सुबह का भुला.. डॉ. शैलजा श्रीवास्तव द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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सुबह का भुला..

"अब बहुत हुआ बस, अब नहीं सह सकती मैं! हर बात में मनमानी, हर बात में जिद| अब और नहीं सहना उनकी तानाशाही| पिता हैं तो क्या हर वक़्त सिर्फ रोकते टोकते रहेंगे? कभी खुल के जीने नहीं देंगे?" रागिनी खुली सड़क पर चलते चलते सोच रही थी|

मुझे कभी अपना समझा? नहीं कभी नहीं! उनके लिए तो बस मैं एक कठपुतली हूँ, जिसकी डोर हमेशा बस उनके हाथ में होनी चाहिए| ऐसे होते हैं पिता?" रागिनी बड़बड़ाई|

"ऐसा क्या माँग लिया था? बस एक नए ज़माने का फ़ोन और स्कूल पिकनिक पर मनाली जाने की इजाजत| कितनी बातें सुना डाली? लड़कियों का यूँ इस तरह हर जगह जाना ठीक नहीं...अभी तुम सिर्फ सोलह साल की हो... क्या जरूरत है नये फ़ोन की?? , है तो सही तुम्हारे पास फ़ोन..! दसवीं का इम्तिहान है, ढंग से पढ़ाई करो.! पिकनिक विकनिक भूल जाओ...! और भी ना जाने क्या क्या...??

पिता हैं या कसाई...? मुझे इसीलिए पाल रहे है, पढ़ा लिखा रहे है ताकि मैं कमा क़र उन्हें दे सकूँ...?? जितना भी बुरा सोच सकती थी अपने पिता के बारे में रागिनी ने बस अड्डे पर बैठे बैठे सोच लिया..... और ग़ुस्से में फ़ोन वही फेंक दिया...

ठीक !तो फिर मैं इतनी ही बुरी हूँ, इतनी ही नापसंद हूँ तो चली जाती हूँ आपको छोड़कर..!!. जैसे माँ और जीजी चली गई ..!रागिनी खुद से बोली|

माँ तुम क्यों चली गई , देखो ना पिताजी कितना गुस्सा करते है,... और प्यार???

अचानक से रागिनी की अंतरात्मा से आवाज आई... प्यार भी तो करते है. !

क्या हुआ जरा डांट दिया ???? तो इतना गुस्सा?

जब माँ साल भर का छोड़ स्वर्ग सिधार गईं तो पिताजी ने ही तो माँ बन पाला..!. गंदे कपड़ें धोये,,, अपने हाथों से खाना खिलाया...! पूरी पूरी रात अपने पेट पर सुलाया...! रागिनी की आँखे नम हो उठी.....

पढ़ाई के लिए ही तो डांटते है पिताजी ! मेरे भले के लिए ही ताकि मैं कुछ बन सकूँ.. अपने पैरो पर खड़ा हो आत्मसम्मान से जी सकूँ....

ताकि कोई मुझे दहेज के लालच में राखी जीजी जैसा जला के मार ना डाले... नम आँखे बह चली.....

डरते है मेरे लिए कहीं मुझे कुछ हो ना जाये, तभी तो पिकनिक पर जाने से मना क़र दिया .....

जरा से बुखार पर रात भर सिराहने बैठ जागते है मेरे पिताजी.. मेरे दूर जाने की कल्पना से ही घबरा जाते है, , और मैं ???

मैं उन्हें हमेशा के लिए छोड़कर जाना चाह रही हूँ, कितनी बुरी हूँ मैं , अपने पिताजी को एक और दर्द देना चाह रही थी.. और रागिनी जोर जोर से रोने लगी....

क्या हुआ बिटिया पास बैठे बुजुर्ग ने कंधे पर हाथ रख पूछा....

रागिनी ने ऊपर देखा... रागिनी को उस चेहरे में पिताजी दिखे, परेशान, उसके बिना दुखी....

शाम होने को थी, अंधेरा घिर आया था, लेकिन उसका हृदय प्रकाशित हो चुका था.. पिता के प्रति द्वेष और नाराजगी मिट चुकी थी.... रागिनी उठ ख़डी हुई, इधर उधर नजर दौडा के अपना फेंका हुआ पुराना फ़ोन ढूँढा, जोकि गिरने से बंद पड़ गया था, और फौरन भागी घर की और.....

कहाँ चली गई थी,, मैं कब से राह देख रहा था, दरवाजे पर इंतजार में बैठे पिताजी बोले...

तू जानती है ना, तू देर से घर लौटती है तो मेरा दिल घबरा जाता है, कहाँ गईं थी...

रागिनी चुपचाप सर झुकाये खड़ी है,,

ये ले तेरा नया फ़ोन,, अब जी लगा के पढ़ पिताजी ने नये फ़ोन का डब्बा देते हुए कहा.......

आप बहुत अच्छे हैं पिताजी, वैसे भी पुराना फ़ोन टूट गया है रागिनी पिताजी से लिपटते हुए बोली.....

अब जाकर हाथ मुंह धो ले, मैं खाना लगाता हूँ...

वैसी गई कहाँ थी?? पिताजी पुनः बोले|

"बस रास्ता भटक गई थी! और वैसे भी सुबह का भूला शाम को आ जाये तो उसे भूला नहीं कहते" पिताजी और रागिनी एक साथ बोले और खिलखिला उठे|

धन्यवाद।

©️डॉ.शैलजा श्रीवास्तव ®️