की नज़रों में बाइज़्ज़त बरी हो गयी हो जैसे ।।।