अछूत कन्या - भाग १२   Ratna Pandey द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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अछूत कन्या - भाग १२  

गंगा को और आगे पढ़ाने का निर्णय लेने के बाद उसी दिन शाम को अरुणा ने उसे बुलाया तब सौरभ भी वहीं था। सौरभ ने पूछा, “गंगा अब तुम्हारी स्कूल की पढ़ाई का यह अंतिम वर्ष है। तुम आगे क्या करना चाहती हो बेटा?”

अनायास ही गंगा के मुंह से निकल गया, “अंकल मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ।” 

सौरभ ने कहा, “तो बेटा फिर उसके लिए तो तुम्हें एंट्रेंस की परीक्षा देनी होगी। अभी समय है तुम्हारे पास, तुम कोचिंग क्लास ज्वाइन कर लो।”

ख़ुश होते हुए गंगा ने कहा, “जी अंकल।” 

जब घर जाकर उसने अपने माता-पिता को यह बताया तब सागर ने कहा, “बाप रे बाप इस पढ़ाई में तो बहुत ख़र्चा होगा।”

नर्मदा ने कहा, “यह बात तो सोलह आने सच है लेकिन यह पूरा ख़र्च मैडम जी ही करेंगी। हमारे ऊपर उनके कितने एहसान हैं। हम कैसे चुका पाएंगे उनके एहसानों का बदला।”

“हाँ नर्मदा इतना तो कोई सगा होता तो वह भी नहीं करता। नर्मदा, हमारी गंगा भले ही डॉक्टर बन जाए लेकिन हम साहब और मैडम जी का काम कभी नहीं छोड़ेंगे।” 

गंगा बीच में ही बोल पड़ी, “हाँ बाबूजी कभी नहीं, वह तो हमारे लिए भगवान की तरह हैं।” 

गंगा ने ख़ूब मेहनत की और उसकी मेहनत रंग लाई उसे अपने ही शहर के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया। 

शहर आने के बाद गंगा और उसके परिवार ने यह महसूस किया था कि यहाँ जाति में कोई भेद-भाव नहीं है, छूत-अछूत नहीं है। लेकिन अब बड़ी होने पर गंगा को यह समझ आ रहा था कि भेद-भाव तो यहाँ भी होता है, सवर्णों के साथ। उनके बच्चों को काबिल होने के बाद भी अच्छी सरकारी नौकरियाँ नहीं मिलतीं। ९०-९५% नंबर लाकर भी वह लाइन में कहीं बहुत पीछे छूट जाते हैं और ५०-५५% लाने वाले छोटी जाति के बच्चे उनसे बहुत आगे निकल जाते हैं। जैसे गंगा को वह भेद-भाव पसंद नहीं था, जो उनके साथ होता चला आ रहा था। वैसे ही उसे यह भेद भाव भी बिल्कुल पसंद नहीं आया। उसने तो निर्णय कर लिया था कि वह जो भी हासिल करेगी अपनी योग्यता के दम पर ही करेगी। वह किसी और की नौकरी छीन कर आगे नहीं बढ़ेगी। मेडिकल कॉलेज में उसके बहुत सारे दोस्त बन गए थे। लेकिन एक दोस्त बहुत ख़ास था, जिसका नाम था विवेक। वे दोनों साथ में बैठते थे, साथ में घूमते-फिरते थे।

गंगा के मेडिकल कॉलेज में जाने के साथ ही अरुणा ने बगीचे के उस घर को थोड़ा और अच्छा करने का फ़ैसला ले लिया ताकि गंगा को पढ़ाई करने में किसी तरह की असुविधा ना हो। नर्मदा और सागर ने पिछले कई वर्षों से अरुणा के परिवार की बहुत सेवा की थी। इस बात का एहसास अरुणा और सौरभ दोनों को था। अरुणा और सौरभ अपनी बूढ़ी माँ को घर पर छोड़ कर दो चार दिनों के लिए घूमने भी चले जाते थे। दोनों परिवार एक दूसरे पर निर्भर हो चुके थे और दोनों ही एक दूसरे का एहसान मानते थे।

उधर कॉलेज में गंगा और विवेक की दोस्ती प्यार की राह पर अपने क़दम बढ़ा चुकी थी।

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात) 

स्वरचित और मौलिक  

क्रमशः