नर्क - 6 Priyansu Jain द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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नर्क - 6

निशा की विस्फारित आँखों ने उस विचित्र नीले हत्यारे पर गोलियां बरसते देखा पर उसे कुछ न हुआ। लोग चीख रहे थे और उसकी आँखों में हिंसा भरी हुई थी। उसने एक छलांग मारी और सीधा भागते लोगों के सामने आ गया। एक बार फरसा घुमाते ही कई लोग काल का ग्रास बन गए। उनके बीच में एक खम्बा(पिलर) भी आया परन्तु फरसे के आगे वो भी कागज जैसा ही साबित हुआ। लोगों सहित वो भी कट गया।

बड़ा ही भयानक दृश्य उत्पन्न हो गया था। वो इतने पर भी नहीं रुका चुन-चुन कर निर्दोष लोगों के खून से अपने फरसे की रक्तपिपाशा शांत करने लगा।

निशा को पता नहीं क्या हुआ, वो ये दृश्य देख गुस्से में भर उठी। उसका डर अचानक जैसे गायब हो उठा।

हाआआआआ...... उसकी चीख गुंजी परन्तु वो चीख की आवाज डर की न होकर क्रोध की थी। उस नीले हत्यारे का फरसा वापस घुमा और निशाना निशा का गला ही था परन्तु वो ठीक गले से पहले ही रुक गया। वो नीला हत्यारा निशा को देखने लगा, एकदम अचंभित होकर। निशा की आँखों में नफरत हिलोरे मार रही थी थी. जहाँ सभी लोग डर में शरीर छोड़ने को तैयार थे वहीं निशा की आँखों में सिर्फ क्रोध था। अचानक वो नीला हत्यारा एक गन्दी सी हंसी हंसने लगा जैसे उसे मजा आ रहा हो और उसने अपना फरसा एक तरफ उछाला जहाँ एक आदमी छुपते-छुपते एक खिड़की तक पहुँच चुका था। फरसे ने पलक झपकने से पूर्व ही उस निरपराध को पीठ की तरफ से मक्खन की तरह चीर दिया।

खिड़की से बाहर सिर्फ उसकी आत्मा, उसकी रक्त सनी आँतों के साथ निकली।

निशा ने पलकें तक न झपकाई, उस हत्यारे ने वहशी हँसी हँसते हुए निशा के गालों पर अपनी एक ऊँगली ऊलटी, ऊपर से नीचे फिराई। निशा ने घृणा से अपना मुँह घुमा लिया। परन्तु उस बेरहम हत्यारे ने उसके गाल पकड़ कर उसका मुँह वापस अपनी तरफ किया।

फिर ठहाके लगाते हुए वो हत्यारा वहाँ से अपनी मदमस्त चाल से निकल गया जैसे उसे फर्क ही न पड़ता हो किसी से भी।

'मैं तुम्हें पहचान चुकी हूँ हत्यारे। मैं वादा करती हूँ कि जब तक तुम्हें खत्म करने का कोई तरीका न ढूंँढ लूँ, मैं चैन से न बैठूंगी। तुमने इतने मासूमों का खून मेरे सामने ही बहाया है। उस एक-एक इंसान की कसम, तुम्हें इन हत्याओं की सजा जरूर मिलेगी। आज से मैं किसी से न डरूंगी। बल्कि अब तुम्हारे पास रहकर ही तुम्हारी कमजोरी ढूँढूंगी। मैं किसी को भी पता नहीं चलने दूंगी कि तुम कोन हो?? परन्तु एक दिन तुम्हारी दुर्गति मैं ही करुँगी।' पता नन्हीं क्यों निशा की नफरत उसके लिए बढ़ती ही जा रही थी.

घर लौटने के बाद निशा अपने आप से कहने लगी-" ये मैं क्या सोचने लगी?? मुझे आज डर क्यूँ न लगा?? मैं उस से नफरत क्यूँ करती हूँ?? बेइंतहांँ नफरत। जबकि मैंने तो उसे पहली बार देखा। उसकी आँखें बहुत जानी-पहचानी सी लगी थी। मुझे ऐसा लगा कि उसके इस रूप को मैं बहुत पहले से जानती हूँ, जबकि मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था। वो ऐसा क्यों था?? इंसान तो किसी भी तरीके से न लगता था। इतना भयानक!!! क्या ऐसे जीव भी होते हैं??? वो भी आज मुझे मारते-मारते रुक गया फिर वहाँ से अजीब तरीके से हँसता हुआ चला गया, उसने फिर और लोगों को भी नहीं मारा। ऐसे लगा जैसे वो मुझे जानता था। ये सब क्या हो रहा है??? वो ऐसे जानें क्यों ले रहा है?? आज उसे देख कर मेरे मन में उसके खात्मे की इच्छा क्यों आयी?? जबकि मुझे उस वक्त अपनी जान की चिंता होनी चाहिए थी।"

"आअह्ह्ह्हह..... सर दर्द से फटा जा रहा है। ये विचार मेरे दिमाग से निकलते क्यों नहीं?? अब बर्दाश्त नहीं हो रहा..." अचानक निशा का दिमाग अँधेरे में डूब गया वो इतना दबाव झेल न पायी।

आँखें खुली तो उसने अपने आप को अस्पताल में पाया। उसका भाई उसके पास ही बैठा था। निशा ने मुस्कुराते हुए उसके सर पर हाथ फेरा। फिर पुछा -"मैं यहाँ कैसे आयी राहुल??"

राहुल बोला-" दी, आप बेहोश हो गयी थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करूँ, आप पानी के छींटों से भी नहीं उठी थी। मैं घबरा गया था। फिर ये भैया मेरी आवाजें सुनकर आये और आपको हॉस्पिटल लाकर इलाज कराया। आप पूरे चार घंटों के बाद होश में आयी हो।"

इतने में निशा की नजर सामने गयी तो वहाँ एक 27-28 साल का लड़का खड़ा था। जो दिखने में काफी शरीफ और सुन्दर था। उसने निशा का अभिवादन किया और बोला-" अब आप कैसी है??"

निशा के सर हिलाने से वो समझ गया कि वो ठीक है। फिर वो वापस कहने लगा कि-" मेरा नाम आयुष है। मैं शर्मा ग्रुप में काम करता हूँ। मैं आपके पडोसी दीनदयाल जी का नाती हूँ। मैं ननिहाल आया ही था इतने में आपके भाई की घबराई हुई आवाज सुनी तो मैं आपके घर आ गया। आगे की तो कहानी आप जानती ही है।"

निशा- "शर्मा ग्रुप!!! वो तो बहुत बड़ा ग्रुप है इस शहर का। वो ग्रुप अपनी कमाई का 40 प्रतिशत अनाथ बच्चों के लिए डोनेट करता है। मैंने तो ये भी सुना है कि उस ग्रुप का मालिक जो एम. डी. भी है, वो खुद भी एक अनाथ ही है।"

ये सुनकर आयुष की आँखों में दर्द उमड़ आया, वो बोला-" हाँ मैं वही हूँ। कहने को बहुत बड़ा ग्रुप है मेरे पास, पर अपना कोई नहीं है।"

निशा को जैसे झटका-सा लगा ये सुनकर, वो बोली-" ओह्ह.... माय....गॉड....., आप हैं उस ग्रुप के मालिक?? माफ कीजियेगा, मेरी वजह से आपको इतनी तकलीफ हुई फिर मैंने आपके दिल के जख्मों को भी कुरेद दिया। जो हुआ अनजाने में हुआ। आई एम रियली सॉरी।"

आयुष- "ना-ना, ऐसे मत सोचिये इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। आफ्टरआल अब तो मैं और राहुल फ्रेंड्स बन गए हैं, क्यों राहुल??"

राहुल-" हाँ दी, मैं और आयुष बहुत अच्छे फ्रेंड बन गए हैं।आयुष जब तक आपको होश नहीं आया तब तक यहाँ से गए ही नहीं। सारे डॉक्टर्स भी इनके एक कॉल पर आ गए और इनकी एक बात पर भाग-भाग कर आपका इलाज किया। सब बहुत डर गए थे इनसे।"

निशा इन बातों से मुस्कुराने लगी थी। उसे भी आयुष बहुत भला सा लगा। जैसे उनकी पुरानी जान-पहचान है।

To be continued.....