Khauf ki rate - 4 books and stories free download online pdf in Hindi

खौफ की रातें - 4

4) भूत

शिव जलपान व मिष्ठान गृह हम दोस्तों के बैठकर
दुनिया में व आसपास हो रहे कई प्रकार के बात
करने का एक बेहतरीन स्थान है । जिसका यह
दुकान है उसका नाम है गोलू वह अपने साथ क्रिकेट
खेलने अक्सर कई जगह जाता है तो ये अपना ही अड्डा
हुआ वह कुछ न बोल पाता । सोच रहा हूँ हॉरर टाइम
कहानी संग्रह में एक और भूतिया कहानी लिखूं पर कुछ
समझ नही पा रहा ।
मैं , सत्यम और मुकेश बैठे हुएं हैं । मैं बोला अरे भाइयों
कभी तुमने भूत देखा है या कोई कहानी सुनी है भूत के
बारे में । सत्यम बोल पड़ा – " हाँ मैंने देखा है ।"
मैं बोला अच्छा चल बता क्या देखा ?
अरे यार एक दिन दोपहर को मिश्रा के ग्राउंड से मैच
खेलकर भरे दोपहर खेतों से होते हुए घर लौट रहा था ।
आसपास सर के बराबर अरहर के खेत , मेढ़ से होते हुए
जा रहा था कि एकाएक एक आदमी जिसका सिर कटा
हुआ था मेरे सामने आ गया । मैं तो देखते ही वहां से चिल्लाते हुए भागा जब खेतों से बाहर आया तो मुझे लगा
वो मेरे पीछे - पीछे ही आ रहा है । पर नही आया । उस समय कक्षा 8 में था तो छोटा था इसीलिए बहुत डर
गया था । लेकिन वो सच में भूत ही था ।

मुकेश ने उसका मजाक उड़ाते हुए बोला – " अबे वो
तेरा मामा था हालचाल पूछ लेते ।"
फिर हम जोर से हँस पड़े । पानी पीने आये थे जगदीश काका
उनका पास ही एक छोटा सा पान का दुकान है । बड़े ही
मजाकिया अंदाज के आदमी हैं उम्र 50 पार हो गयी है या
शायद 60 भी पर अंदाज मानो एकदम हमारे जैसा कोई
18 -19 साल जैसा । वही उम्र पचपन का दिल बचपन का।
कभी - कभी हमारे साथ बैठकर बहुत मजाकिया बातें
करतें हैं और हम भी उनकी बातों को सुनने के लिए मशगूल
रहते थे । गांव व छोटे जगह में अपनों के बीच ऐसे बॉण्ड को
शहर वाले क्या जाने ।

अबे ये भूत - वूत कुछ नही होते । मैं यही बोला ही था
कि जगदीश काका पीछे से बोल पड़े " जिस दिन भूत
पकड़ेगा न उस दिन पता चलेगा राहुल बेटा । "
'अरे चलिए चलिए , रखिए अपने भूत को अपने पास
मेरे पास अगर आया न तो मैं खुद ही उसे पकड़ लूंगा। '
मैं मोबाइल में फेसबुक नोटिफिकेशन देखते हुए बोला ।
जगदीश काका चिल्लाते हुए बोले – " देखा जाएगा , देखा
जाएगा जिस दिन एक पैर आम के पेड़ पर और दूसरा
जामुन के पेड़ पर रखकर भूत तुम्हारे सामने आएगा
तब फट कर चार हो जाएगा । अभी कबूतर देखा है उसका
फंदा नही । "
मैं जानबूझकर कहा ' हम्मह छोड़िए '
जगदीश काका खींझकर बोले – " तुम नास्तिक हो और
कुछ नही ।"
यह बोलकर काका जाने ही वाले थे कि मुकेश ने उन्हें
रोकते हुए कहा – " काका क्या आपने भूत देखा है ।"
जगदीश काका सीना चौड़ा करते हुए बोले – " और क्या
अपने आंखों से ।"
मैं फिर बोला – " तो बताइए कहानी ।"
जगदीश काका बोले – " आज सुबह से पेट में कुछ नही गया
10 बज रहें हैं खाली पेट कहानी नही सुना सकता । "
' गोलू भाई एक ब्रेड पकौड़ा और चाय काका के लिए "
मैं दुकानदार गोलू की तरफ देखकर बोला ।
दो ग्राहक आये थे उनको निपटाकर काका हमारे साथ
बैठे व जब चाय व ब्रेड पकौड़ा खत्म हुई तो पानी से
मुँह धोते हुए बोले – " तो सुनो ….....
"" यह बात है आज से लगभग तीस साल पहले की मेरा
उम्र उस समय यही 26 - 27 के आसपास था । मैं घूमने
गया था अपने मामा के गांव , गांव यही जौनपुर के पास
एकदम गोमती नदी के किनारे बहुत ही सुंदर जगह पर
बसा है वो गांव । मामा के घर जैसा खाना पीना और वैसा
ही आराम दो महीने के अंदर एकदम हृष्ट पुष्ट हो गया ।
अच्छा हूँ आराम से दिन कट रहें थे ठीक उसी समय
मामा के घर के पास ही एक अमंगल हुआ । घर के पास
ही रहने वाले केदारनाथ दूबे स्वर्ग सिधार गए । यह
आदमी जब तक जिंदा था पूरे गांव के लोग उससे परेशान
रहते थे । हरदम गाली से भरा गला , मिजाज अति खराब
घर पर कौवे भी उससे न जीत पाएं । कुत्ते और बिल्ली
तो घर के सीमा में भी न आते । पत्नी पहले ही मर गई
थी और लड़का दिल्ली या बम्बई काम के बहाने भाग गया
था । बूढ़ा घर पर अकेले ही रहता था और एक मस्त फल
का बागान था दिन भर उसी का पहरा देता रहता ।
इतना खराब आदमी खराब समय ही मरेगा इसका
कोई संदेह नही है।
उस दिन बाहर धीरे धीरे पानी भी बरस रहा था ।
रात को कचौड़ी सब्जी,अरहर की दाल व चावल खाकर
मस्त लेटा ही था कि ठीक उसी समय बुलावा आया शव
जलाने जाना है । "

मैं इसी बीच बोल पड़ा – " यह सब पुरानी कहानी है , मैंने
हजारों ऐसे कहानी सुने हैं । "
सत्यम बोला – " चुप कर पहले सुन तो "
जगदीश काका खींझकर बोले – " अरे पहले सुन फिर बकबक करना । "
" ठीक है ।"

जगदीश काका आगे बताने लगे ….....

"" क्या करूँ बाहर निकलना ही पड़ा , पास के घर में एक
आदमी मरा पड़ा रहेगा यह कोई अच्छी बात तो नही है जितना भी खराब आदमी क्यों न हो , मनुष्य होने का कुछ कर्तव्य तो है । बाहर निकलकर देखा हम चार लोग हैं कइयों को बुलाया किसी ने अंदर से कहा बुखार हुआ है किसी ने
कहा उनके पैर कांप रहें हैं । तो हम चार लोगों को
ही कंधा देना पड़ा । दो लोग के हाथ में झुलते हुए लालटेन
और ऊपर कंधे पर झूलता मरा हुआ आदमी ।
दाहिने पैर के पास से दीनानाथ बोल पड़ा ' जिंदा बूढ़े
ने बहुत सताया सबको अब मरकर भी एक खेल , खेल
ही गया । '
लेकिन क्या किया जाए कोई उपाय भी नही है , वही टिप -
टिप करती बारिश , सनसनाती हवा व वर्षा के कारण कीचड़
से सरकते हुए रास्तें में हमसब बढ़ चले । चारों तरफ गहरा
अंधकार , आसपास के पेड़ उस अंधकार में मानो विशाल दैत्य की तरफ सिर हिला रहें हों । बिजली चमकने के कारण
आँख बंद हो जा रहें हैं । बीच - बीच में रास्ता भूल के कारण
पास के खाल में भी एक दो के पैर पड़े । वर्षा के छीटों के
कारण लालटेन की चिमनी भी चटक रहें हैं । कभी कभार
पैर सरक जा रहें हैं , धीमी बर्षा व ठंढी हवा के कारण
आंख जल रही है । भोगना और किसे कहतें हैं ।
' राम नाम सत्य है , राम नाम सत्य है , राम नाम सत्य है '
चिल्लाते चिल्लाते चल रहे थे हम चार लोग , कंधे के ऊपर
बूढ़ा मानो अति आंनद से झूल रहा है । मुझे संदेह हुआ
अभी कहीं अगर शव के चेहरे से कपड़ा हटाने पर पता चला
हम लोगों के इस दुर्गति को देखकर बूढ़ा धीरे - धीरे हँस
रहा हो । बेकार आदमी कहीं का मन मन में अभिशाप देते
हुए हम लोग आगे बढ़े ।
हाँ कहने को भूल गया केवल हम चार लोग ही नही थे ,
बूढ़े के दो चमार प्रजा भी थे वो तो मरे ब्राह्मण को कंधा नही
दे सकते इसीलिए कुल्हाड़ी लेकर पीछे पीछे आ रहे थे
लकड़ी काटने के लिए ।
[ मुझे किसी के जाति - धर्म से कोई मतलब नही है यह
कहानी का केवल एक भाग है , आप समझदार हैं आप
जानतें हैं कि ऐसा होता है । ]
कुछ भी हो श्मशान हम लोग पहुंचे , श्मशान ठीक गांव के
नीचे नदी के पास नही है अच्छा खासा दूर है गांव से , आसपास कोई घर नही है , बहुत दूर तक एक खुले खेत में इधर उधर बबूल के जंगल और उसी के आगे टीन शेड से
बना घर पर उसके चारों तरफ कोई दिवाल नही है एकदम
खुला । यही है श्मशान में आने वालों के लिए बैठने का स्थल
ठीक उसी के नीचे एक माटी की सीढ़ी गोमती के पानी में
उतर गई है । एकदम बढ़िया सीढ़ी 14 - 15 चढांन पर
वर्षा के दिन होने के कारण नदी में पानी थोड़ा बढ़ा है इसीलिए 5-6 ही दिख रहें हैं । टूटा फूटा अवस्था कहीं
कहीं से ईंट बाहर निकल गए हैं । हमने शव को वहीं
सीढ़ी पर ही उतारा ।
ऐसे रखा जैसे शव के पैर पानी में डूब जाए । इससे बूढ़े
का नदी यात्रा भी होगा और किसी को शव पकड़कर भी
नही बैठना पड़ेगा ।
शव को उतार हमलोग उस टीन शेड के नीचे बैठे। जो
दोनों लोग आएं हैं वो लकड़ी की व्यवस्था करें फिर चिता
सजायी जाएगी । बैठकर हम चारों आपस में बात करने
लगे । चारों तरफ अंधकार , हवा हवा में ही बबूल के पेड़
के नीचे सियारों के आंख चमक रहें हैं अंधेरे में जलते उन
आंखों को देखकर भय भी हो रहा है कहीं भूत तो नही है ।
लालटेन के शीशे में कालापन आ गया है कुछ कुछ प्रकाश
घाट पर रखे शव पर पड़ा रहा है । बात के बीच - बीच में
शव के ऊपर हम लोग नजर रख रहें हैं । कहीं सियार न
खींच ले जाएं इसीलिए होशियार रहना जरूरी है । कितना
देर हुआ यह नही बता सकता पर एकाएक भयभीत स्वर
में पास ही बैठा कांतिलाल बोल उठा ' शव कुछ हिल रहा है '
हम बोले कि चुप कर तेरे आंखों का भूल है । कुछ देर बाद
इसबार दीनानाथ बोला ' सही में शव में हलचल हुई ' ।
हम चारों में सबसे साहसी था भानू , जैसा चौड़ा छाती वैसा
ही बेपरवाह उसने आस्वासन देते हुए कहा ' वो कुछ नही
पानी के लहरों के कारण हुआ होगा । '
फिर कुछ मिनट कटते ही मेरा पूरा शरीर भय व आतंक
से कांप उठा । कोई भूल नही है लालटेन की धीमी रोशनी
में भी स्पष्ट देखा जा सकता है कि शव कुछ - कुछ सही
में पानी की तरफ जा रहा है । ' यह क्या है " मैं , दीनानाथ
और कांतिलाल एक साथ चिल्ला उठे ।
भानू खड़ा होकर डपटकर बोला ' चुप करो , फिसलन
सीढ़ी है तभी पानी की तरफ फिसल रही है रूको मैं उठा
कर लाता हूँ । '
शव तब भी नीचे की तरफ जा रहा है और घुटनों तक
पानी में चला गया है । भानू जाकर अर्थी के बांस को
पकड़कर खींचा लेकिन यह क्या भानू के खींचने से उलट

वह शव और अंदर पानी की तरफ चला गया । बलशाली
भानू इसबार दोनों हाथों से शव को जकड़ लिया लेकिन
आश्चर्य भानू पकड़ नही सका और फिसलकर कमर
जितने पानी में जा गिरा और इसके साथ ही उसका पूरा
साहस गायब हो गया अब भानू भय से चिल्लाया ' अरे तुम
लोग मुझे बचाओ यह शव मुझे अपने साथ पानी में ले जा
रहा है , हे भगवान , अरे माई हो ' ।
हम मानो काटो तो खून नही , शरीर में खून की जगह पानी
बह रहा हो । हम तीनों चिल्लाए ' शव छोड़ दो , अरे भानू
शव छोड़ दो ' । भानू चिल्लाया ' नही छोड़ पा रहा बचाओ
मुझे , शव नही छोड़ पा रहा ।'
हम तीनों नदी की तरफ दौड़े और जकड़ लिया भानू को ,
फिर जो हुआ उसको याद कर आतंक से आज भी मेरे
रोंगटे खड़े हो जातें हैं ।
उस हड्डी के शरीर वाले शव में क्या अमानवीय शक्ति , एक
तरफ हम चार और एक तरफ शव अकेला , हमें अनायास
ही तुक्ष्य समझकर नदी के पानी में खींचने लगा ।
ठंडा पानी हमारे कमर को छोड़कर पेट तक उठ चुका था
फिर पानी सीने तक आ गया । हम समझ गए कि अब
हमारे बचने का कोई आशा नही है । यह शव हम सबको
खींच कर अंदर ले जा रहा है । जा रहा है गहरे गोमती नदी
के पानी में , क्या अवस्था है हम सब का ज्ञान व शक्ति सब
चला गया है मानो एक शव के साथ अपने प्राण के लिए
हम युद्ध कर रहें हों बल्कि यह समझ रहा हूँ कि हमारे
विजय होने के आसार नही हैं । अमानवीय शैतानी शक्ति
के आगे हमारा शक्ति कुछ भी नही है । और सब से भयानक
यह है कि शव को छोड़कर ऊपर उठ जाऊं वह शक्ति भी
नहीं है । भानू शव को छोड़ नही पा रहा और हम भानू को
छोड़ नही पा रहे । मानो किसी मंत्र के बल पर वह शव हमारे
शरीरों को भी जकड़ लिया हो । मानो हम सबको उसने
हिप्नोटाइज कर दिया हो । सीने तक की पानी क्रमशः गले
तक पहुँच चुकी है और देर नही है मृत्यु की , चारों तरफ
गोमती नदी की अंधकार में मानो शैतान की खिलखिल
हंसी सुन रहा हूँ । वहां से प्रेत अंधकार जगत शव हमें उसी
पथ पर ले जा रहा है । अंतिम बार के लिए हम सब भय से
कांपते हुए चिल्ला उठे ' बचाओ , बचाओ , कोई तो बचाओ '
ठीक उसी समय चिता के लिए लकड़ी की गट्ठर लेकर वह
दोनों आ रहे थे हम सब के चिल्लाने की आवाज सुन वह
दोनों नदी में कूद पड़े । अब तक हम चार थे अब हुए छह
लोग ।अब फिर नए शक्ति के साथ अमानवीय शक्ति के साथ
युद्ध शुरू हुआ । फिर उसके बाद , उसके बाद धीरे - धीरे
थमना शुरू हुआ शव , धीरे - धीरे हम विजयी होने लगे ।
क्रमशः शव हम लोगों के साथ होने लगा , तब भी उसका
जबरदस्त खिंचाव है लेकिन फिर भी हम उसको घाट की
तरफ ले आने लगे । गले तक की पानी से कमर तक फिर
घुटने तक पानी । अब उधर की खींचाव एकाएक छूट
गया और शव के साथ हम सब एक दूसरे के ऊपर घाट की
तरफ गिरे ' अरे हे , हो , अरे राम हो ,आह ' ।
फिर ससससससससस ठीक तभी घाट से पानी की
तरफ दिखाई दी । ""

जगदीश काका यहीं पर रुके हम सब एकध्यान सांस बंद
सुन रहें है यह अति भयावह कहानी हम एक साथ बोल
पड़े –" क्या दिखाई दिया ? "
जगदीश काका धीरे से बोले – " और क्या प्रायः देढ़
हाथ लंबा"
" देढ़ हाथ लंबा क्या ? क्या काका ? " मुकेश ने आतुरता
से पूछा ।
जगदीश काका – " और क्या हो सकता है हमारे गोमती नदी
के पानी वाला साँप , हाँ सांप ही था । "
मैं हँस उठा , सत्यम उठ खड़ा हुआ और बोला – " काका आप झूठ बोल रहे हो । "
काका हँसकर बोले – " हो सकता है , पर आज खूब मजा
आया । भूत का मजा मिला फट गई न सुनकर । "
बिना उत्तर दिए जगदीश काका हंसते हुए अपने छोटे से पान
की दुकान के तरफ चल पड़े जिस पर एक साहब जोर से
बोल रहे थे ' ओ काका इधर आइये कमलापसंद दीजिए '।

|| समाप्त ||


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